गुरुवार, 30 जुलाई 2020

सुहानी भोर


sunrise

उदियांचल से सूर्य झांकता,
पनिहारिन सह चिड़िया चहकी।
कुहकी कोयल डाल-डाल पर,
ताल-ताल पर कुमुदिनी महकी।
निरभ्र आसमां खिला-खिला सा,
ज्यों स्वागत करता हो रवि का।
अन्तर्द्वन्द उमड़े भावों से,
लिखने को मन आतुर कवि का।।

दुहती ग्वालिन दुग्ध गरगर स्वर,
चाटती बछड़ा गाय प्यार से।
गीली-गीली चूनर उसकी,
तर होती बछड़े की लार से।
उद्यमशील निरन्तर कर्मठ,
भान नहीं उनको इस छवि का।
अन्तर्द्वन्द उमड़े भावों से,
लिखने को मन आतुर कवि का

कहीं हलधर हल लिए काँध पर,
बैलों संग खेतों में जाते।
सुरभित बयार से महकी दिशाएं,
कृषिका का आँचल महकाते।
सुसज्जित प्रकृति भोर में देखो,
मनमोहती हो जैसे अवि का।
अन्तर्द्वन्द उमड़े भावों से,
लिखने को मन आतुर कवि का

         चित्र, साभार गूगल से...

शनिवार, 25 जुलाई 2020

पावस में इस बार


 village

पावस में इस बार
गाँवों में बहार आयी
बंझर थे जो खेत वर्षों से
फिर से फसलें लहरायी

हल जो सड़ते थे कोने में
वर्षों बाद मिले खेतों से
बैल आलसी बैठे थे जो
भोर घसाए हल जोतने

गाय भैंस रम्भाती आँगन 
बछड़े कुदक-फुदकते हैं
भेड़ बकरियों को बिगलाते
ग्वाले अब घर-गाँव में हैं।

शुक्र मनाएं सौंधी माटी
हल्या अपने गाँव जो आये
कोरोना ने शहर छुड़ाया
गाँव हरेला तीज मनाये

चहल-पहल है पहले वाली
गाँव में रौनक फिर आयी
धान रोपायी कहीं गुड़ाई
पावस रिमझिम बरखा लायी

    
बिगलाते=बेगल /पृथक करना /झुण्ड में से अपनी -अपनी भेड़ बकरियाँँ अलग करना
घसाए= घास - पानी खिला-पिलाकर तैयार करना
हल्या=हलधर, खेतों में हल जोतने वाला कृषक
   
            चित्र साभार गूगल से...

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया

summer weather


की जो नादानियाँ तब
खुद पे अब तरस आया...
आज मौसम का रुख,
जब उसे समझ आया

तप्त तो था मौसम
वो कड़वी दवा पीती रही ...
वजह बेवजह ही
खुद को सजा देती रही
सजा-ए-दर्द सहे मन
भी बहुत पछताया
आज मौसम का रुख
जब उसे समझ आया

हाँ! मौसम की ये फितरत
ना समझ पाती थी....
उसकी खुशियों के खातिर
कुछ भी कर जाती थी
उसकी गर्मी और सर्दी में
खुद को उलझाया....
आज मौसम का रुख
जब उसे समझ आया.....

दी सजाएं जो रोग बनके
तन में पलती रही...
नैन बरसात से बरसे
ये उम्र ढ़लती रही......
कुछ सुहाना हुआ मौसम
पर न अब रास आया
आज मौसम का रुख
जब उसे समझ आया।

सुख में दुःख में जो न सम्भले
वो दिन रीत गये
सर्दी गर्मी और बरसात के
दिन बीत गये
ढ़ल गयी साँझ, देखो अब
रात का तमस छाया
की जो  नादानियों तब
खुद पे अब तरस आया।
आज मौसम का रुख
जब उसे समझ आया...
        
        चित्र ; साभार पिन्टरेस्ट से


शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

फर्क

money makes difference


ट्रिंग-ट्रिंग....(डोरबेल की आवाज सुनते ही माधव दरवाजे पर आता है)
माधव (बाहर खड़े व्यक्ति से)  - जी ?

व्यक्ति--  "मैं बैंक से....आपने लोन अप्लाई किया है" ?

माधव--"जी , जी सर जी! आइए प्लीज"! ( उन्हें आदर सहित अन्दर लाकर सोफे की तरफ इशारा करते हुए ) "बैठिये सर जी!प्लीज बैठिये ...आराम से" ....
"श्रीमती जी!... देखिये सर जी आये हैं, जल्दी से चाय-नाश्ते की व्यवस्था करो ! पहले पानी, ठण्डा वगैरह लाओ!"

बैंक कर्मचारी- नहीं नहीं इसकी जरूरत नहीं ,आप लोग कष्ट न करें ,धन्यवाद आपका।

माधव- अरे सर जी! कैसी बातें करते हैं , कष्ट कैसा ? ये तो हम भारतीयों के संस्कार हैं, अतिथि देवो भवः...है न...(बनावटी हँसी के साथ)।

(फटाफट मेज कोल्ड ड्रिंक, चाय और नाश्ते से सज जाती है)

तभी डोरबेल बजती है ट्रिंग-ट्रिंग....

माधव (दरवाजे पे) -- क्या है बे?

कूड़ेवाला- सर जी! बहुत प्यास लगी है थोड़ा पानी .......

माधव- घर से पानी लेकर निकला करो ! अपना गिलास-विलास कुछ है?

कूड़ेवाला- नहीं सर जी!गिलास तो नहीं...

माधव (अन्दर आते हुए)-  "श्रीमती जी! इसे डिस्पोजल गिलास में पानी दे दो...खुद ही उसे फेंक देगा ...दूर से देना...
और हाँ इसने डोरबेल को छुआ उसे सैनीटाइजर से साफ कर दो और उसे साफ-साफ कह दो ऐसे समय में कोई पानी-वानी नहीं मिलेगा अपना पानी लेकर आया करे"!
"इन्हीं दो टके के लोगों की वजह से देश में कोरोना बढ़ता ही जा रहा है.....आ जाते हैं मुँह उठाकर"
( वह बड़बड़ाते हुए अन्दर आता है)

और फिर बड़े आदर भाव से..
"अरे सर जी!आपने कुछ लिया क्यों नहीं"... (नाश्ते की ट्रे बैंक कर्मचारी की ओर बढ़ाते हुए )

तभी उनकी आठ वर्षीय बेटी  सैनीटाइजर की बोतल लेकर बैंक कर्मचारी के पास आती है, और प्रश्न भरे नेत्रों से टुकर-टुकर ताकती है कभी बैंक कर्मचारी को तो कभी बाहर खड़े कूड़ेवाले को....।


               चित्र, साभार गूगल से....