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विडम्बना : घरेलू हिंसा पर एक मार्मिक लघुकथा

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परिचय कुछ घाव समय के साथ भर जाते हैं, पर कुछ ऐसे होते हैं जो हर दिन भीतर ही भीतर रिसते रहते हैं। जब घर की चौखट पर ही भय, अपमान और हिंसा अपना डेरा जमा लें, तब सबसे अधिक घायल वे मासूम मन होते हैं, जो अपने प्रियजनों को टूटते हुए देखते हैं। प्रस्तुत लघुकथा ऐसे ही एक बेटे की मूक वेदना और एक माँ की विवश चुप्पी की कहानी है। "माँ! क्या आप पापा की ऐसी हरकत के बाद भी उन्हें उतना ही मानती हो?" अपने और माँ के शरीर पर जगह-जगह पड़े चोट के निशान और सूजन की ओर इशारा करते हुए बेटे ने पूछा। माँ की आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला। वह बेटे के उन घावों को सहलाती रही, जो उसे बचाने की कोशिश में पिता की मार से लगे थे। उसके काँपते होंठ बहुत कुछ कहना चाहते थे, पर शब्द जैसे भीतर ही दम तोड़ चुके थे। बेटा कुछ पल माँ को देखता रहा, फिर धीमे स्वर में बोला— "माँ! मैं अब बड़ा हो गया हूँ। आपकी चुप्पी का दर्द भी समझता हूँ और मेरी असहायता भी। जिस घर में माँ की इज़्ज़त सुरक्षित न हो, वहाँ बेटे का बचपन भी ज़िंदा नहीं रहता। आपके पति-परमेश्वर की इन हरकतों के विरोध में यदि कभी मेरी जुबान या हाथ उठ गए, तो शायद...

मैथड - जैसे को तैसा | एक सीख देती लघुकथा

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परिचय कई बार हम अपने व्यवहार में प्रेम और अपनापन रखते हुए भी यह समझ नहीं पाते कि सामने वाला हमारे साथ वैसा व्यवहार क्यों नहीं कर रहा। ऐसी ही एक उलझन माँ और बेटी के बीच हुए सहज संवाद का रूप लेती है। बेटी की मासूम-सी बात माँ को अपने ही व्यवहार पर सोचने के लिए मजबूर कर देती है।  " माँ ! क्या सोच रही हो" ? "कुछ नहीं बेटा ! बस यूँ ही"। "कैसे बस यूँ ही ? आपने ही तो कहा न माँ कि आप मेरी बैस्ट फ्रैंड हैं, और मैं अपनी हर बात आपसे शेयर करूँ" !  "हाँ कहा था,  तो" ?  "तो आप भी तो अपनी बातें मुझसे शेयर करो न ! मैं भी तो आपकी बैस्ट फ्रेंड हुई न !  हैं न माँ"!  "हाँ भई ! मेरी पक्की वाली सहेली है तू । बताऊँगी तुझे अपनी सारी बातें, पहले थोड़ा बड़ी तो हो जा" ! मुस्कुराते हुए माँ ने उसके गाल छुए। "मैं बड़ी हो गयी हूँ , माँ ! आप बोलो न अपनी बात मुझसे ! मुझे सब समझ आता है"। हाथों को आपस में बाँधकर बड़ी बड़ी आँखें झपकाते हुए वह माँ के ठीक सामने आकर बोली । "अच्छा ! इतनी जल्दी बड़ी हो गयी" ! (माँ ने हँसकर पुचकारते हुए कहा ) "हाँ म...

