बुधवार, 29 सितंबर 2021

मौसम बदल जाने को है

Changeweather
                     चित्र साभार photopin.com से



अभी फलित भी ना हुई कि बेल मुरझाने को है
देखते ही देखते ,  मौसम बदल जाने को है

देर से जागे हैं तो , तत्पर संभालें आपको
है गतिज ये दोपहर फिर साँझ ढ़ल जाने को है ।

चार दिन चौमास में , बादल घुमड़ के चल दिये
दमक उठा अम्बर बदन, समझो शरद आने को है।

सिमट रही नदी भी अब, नालों का साथ ना मिला
सैकत भरे इस तीर का , उफान अब जाने को है ।

बुढिया रही बरसात अब, फूले हैं काँस केश से
दादुर दुबक रहे कहीं, 'खंजन' भी अब आने को है ।

खिल रही कली-कली , पुष्पित सभी प्रसून हैं
पयाम पुष्प पा मधुप,  सुर मधुर गाने को है ।

रविवार, 26 सितंबर 2021

आसमाँ चूम लेंगे हम


Happydaughterday
                    चित्र साभार pixabay से... 


हौसला माँ ने दिया , 'पर'  दे रहे पापा

कहकही सुन डर भला,क्यों खोयें हम आपा

यूँ ना अब से डरेंगे हम ,

आसमाँ चूम लेंगे हम 

खुशी से झूम लेंगे हम ।


ख्वाब हर पूरा करेंगे, भेड़ियों से ना डरेंगे

सीख कर जूड़ो-कराँटे, अपने लिए खुद ही लडेंगे

हर बुरी नजर की नजरें नोंच लेंगे हम

आसमाँ चूम लेंगे हम

खुशी से झूम लेंगे हम ।


देहलीज से निकले कदम अब ना रूकेंगे

निर्भय बढेंगे हौसले अब ना झुकेंगे

संस्कार हैं सरताज अपने, 

बेड़ियां इनको कभी बनने न देंगे हम

आसमांँ चूम लेंगे हम

खुशी से झूम लेंगे हम ।


सब एक जैसे तो नहीं, दुनिया भली है

तम है किसी कोने पे, रौशन हर गली है

जब साथ है अपनों का तो अब ना डरेंगे हम

आसमाँ चूम लेंगे हम

खुशी से झूम लेंगे हम।



कंटकों को चुन जिन्होंने राह बनाई

जीत ली अस्तित्व की हर इक लड़ाई

हैं उन्ही की बानगी फिर क्यों रुकेंगे हम

आसमांँ चूम लेंगे हम

खुशी से झूम लेंगे हम।


है खुला परवाज़ पर हमको मिले हैं

अपनों का है साथ तो अब क्या गिले हैं

अनुसरित पदचिह्न से कुछ और बढकर

आने वालों को पुनः नवचिह्न देंगे हम

आसमाँ चूम लेंगे हम

खुशी से झूम लेंगे हम ।।           

       

मंगलवार, 21 सितंबर 2021

आर्थिक दरकार

financial need
                
               चित्र साभार pixabay.com से


 बड़ी मेहनत से कमाया

इच्छाओं पर अंकुश लगा 

पाई-पाई कर बचाया

कुछ जरूरी जरूरतों के अलावा

नहीं की कभी मन की 

न बच्चों को करने दी

बचपन से ही उन्हें

सर सहलाकर समझाया

और कमी-बेसियों के

संग ही पढाया-लिखाया।

बुढापे की देहलीज में जाते -जाते

अपनी जमापूँजी को बड़े जतन से

बेटी - बेटों में बाँटने के लिए

सपरिवार बैठकर

सबने दिमाग घुमाया

बेटियों के ब्याह में दहेज

का बराबर हिसाब लगाया

बेटियों को विदा कर

बचे - खुचे पैसों में 

बेटे की नौकरी के मार्फत

लोन का जुगाड़ लगाया

दिन-रात एक कर

शहर में दो कमरों का 

छोटा सा घर बनाया

अपनी सफलता पर 

आप ही जश्न मना

दसों रोगों के चलते

असमय ही

विदा ले ली संसार से...


इधर बेटा नई-नई नौकरी

माता-पिता का अंतिम संस्कार

बहन-बहनोइयों का सत्कार

लोन का बोझ ढोते

बड़ा ऐश कर रहा 

लोगों की नजर में........


सुनी-सुनाई कही-कहाई सुन

अब बहनें भी आ धमकी

अपने शहरी घर

कानूनी कागजात लेकर

भाई ! हम भी हैं हिस्सेदार

इस शहरी घर पर 

हमारा भी है अधिकार 

हिस्सा दे हमारा !

 करे भी तो क्या

कानून का मारा ?...


तिस पर ये विभिन्न त्योहार 

रक्षा बंधन फिर भाई दूज

इन्हीं से तो निभता है न

भाई-बहन का पवित्र प्यार!


