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पत्थरदिल मर्द बड़ा बेदर्द कहलाता हूँ मैं

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चित्र साभार shutterstock से दिल में सौ दर्द छिपे, करूँ किससे शिकवे गिले। मर्द हूँ रो ना सकूँ , जख्म चाहे हों मिले। घर से बेघर हूँ सदा फिर भी घर का ठहरा, नियति अपनी है यही, विदा ना अश्रु ढ़ले।। घर से निकला जो कमाने, दिल पत्थर का बनाया । माँ की गोदी में सिर रखा, फिर भी मैं रो नहीं पाया । उन समन्दर भरी आँखों से आँखें चार कर खिसका । बहे जब नाक आँसू , तो मफलर काम तब आया । झूठी मुस्कान झूठी शान ले के जी रहा हूँ । मैं फौलाद कहने का,  टूक दिल सी रहा हूँ । करनी कापुरुष की 'सजा ए शक' में हूँ मैं, वेवजह बेएतबारी का जहर पी रहा हूँ ।। घर , समाज हो या देश पहरेदार हूँ मैं । माँ, बहन, बेटी की सुरक्षा का जिम्मेदार हूँ मैं । अनहोनियाँ करते नरपिशाच मेरा रूप लिए, बेबस विवश हूँ उन हालात पर लाचार हूँ मैं ।। खामोशी ओढ़के जज्बात छुपाता हूँ मैं । बेटा,भाई, पति,पिता बन फर्ज निभाता हूँ मैं । भूलकर दर्द अपने जिम्मेदारियाँ निभाने, पत्थरदिल मर्द बड़ा बेदर्द कहलाता हूँ मैं ।।

विधना की लिखी तकदीर बदलते हो तुम....

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 हाँ मैं नादान हूँ मूर्ख भी निपट , माना मैंंने अपनी नादानियाँ कुछ और बढ़ा देती हूँ । तू जो परवाह कर रही है सदा से मेरी, खुद को संकट में कुछ और फंसा लेती हूँ । वक्त बेवक्त तेरा साथ ना मिला जो मुझे, अपने अश्कों से तेरी दुनिया बहा देती हूँ  । सबकी परवाह में जब खुद को भूल जाती हूँ , अपनी परवाह मेंं तुझको करीब पाती हूँ, मेरी फिकर तुझे फिर और क्या चाहना है मुझे, तेरी ही ओट पा मैं   मौत से टकराती हूँ । मैंंने माना मेरे खातिर खुद से लड़ते हो तुम , विधना की लिखी तकदीर बदलते हो तुम, मेरी औकात से बढ़कर ही पाया है मैंंने, सबको लगता है जो मेरा, सब देते हो तुम। कभी कर्मों के फलस्वरूप जो दुख पाती हूँ जानती हूँ फिर भी तुमसे ही लड़ जाती हूँ तेरे रहमोकरम सब भूल के इक पल भर में तेरे अस्तित्व पर ही    प्रश्न मैं उठाती हूँ मेरी भूले क्षमा कर माँ !  सदा यूँ साथ देते हो मेरी कमजोर सी कश्ती हमेशा आप खेते हो कृपा करना सभी पे यूँ  सदा ही मेरी अम्बे माँ ! जगत्जननी कष्टहरणी, सभी के कष्ट हरते हो ।।               चित्र ; साभार गूगल से...

मुक्तक-- 'नसीब'

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इधर  सम्भालते  उधर से छूट जाता है, आइना हाथ से फिसल के टूट जाता है, बहुत की कोशिशें सम्भल सकें,हम भी तो कभी, पर ये नसीब तो पल-भर में रूठ जाता है । सहारा ना मिला तो ना सही , उठ बैठे हम , घाव रिसते रहें, ना पा सके कोई मलहम। जमाना ये न समझे, हम गिरे भी राहों में, होंठ भींचे, मुस्कराये पी गये झट सारे गम । कभी रंगती दिखी हमको भी ये तकदीर ऐसे, लगा पतझड़ गयी अब खिल रही बसंत जैसे, चार दिन चाँदनी के फिर अंधेरी रात सी थी, बदा तकदीर में जो अब बदलता भी कैसे ? फिर भी हारे नहीं चलते रहे, चलना ही था, रात लम्बी थी मगर रात को ढ़लना ही था, मिटा तम तो सवेरे सूर्य ज्यों ही जगमगाया, घटा घनघोर छायी सूर्य को छुपना ही था। अंधेरों में ही मापी हमने तो जीवन की राहें, नहीं है भाग्य में तो छोड़ दी यूँ सुख की चाहें, राह कंटक भरी पैरों को ना परवाह इनकी, शूल चुभते रहे भरते नहीं अब दर्दे-आहें । 🙏हार्दिक अभिनंदन🙏 पढ़िए एक और मुक्तक रचना निम्न लिंक पर ●   प्रवासी (मुक्तक)

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