ये माँ भी न ! — माँ की ममता पर भावपूर्ण लघुकथा

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परिचय माँ का स्नेह किसी हिसाब-किताब का मोहताज नहीं होता। बच्चे कितने भी बड़े हो जाएँ, माँ की चिंता और अपनापन उनके लिए वैसा ही बना रहता है। कभी दुलार के दो शब्दों में, तो कभी छोटी-सी सौगात में उसका प्रेम सहज ही झलक उठता है। प्रस्तुत लघुकथा माँ के इसी निश्छल स्नेह और उस भाव को सामने रखती है, जिसे उम्र और परिस्थितियाँ भी कम नहीं कर पातीं।  ट्रेन में बैठते ही प्रदीप ने अपनी बंद मुट्ठी खोलकर देखी तो आँखों में नमी और होठों में मुस्कुराहट खिल उठी ।  साथ बैठे दोस्त राजीव ने उसे देखा तो आश्चर्यचकित होकर पूछा, "क्या हुआ ? तू हँस रहा है या रो रहा है " ?  अपनी बंद मुट्ठी को धीरे से खोलकर दो सौ का नोट दिखाते हुए प्रदीप बोला , "ये माँ भी न ! जानती है कि पिचहत्तर हजार तनख्वाह है मेरी । फिर भी ये देख ! ये दो सौ रुपये का नोट मेरी मुट्ठी में बंद करते हुए बोली , रास्ते में कुछ खा लेना" ।  कहते हुए उसका गला भर आया ।  निष्कर्ष माँ का प्रेम शायद दुनिया का ऐसा रिश्ता है, जिसमें देने वाला कभी यह नहीं सोचता कि सामने वाले को उसकी जरूरत है या नहीं। उसके लिए बच्चे की चिंता करना और कुछ देक...

क्रिकेट जैसे खेल अमीरों के चोंचले | मजदूर दिवस पर एक कड़वी सच्चाई”

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 परिचय: हर साल मजदूर दिवस (1 मई) पर हम मजदूरों की मेहनत को सलाम करते हैं, लेकिन क्या हम सच में उनके बच्चों के सपनों को भी समझ पाते हैं? यह कहानी एक ऐसे बच्चे की है, जिसके हाथों में क्रिकेट बैट होना चाहिए था, लेकिन किस्मत ने उसे ईंटें पकड़ने पर मजबूर कर दिया। कन्स्ट्रक्शन एरिया में अकरम को देख शर्मा जी ने आवाज लगाई , "अरे अकरम ! बेटा आज तुम ग्राउण्ड में नहीं गये ? वहाँ तुम्हारी टीम हार रही है"। "नमस्ते अंकल ! नहीं, मैं नहीं गया" । अकरम ने अनमने से जबाब दिया । तभी बीड़ी सुलगाते हुये कमर में लाल साफा बाँधे एक मजदूर  के सामने आया --"जी सेठ जी ! क्या काम पड़े अकरम से ? मैं उसका अब्बू हूँ" । शर्मा जी मुस्कुराते हुए बोले -- "अरे नहीं भई, काम कुछ नहीं... मैं इसे क्रिकेट खेलते देखता हूँ । बहुत अच्छा खेलता है ये ! क्या कैच पकड़ता है... बहुत बढ़िया !  क्रिकेट में आगे बढ़ाओ इसे। खूब खेलने दो। नाम रोशन करेगा ये !   बड़ा सा कश भर बीड़ी को पत्थर पे बुझा वापस माचिस की डिबिया में रख,  कमर का साफा खोलकर सिर में बाँधते हुए मजदूर मुस्कुराकर बोला, "हाँ सेठ जी ! कैच तो बढ़िया...

आत्महत्या : माँ मेरी भी तो सुन लिया करो !

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  "माँ !  मैं बहुत परेशान हूँ , आप आ जाओ ना यहाँ मुझे मिलने, मुझे आपसे बात करनी है" । "बेटा परेशानियां तो आती जाती रहती हैं जीवन में , इनसे क्या घबराना । और मैं तेरे ससुराल आकर क्या करूँगी ! तेरे ससुराली मुझे देखकर पता नहीं क्या सोचेंगे, कहीं और न चिढ़ जायें ।  वैसे मैंने पंडित जी से तेरी और दामाद जी की कुण्डली दिखाई ।  कुछ ग्रहदोष हैं तो कल ग्रहशांति के लिए जप करवा रही हूँ, तू चिंता न कर ग्रहशांति के बाद सब ठीक हो जायेगा । सब्र से काम ले" । "माँ !  मैं जब भी आपसे बात करती हूँ आप पंडित और ग्रहदोष की बातें करने लगते हो , कभी मेरी भी तो सुन लिया करो ना" !   (माँ की बात बीच में काट कर सुषमा ने नाराज होते हुए कहा और फोन रख दिया) शीला को उसकी बहुत फिक्र थी परन्तु बेटी के घर का मामला है हमारे हस्तक्षेप से बात और ना बिगड़ जाय, यही सोचकर ना चाहते हुए भी टाल रही थी उसे। अगले दिन शीला ने मंदिर में  ग्रहशांति की पूजा रखवायी और बेटी के घर की सुख-शांति के लिए उपवास रखकर पूजन में बैठी ही थी कि तभी सुषमा का फोन आया । "माँ ! मैं बड़ी मुश्किल से इधर-उधर के बहाने बनाक...

