शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

मुक्तक-- 'नसीब'

broken mirror ;broken hopes

इधर  सम्भालते  उधर से छूट जाता है

आइना हाथ से फिसल के टूट जाता है

बहुत की कोशिशें सम्भल सकें,हम भी तो कभी

पर ये नसीब तो पल-भर में रूठ जाता है


सहारा ना मिला तो ना सही , उठ बैठे हम 

घाव रिसते रहें, ना पा सके कोई मलहम

जमाना ये न समझे, हम गिरे भी राहों में

होंठ भींचे, मुस्कराये पी गये झट सारे गम


कभी रंगती दिखी हमको भी ये तकदीर ऐसे

लगा पतझड़ गयी अब खिल रही बसंत जैसे

चार दिन चाँदनी के फिर अंधेरी रात सी थी

बदा तकदीर में जो अब बदलता भी कैसे...?


फिर भी हारे नहीं चलते रहे, चलना ही था

रात लम्बी थी मगर रात को ढ़लना ही था

मिटा तम तो सवेरे सूर्य ज्यों ही जगमगाया

घटा घनघोर छायी सूर्य को छुपना ही था।


अंधेरों में ही मापी हमने तो जीवन की राहें

नहीं है भाग्य में तो छोड़ दी यूँ सुख की चाहें

राह कंटक भरी पैरों को ना परवाह इनकी

शूल चुभते रहे भरते नहीं अब दर्दे-आहें


39 टिप्‍पणियां:

Meena Bhardwaj ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
Meena Bhardwaj ने कहा…

फिर भी हारे नहीं चलते रहे, चलना ही था
रात लम्बी थी मगर रात को ढ़लना ही था
मिटा तम तो सवेरे सूर्य ज्यों ही जगमगाया
घटा घनघोर छायी सूर्य को छुपना ही था।
हृदयस्पर्शी सृजन सुधा जी ! सभी मुक्तक हृदय मे उतरते हुए।

विश्वमोहन ने कहा…

बहुत सुंदर!

यशवन्त माथुर (Yashwant R.B. Mathur) ने कहा…

बेहतरीन रचना।

Unchaiyaan.blogpost.in ने कहा…

भावपूर्ण प्रस्तुति सुधा जी "आईना फिसलकर छूट जाता"
किन्तु जिन्दगी आईना नहीं सच्चाई है,गिरना उठना ,चोट लगना दर्द की पीड़ा को सह कर भी हार नहीं मानता उसके घाव भी एक दिन मुस्कराते हैं और उसकी जीत पर तालियां बजाते हैं ।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

अंधेरों में ही मापी हमने तो जीवन की राहें

नहीं है भाग्य में तो छोड़ दी यूँ सुख की चाहें

राह कंटक भरी पैरों को ना परवाह इनकी

शूल चुभते रहे भरते नहीं अब दर्दे-आहें
दिल को छूती रचना, सुधा दी।

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना।

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार मीना जी!उत्साहवर्धन हेतु।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.विश्वमोहन जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आदरणीय!

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद रितु जी!
सस्नेह आभार।

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद ज्योति जी!

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद जेन्नी शबनम जी!

Digvijay Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 27 सितम्बर 2020 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Kamini Sinha ने कहा…

"फिर भी हारे नहीं चलते रहे, चलना ही था
रात लम्बी थी मगर रात को ढ़लना ही था"

बहुत ही सुंदर सृजन,नसीब में ना तो ना सही हिम्मत नहीं टूटनी चाहिए,सादर नमन आपको

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद आदरणीय सर! मेरी रचना को पाँच लिंको के आनंद में साझा करने हेतु...
सादर आभार।

Sudha Devrani ने कहा…

जी,कामिनी जी! सादर आभार एवं धन्यवाद आपका उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया हेतु।

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

हर रंग का दर्शन हुआ... पढ़ना सुखद लगा...
साधुवाद

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर सृजन

Onkar ने कहा…

बहुत सुंदर

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत ही सुंदर सृजन।
फिर भी हारे नहीं चलते रहे, चलना ही था

रात लम्बी थी मगर रात को ढ़लना ही था

मिटा तम तो सवेरे सूर्य ज्यों ही जगमगाया

घटा घनघोर छायी सूर्य को छुपना ही था।...वाह !

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 28 सितंबर 2020) को "बेटी दिवस" (चर्चा अंक-3838) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
--
-रवीन्द्र सिंह यादव

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद आदरणीय विभा जी!
आपको अच्छी लगा तो सृजन सार्थक हुआ
सादर आभार।

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ.जोशी जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.ओंकार जी!

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद प्रिय अनीता जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद आ.रविन्द्र जी मेरी रचना को चर्चा मंच पर साझा करने हेतु...
सादर आभार।

आलोक सिन्हा ने कहा…

सच आपकी सभी रचनाएँ बहुत ही मर्म स्पर्शी और मन को छू लेने वाली हैं |

Sudha Devrani ने कहा…

तहेदिल से धन्यवाद आलोक सिन्हा जी!
ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

Madhulika Patel ने कहा…

अंधेरों में ही मापी हमने तो जीवन की राहें

नहीं है भाग्य में तो छोड़ दी यूँ सुख की चाहें

राह कंटक भरी पैरों को ना परवाह इनकी



शूल चुभते रहे भरते नहीं अब दर्दे-आ
,,,,,।
,,,,,, बहुत भावपूर्ण रचना मुझे ये पंक्तिया दिल को छू गई,।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद आ.मधुलिका जी!
ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

बहुत अच्छी एवं भावपूर्ण काव्य-रचना है सुधा जी यह । मन को छू लेने वाली । अभिनंदन ।

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ.माथुर जी!

यशवन्त माथुर (Yashwant R.B. Mathur) ने कहा…

बेहतरीन पोस्ट

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय!
सादर आभार।

ANIL DABRAL ने कहा…

बहुत सुंदर रचना.... फिर उठने का हौसला देती हुई कविता।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद डबराल जी!
सादर आभार।

आलोक सिन्हा ने कहा…

बहुत की कोशिशें सम्भल सकें,हम भी तो कभी पर ये नसीब तो पल-भर में रूठ जाता है | बहुत सुदर | सभी मुक्तक बहुत अच्छे हैं |

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार आपका।