अब बड़ी आसानी से 

कहते हैं  लोग-बाग

पड़ौसी और रिश्तेदार

माँ-बाप तक ही होता है मायका

भाई बड़ा खुदगर्ज निकला

नहीं उसे  बहिनों से प्यार

मुँह नहीं लगाता उन्हें

हे राम ! माँ-बाप बिना

कैसे सूने हो गये

इन बेचारियों के त्योहार !


क्या करें किसे दोष दें

कौन है इन परिस्थितियों

का जिम्मेदार ?

माँ-बाप और उनके संस्कार ?

या  मध्यम वर्ग की

आर्थिक दरकार ?





सोमवार, 13 सितंबर 2021

तुम उसके जज्बातों की भी कद्र कभी करोगे

Indian woman
                        चित्र साभार गूगल से....


जो गुण नहीं था उसमें

हरदम देखा तुमने

हर कसौटी पर खरी उतरे

ये भी चाहा तुमने

पर जो गुण हैं उसमें

उसको समझ सकोगे?

तुम उसके जज्बातों की

भी कद्र कभी करोगे   ?


बचपन की यादों से जिसने

समझौता कर डाला

और तुम्हारे ही सपनों को

सर आँखों रख पाला

पर उसके अपने ही मन से

उसको मिलने दोगे ?

तुम उसके जज्बातों की

भी कद्र कभी करोगे ?


सबको अपनाकर भी 

सबकी हो ना पायी

है बाहर की क्यों अपनों 

संग सदा परायी

थोड़ा सा सम्मान 

कभी उसको भी दोगे ?

तुम उसके जज्बातों की

भी कद्र कभी  करोगे ?


सुनकर तुमको सीख ही जाती

आने वाली पीढ़ी

सोच यही फिर बढ़ती जाती

हर पीढ़ी दर पीढ़ी

परिर्वतन की नव बेला में

खुद को कभी बदलोगे

 तुम उसके जज्बातों की

भी कद्र कभी करोगे ?


समाधिकार उसे दोगे तो

वह हद में रह लेगी

अनुसरणी सी घर-गृहस्थी की

बागडोर खुद लेगी

निज गृहस्थी के खातिर तुम भी

अपनी हद में रहोगे ?

तुम उसके जज्बातों की

भी कद्र कभी करोगे ?


   

सोमवार, 6 सितंबर 2021

ये भादो के बादल

Cloudy weather
चित्र साभार,pixabay से...


 भुट्टे मुच्छे तान खड़े

तोरई टिण्डे हर्षाते हैं 

चढ़ मचान फैला प्रतान 

अब सब्ज बेल लहराते हैं


चटक चमकती धूप छुपा 

ये घुमड़ घुमड़ गहराते हैं

उमस भरे मौसम में ये 

राहत थोड़ी दे जाते हैं


हरियाये हैं खेत धान के,

देख इन्हें बतियाते हैं

जान इल्तजा उमड़-घुमड़ 

ये धूप मे वर्षा लाते हैं


श्रृंगित प्रकृति के भाल मुकुट 

जब इन्द्रधनुष बन जाते हैं

नाच मयूरा ठुमक ठुमक

घन गर्जन ताल बजाते हैं


ये भादो के बादल हैं 

अब बचा-खुचा बरसाते हैं

ये चंचल कजरारे मेघा

सबके मन को भाते हैं।


बुधवार, 1 सितंबर 2021

निभा स्वयं से पहला रिश्ता

Girl in introspection
Sketch by my daughter


बहुत हुई जब मन के मन की
तो तन को गुस्सा आया
खोली में छुपकर बैठा मन 
तन जब मन पर गरमाया

अपनी अपनी हाँका करता
फिर भी मैंने तुझको माना
पर मुझमें ही रहकर भी क्या 
 तूने कभी मुझे जाना ?

सबकी कदर औ' फिकर तुझे ,
जब तेरी कोई जो सुने ना
तब गमगीन रहे तू तुझमें
अश्रु मुझ से ही बहे ना।

आँखें असमय फूटी जाती
फर्क तुझे नहीं पड़ता
हाल वही बेहाल है तेरा
अपनी  जिद्द पे तू अड़ता

जाने क्या-क्या शौक तेरे ये
मुझ पर पड़ते भारी
तेरी मनमानी के कारण
मैं झेल रहा बीमारी

तेरा क्या...दुर्गत जो हुआ मैं
तू त्याग मुझे उड़ जायेगा
ढूँढ़ कोई नवतन तू फिर से
 यही प्रपंच रचायेगा।।

सबको मान दिया करता तू
तनिक मुझे भी माना होता
मेरे दुख-सुख सामर्थ्यों को
कुछ तो कभी पहचाना होता

सामंजस्य हमारा होता
निरोगी काया हम पाते
निभा स्वयं से पहला रिश्ता
फिर दुनिया को अपनाते ।।



कहाँ गये तुम सूरज दादा ?

  कहाँ गये तुम सूरज दादा ? क्यों ली अबकी छुट्टी ज्यादा ? ठिठुर रहे हैं हम सर्दी से, कितना पहनें और लबादा ? दाँत हमारे किटकिट बजते । रोज नहान...