मुझे बड़ा नहीं होना - दिल छू लेने वाली हिंदी लघुकथा

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"मुझे बड़ा नहीं होना" बचपन की मासूम सोच और भावनाओं पर आधारित दिल छू लेने वाली लघुकथा - "दादू ! अब से न मैं आपको प्रणाम नहीं करूंगा ?" हाथ से हाथ बाँधते हुए दादू के बराबर बैठकर मुँह बनाते हुए विक्की बोला। " अच्छा जी ! तो हाय हैलो करोगे या गुड मॉर्निंग, गुड नाइट "। दादू मुस्कुराते हुए बोले, "सब चलेगा छोटे साहब! आखिर हम मॉडर्न विक्की के सुपर मॉडर्न दादू जो हैं । और हम तुम्हें हर हाल में वही आशीर्वाद देंगे जो हमेशा देते हैं-- खुश रहो और जल्दी से बड़े हो जाओ ।"  "ओह्ह!  दादू, फिर से वही ?   विक्की चिढ़कर बोला और अपने नन्हें हाथों से सोफे पर हल्का मुक्का मार दिया । " प्लीज दादू अपना आशीर्वाद बदल दीजिए -- खासकर दूसरा वाला ! !" दादू ठठाकर हँसते हुए बोले,  “अरे! बड़ा नहीं होना क्या ?” विक्की का चेहरा अचानक गंभीर हो गया। वह दादू के सामने आकर खड़ा हो गया और उनकी आँखों में देखते हुए बोला— "नहीं दादू ! सच्ची में बड़ा नहीं होना । आप इसकी जगह कोई और आशीर्वाद दीजिए न , कोई भी" ।   दादू ने हैरानी से पूछा, "पर क्यों ? छोटे साहब ?"  व...

लड़कियों की सुरक्षा या सजा ? एक विचारणीय लघुकथा

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आज भी समाज में लड़कियों की सुरक्षा के नाम पर कई नियम बनाए जाते हैं। लेकिन क्या ये नियम सच में सुरक्षा देते हैं या उन्हें और भी सीमित कर देते हैं? इसी सवाल को उठाती है यह छोटी सी लघुकथा । माँ-बेटी की बातचीत -  हैलो ! मम्मा! कहाँ हो आप ? फोन क्यों नहीं उठा रहे थे सब ठीक है न ? निक्की ने चिंतित होकर पूछा  । माँ ने जबाब दिया, "हाँ बेटा! सब ठीक है । भूल गयी क्या ? मैंने बताया तो था कि मैंने ज्यूलरी वापस लॉकअप में रखने जाना है ।  ओह! मैं तो भूल गयी, और खूब परेशान हुई । पर मैंने आपके मोबाइल पर भी तो कॉल किया था, आपने उठाया क्यों नहीं ? अरे ! साइलेंट था शायद। चल छोड़। तू बता ! क्या बात है ? और ये  शोर कैसा है वहाँ ? कुछ नहीं मम्मा ! ये कुछ लड़कियों वार्डन से बहस कर रही हैं । दबी आवाज में निक्की ने बताया । हॉस्टल के नियम: सुरक्षा या भेदभाव ? वार्डन से ? पर क्यों ? ये बच्चे भी न ! माँ ने पूछा । नहीं मम्मा,  यहाँ के रूल्स ही अनोखे हैं, और वार्डन भी स्ट्रिक्ट !  वार्डन तो अपनी ड्यूटी कर रही है बेटा ! ऐसे अपने से बड़ों के मुँह लगना अच्छी बात तो नहीं। वैसे बहस किस बारे में ...

नयी सोच 【2】

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                      चित्र, साभार गूगल से.. डब्बू - - दादू ! आज मेरे फ्रेंड्स डिनर पे बाहर जा रहे हैं,   मैं भी जाऊँ उनके साथ ?... प्लीज दादू ! हाँ कह दो न। दादाजी -- अरे नहीं बेटा ! तू अपने दोस्तों के साथ कैसे डिनर करेगा ?  आजकल ज्यादातर लड़के नॉनवेज खाते हैं  डिनर में, फिर एक ही टेबल पर !                  छिः छी...!     अच्छा बता क्या खाना है तुझे ?  अभी मँगवाता हूँ , बोल !  डब्बू - ----  नहीं ना दादू! मुझे बाहर जाना है । दादाजी ----  ओ के ! चल फिर तैयार हो जा ! अभी चलते हैं, आज मैं तुझे तेरी पसंद की हर चीज खिलाउंगा। चल चल !  जल्दी कर! डब्बू - ----  ओह दादू! नहीं जाना मुझे आपके साथ (गुस्से से खीझते हुए)   मुझे समझ नहीं आता नॉनवेज से आपको दिक्कत क्या है ?  हाँ खाते हैं सब लोग नॉनवेज !  खाने की चीज है तो खायेंगे ही न, और हम भी तो खाते हैं न अंडे! दादाजी ---  (सख्त लहजे में) अंडे नॉनवेज में नहीं आते ड...

बदलती सोच 【2】

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आज शीला कुछ और सहेलियों के साथ विमला के घर बिन बताए पहुँची उसे सरप्राइज देने... लेकिन दरवाजे पर उसके पति नीलेश को देख  सभी के मुँह लटक गये...। ओह! नीलेश जी आप! ?...सबके मुँह से एक साथ निकला.... जी ! क्यों... मेरा मतलब ,..नमस्ते... आ..आइए...! आइए न..! आ..आप बाहर क्यों हैं ...नीलेश ने हकलाते हुए कहा। वो... सॉरी नीलेश जी ! हमें लगा कि आप भी अब ऑफिस जाने लगे होंगे...। लॉकडाउन तो अब खत्म हो गया न...।   तो हम विमला से मिलने आ गये बिन बताए......सोचा सरप्राइज देंगे उसे.......पर कोई नहीं हम अभी चलते हैं फिर कभी आयेंगें... माफ करना आपको डिस्टर्ब किया" हिचकिचाते हुए शीला बोली। अरे नहीं ! डिस्टर्ब कैसा !!  डिस्टर्ब जैसी कोई बात ही नहीं !..आप सभी ने बहुत अच्छा किया ..आइए न..... दीजिए उसे सरप्राइज!!..वो पीछे गेस्ट रूम की सफाई कर रही है......। आप सभी को देखकर सचमुच बहुत खुश एवं आश्चर्यचकित हो जायेगी। वैसे भी कब से बोर हो रहे हैं सब घरों में कैद होकर...। (नीलेश उन सब को गेस्ट रूम तक छोड़ आये) अचानक सभी सहेलियों के देखकर विमला सचमुच चौंक गयी,बड़ी खुशी-खुशी हालचाल पूछते हुए सबको बिठाया....

वहम

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  "प्रिया !तुम्हारी मम्मी दिखाई नहीं दे रही कल से...क्या बात है तबियत तो ठीक है न उनकी"?  सामने वाली बालकनी से सीमा ने पूछा तो प्रिया  रूआँसी आवाज में बोली,  "नहीं आन्टी !  मम्मी ठीक नहीं हैं उन्हें कोरोना हो गया है.............कल जो कोरोना टेस्ट करने वाले आये थे न सोसाइटी में, उनके टेस्ट में मम्मी की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव है,तब से मम्मी ने अपने को कमरे में बन्द कर दिया है, और उनकी तबीयत भी ठीक नहीं है....सिर दर्द से परेशान है मम्मी.... हम कुछ भी नहीं कर पा रहे"। "अरे बेटा! पॉजिटिव रिपोर्ट तो मेरी भी आयी कल,  मुझे भी बहुत टेंशन हुई और साथ में शक भी ........ ।   तो मैंने जाकर प्राइवेट अस्पताल में दुबारा टेस्ट करवाया वहाँ मेरी रिपोर्ट नेगेटिव आयी......।  और तुम्हारी मम्मी तो घर पर ही रहती हैं और उन्हें कल तक तो कोरोना के कोई भी लक्षण नहीं थे ,फिर पॉजिटिव रिपोर्ट मिलते ही तबियत कैसे खराब हो गयी...? बेटा ! अपनी मम्मी का एक बार और टेस्ट करवाइए, कहीं उनकी तबियत बिगड़ने का कारण उनका वहम तो नहीं"। "जी आन्टी ! आप सही कह रही हैं, मैं पापा को बताती हूँ"...

तमाशा देखो दाना फेंको

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  सु बह सुबह सीमा ने हमेशा की तरह छत पर चिड़ियों के लिए दाना डाला और वहीं कोने में आसन बिछाकर योग करने बैठी तो देखा कि एक कबूतर बाकी कबूतरों को दाने के आस-पास भी नहीं फटकने दे रहा .... कुछ कबूतर उससे दाना लेने की फिराक में लड़ रहे हैं तो कुछ आकर सीमा के आसन के इर्दगिर्द गुटरगूँ करते हुए घूम रहे हैं मानों उस कबूतर की शिकायत करके अपने लिए अलग दाना-पानी माँग रहे हों.....।         सीमा को उन पर दया आयी और लड़ने वाले कबूतर पर गुस्सा.......।                                                            जी चाहा कि लड़ाकू कबूतर को पकड़कर खूब खरी-खटी सुनाये कि हम मनुष्यों का फेंका दाना खा-खाकर आखिर तुममें भी स्वार्थ और बैमनस्य की भावना आ ही गयी ।  अरे ! प्यार से रहो न जैसा हमेशा रहते आये हो.....    क्यों तुम भी हम मनुष्यों की तरह तेरा मेरा करने लगे...? पर सोचा कि इन्हें कहाँ कुछ समझ आयेगा हमें भी कौन सा आता है.....

बदलती सोच 【1】

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पहले से ही खचाखच भरी बस जब स्टॉप पर रुकी तो बहुत से लोगों के साथ एक शराबी भी बस में चढ़ा जो खड़े रह पाने की हालत में नहीं था...। सभी सीट पहले से ही फुल थी, उसे लड़खड़ाते देख बस में खड़ी महिलाएं इधर उधर खिसकने की कोशिश करने लगी। तभी एक उन्नीस - बीस साल की लड़की अपनी सीट से उठी और शराबी को सीट पर बैठने का आग्रह किया। शराबी बड़े रौब से लड़खडा़ती आवाज में बोला, "इट्स ओके…आइ विल मैनेज"...। लड़की ने बस कंडक्टर से इशारा कर शराबी को अपनी सीट पर बिठा दिया। बस में खड़ी सभी महिलाओं के चेहरे पर सहजता के भाव साफ नजर आ रहे थे ..... अब वह लड़की भी उन्ही के साथ खड़ी थी। तभी एक बुजुर्ग महिला बस के झटके से गिरने को हुई तो लड़की ने उन्हें सम्भाला और पास में बैठे लड़के से बोली "भाई क्या आप अपनी सीट इन ऑण्टी को दे सकते हैं"...? लड़का तपाक से बोला "मैं आपकी तरह बेवकूफ नहीं हूँ, कि अपनी सीट दूसरों को देकर धक्के खाता फिरूँ...। आपने उस शराबी को सीट क्यों दी ? देनी ही थी तो इन ऑण्टी जैसे लोंगो को देती जो खड़े रहने में अक्षम हैं..... और वैसे भी तुम्हारी सीट तो महिला आरक्षित सीट थी न"....?   लड़की बड़...

नयी सोच

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 ठुड्डी को हथेली में टिकाए उदास बैठी बिन्नी से माँ ने बड़े प्यार से पूछा, "क्या हुआ बेटा ये उदासी क्यों"? "मम्मा ! आज मेरे इंग्लिश के मार्क्स पता चलेंगें " "तो ? आपने तो अच्छी तैयारी की थी न एक्जाम की !फिर डर क्यों ? मम्मा ! मुझे लगता है, मैं फेल हो जाउंगी। अरे ! नहीं बेटा ! शुभ-शुभ बोलो, और अच्छा सोचो ! वो कहते हैं न , बी पॉजिटिव ! हम्म, कहते तो हैं पर क्या करूं मम्मा ! खुशी चाहिए तो गंदा सोचना ही पड़ता है । अरे !  ये क्या बात हुई भला ! अच्छा सोचोगे तब अच्छा होगा न ! और बुरा सोचोगे तो बुरा ही होगा, खुशी भी कहाँ से मिलेगी बेटा ! ओह मम्मा ! अच्छा सोचती हूँ तो एक्सपेक्टेशन बढ़ती है, फिर जो भी मार्क्स आते हैं वो कम लगने लगते हैं, फिर दुखी होती हूँ । और इसके अपॉजिट बुरा सोचकर एक्सपेक्टेशन खतम, फिर जो भी मार्क्स आयें वो खुशी देते हैं । इसीलिये खुशी चाहिए तो बुरा सोचना ही पड़ता है मम्मा ! हैं  ! कहते हुए अब माँ असमंजस में पड़ गयी। चित्र ,साभार गूगल से पढ़िए एक लघु कहानी ●  सोसायटी में कोरोना की दस्तक

लघुकथा - नानी दादी के नुस्खे

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आज दादी की तबीयत ठीक नहीं है । अक्कू बेटा मुझे कीचन में कुछ काम है तुम दादी के पास बैठकर इनका ख्याल रखो ! मैं अपने काम निबटाकर अभी आती हूँ।  "हाँ माँ ! मैं यही पर हूँ आप चिंता मत करो, मैं ख्याल रखूंगा दादी का ।  दादी !  मैं हूँ आपके पास, कुछ परेशानी हो तो मुझे बताइयेगा"। कहकर अक्षय अपने मोबाइल में व्यस्त हो गया। थोड़ी देर बाद दादी ने कराहते आवाज दी, "अक्कू! बेटा ! पैरों में तेज दर्द हो रहा है,देख तो चारपाई के नीचे मैंने दर्द निवारक तेल बनाकर शीशी मेंं रखा है , थोड़ा तेल लगा दे बेटा पैरों में, आराम पड़ जायेगा"। "ओह दादी !  तेल लगाने से कुछ नहीं होगा । रुको ! मैं मोबाइल में गूगल पर सर्च करता हूँ , यहाँ 'नानी दादी के नुस्खे'  में बहुत सारे घरेलू उपाय लिखे रहते हैं, उन्हें पढ़कर आपके  पैरों के दर्द को मिटाने का कोई अच्छा सा उपाय देखता हूँ, और वही दवा बनाकर आपके पैरों में लगाउंगा"।  कहकर अक्षय पुनः मोबाइल में व्यस्त हो गया। बेचारी दादी कराहते हुए बोली, "हम्म अपनी दादी नानी तो जायें भाड़ में, गूगल पे दादी नानी के नुस्खे ! हे मेरे राम जी !  क्या जमाना आ ग...

हरि मेरे बड़े विनोदी हैं

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देखो तो अब आयी महारानी !...क्या कह रही थी जाते समय ..."नहीं यार आज जाने का मन नहीं है तुम दोनों इतने सालों बाद मेरे घर मुझसे मिलने आये हो और मैं चली जाऊं ...नहीं नहीं आज के लिए माफी माँग लूंगी ठाकुर जी से...आज नहीं जा पाउँगी सत्संग में..... हैं न मीना ! यही कह रही थी न ये"(कमला ने चुटकी लेते हुए कहा)। "हाँ सखी! कहा तो यही था और हमने ही इसे जबरदस्ती भेजा इसका दोहरा मन देखते हुए .....। और अब देखो सबके बाद आयी ....अरे लगता है इसे तो याद भी न रहा होगा वहाँ कि हम आये हैं ......हैं न!... दोनों सखियाँ सरला का मजाक बनाते हुए हँसने लगी तो सरला बोली;   "हँसो हँसो खूब हँसो तुम दोनों भी......खूब मजाक उड़ाओ मेरा....... पर मैं भी बता देती हूँ कि मैं भूली नहीं थी तुमको वहाँ भी..... अरे !सच बताऊँ तो आज मन ही नहीं लगा सत्संग में.... बचपन की जिन मस्तियों को याद कर हम तीनों खूब हँसे थे न सुबह से...रह रहकर वही यादें वहाँ भी कुलबुला रही थी मन में"....... "अच्छा तब ही देरी हुई न हमारे पास आने में"...कहकर दोनों सखियां फिर खिल्ली उड़ाई। अरे नहीं सखी ! सुनो तो बताऊं न कि क्यों ...

अनपढ़ माँ की सीख

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                               अभी ही कॉलेज जाना शुरू किया छवि ने। स्कूली अनुशासन से मुक्त उसके तो जैसे पर ही लग गये अपनी ही कल्पनाओं में खोयी रहती । माँ कुछ पूछे तो कहती ; माँ ! आप ठहरी पुराने जमाने की अनपढ़,समझ  नहीं पाओगी। आज माँ ने उसे फोन पर सखियों से कहते सुना कि मुझे मेरे कॉलेज के लड़कों ने दोस्ती के प्रस्ताव भेजें हैं, समझ नहीं आता किसे हाँ कहूँ और किसे ना...। तो माँ को उसकी चिन्ता सताने लगी,कि ऐसे तो ये गलत संगति में फंस जायेगी। पर इसे समझाऊँ भी तो कैसे ?.. बहुत सोच विचार कर माँ ने उसे पार्क चलने को कहा।  वहाँ बरसाती घास व कंटीली झाड़ देखकर छवि बोली;   "माँ! यहाँ तो झाड़ी है, चलो वापस चलते हैं"!    माँ बोली ;  "इतनी भी क्या जल्दी है ? जब आये हैं तो थोड़ा घूम लेते हैं न"। "पर माँ देखो न कँटीली घास"! छवि ने कहा "छोड़ न बेटा ! देख फूल भी तो हैं" कहते हुए माँ उसे लेकर पार्क में घुस गयी थोड़ा आगे जाकर बाहर निकले तो अपने कपड़ों पर काँटे चुभे देखकर छवि  कुढ़़कर बोली "माँ...

पीरियड

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                       "पीरियड ! कौन सा"? राहुल ने जैसे ही कहा लड़कियाँ मुँह में हाथ रखकर हा!..कहते हुए एक दूसरे को देखने लगी,  राहुल-  "अरे!क्या हुआ ? अभी नेहा किस पीरियड की बात कर रही थी"?  रश्मि(गुस्से में )- "शर्म नहीं आती ऐसी बातें करते हुए, अभी मैम को बताते हैं। " सभी लड़कियाँ क्लासटीचर से राहुल की शिकायत करने चली गयी और मैम को सब बताते हुए बोली कि कल भी इसने नेहा के बैग में रखे पैड के बारे में पूछा कि ग्रीन पैकेट में क्या है" ?  क्लासटीचर ने क्रोधित होते हुए राहुल से पूछा तो उसने सहजता से कहा; "जी मैम! मैंने पूछा था इनसे "। "बड़े ढ़ीठ हो तुम! गलती का एहसास तक नहीं, अभी तुम्हारे पैरेंट्स को बताती हूँ", कहकर मैम ने उसके घर फोन किया।  (राहुल अब भी अपनी गलती नहीं समझ पाया ।उसे कक्षा से बाहर खड़ा कर दिया गया)। उधर फोन सुनकर उसके पैरेंट्स सब काम-काज छोड़ हड़बड़ाकर स्कूल पहुँचे।   राहुल की माँ-"मैम!क्या हुआ मेरे बेटे को?वो ठीक तो है न" ? टीचर-"जी!वह तो ठीक है, लेकिन उसकी हरकतें ठीक नहीं हैं, बिगड़ रहा ...

फर्क : कोरोना काल में मानवीय संवेदनाओं पर व्यंग्य

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परिचय कोरोना काल में संक्रमण से बचाव के लिए सावधानी और स्वच्छता जरूरी थी। लेकिन संकट के समय भी मनुष्य का व्यवहार उसके सामाजिक भेदभाव को उजागर कर देता है। यह लघुकथा इसी दोहरे व्यवहार पर सहज और व्यंग्यात्मक ढंग से सवाल उठाती है। फर्क ट्रिंग-ट्रिंग... डोरबेल की आवाज सुनते ही माधव ने दरवाजा खोला। सामने एक व्यक्ति खड़ा था। “जी?” “मैं बैंक से आया हूँ। आपने लोन के लिए आवेदन किया है?” इतना सुनते ही माधव के चेहरे पर मुस्कान फैल गई। वह बड़े आदर से बैंक कर्मचारी को अंदर ले आया। “जी, जी सर जी! आइए प्लीज... बैठिए सर जी।” उसे सोफे पर बैठाकर माधव ने पत्नी को आवाज लगाई—“श्रीमती जी! देखिए, सर जी आए हैं। जल्दी से चाय-नाश्ते की व्यवस्था करो। पहले पानी, ठंडा वगैरह लाओ।” बैंक कर्मचारी ने संकोच से कहा, “नहीं-नहीं, इसकी कोई जरूरत नहीं है। आप लोग कष्ट न करें। धन्यवाद आपका।" “अरे सर जी! कैसी बातें करते हैं? कष्ट कैसा? ये तो हमारे भारतीय संस्कार हैं—‘अतिथि देवो भवः’... है न!” माधव की बनावटी हँसी के बीच कुछ ही देर में मेज कोल्ड ड्रिंक, चाय और नाश्ते से सज गई। तभी फिर डोरबेल बजी। ट्रिंग-ट्रिंग...

क्षण-भंगुर जीवन

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"सान्ता ! ओ सान्ता ! तूने फिर चक्की खोल दी, अरे!इस महामारी में भी तू अपनी आदत से बाज नहीं आ रही ।कितने सारे लोग गेहूं पिसवाने आ रहे हैं,अगर किसी को बीमारी होगी तो तू तो मरेगी ही अपने साथ मुझे और मेरे बच्चों को भी मारेगी" । "चुप करो जी ! ऐसा कुछ नहीं होगा और देखो मैंने अच्छे से मुँह ढ़का है फिर भी नसीब में अभी मौत होगी तो वैसे भी आ जायेगी । चक्की बन्द कर देंगे तो खायेंगे क्या ? कोरोना से नहीं तो भूख से मर जायेंगे , तुम जाओ जी ! बैठो घर के अन्दर !  मुझे मेरा काम करने दो"! "हाँ ! हाँ ! मत मान मान मेरी मेरी बात । यहीं रह अपनी चक्की में ! तेरा खाना -पीना यहीं भेज दूँगा और हाँ ! सो भी यहीं जाना कहीं कोने में ! मैं तो चला । अपने बच्चों के साथ मजे से जीऊंगा ! तुझे मरना है न , तो मर"!  (बड़बड़ाते हुए अमरजीत वहाँ से चला गया)। (हुँह करके सान्ता भी मुँह घुमाकर अपने काम में व्यस्त हो गयी) दोपहर में बेटी दीपा ने आवाज लगायी "माँ ! बाबूजी !खाना तैयार है जल्दी आ जाओ तो सान्ता बोली "बेटा ! तुम खा लो और अपने बाबूजी को भी खिला देना, मैं बाद में खा लूँगी...

सम्भावित डर

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                चित्र गूगल से साभार पति की उलाहना से बचने के लिए सुमन ने ड्राइविंग तो सीख ली,  मगर भीड़ भरी सड़कों पर गाड़ी चलाते हुए उसके हाथ-पाँव फूल जाते।आज बेटी को स्कूल से लाते समय उसे दूर चौराहे पर भीड़ दिखी तो उसने स्पीड स्लो कर दी। "मम्मा ! स्पीड क्यों स्लो कर दी आपने" ? बेटी  झुंझलाकर बोली तो सुमन बोली "बेटा !आगे की भीड़ देखो!वहाँ पहुँचकर क्या करुँगी, मुझे डर लग रहा है, छि!  मेरे बस का नहीं ये ड्राइविंग करना"। "अभी स्पीड ठीक करो मम्मा ! आगे की आगे देखेंगे। ये गाड़ियों के हॉर्न सुन रहे हैं आप? सब हमें ही हॉर्न दे रहे हैं मम्मा ! उसकी झुंझलाहट देखकर सुमन ने थोड़ी स्पीड तो बढ़ा दी पर सोचने लगी, बच्ची है न, आगे तक  नहीं सोचती। अरे ! पहले ही सोचना चाहिए न आगे तक, ताकि किसी मुसीबत में न फँसे । वह सोच ही रही थी कि उसी चौराहे पर पहुँच गयी जहाँ की भीड़ से डरकर उसने स्पीड कम की थी। परन्तु ये क्या! यहाँ तो सड़क एकदम खाली है! कोई भीड़ नहींं ! साथ में बैठी बेटी को अपने में मस्त देखकर वह सोची, चलो ठीक है इसे ध्यान नहीं, कोई ब...

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