बुधवार, 29 दिसंबर 2021

बिटिया का घर बसायें संयम से

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चित्र,साभारShutterstock.com से

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"क्या
हुआ माँ जी ! आप यहाँ बगीचे में....? और कुछ परेशान लग रही हैं" ? शीला ने सासूमाँ (सरला) को घर के बगीचे में चिंतित खड़ी देखा तो पूछा। 

तभी पीछे से सरला का बेटा सुरेश आकर बोला,

"माँ !  आप  निक्की को लेकर वही कल वाली बात पर परेशान हैं न ? माँ आप अपने जमाने की बात कर रहे हो, आज जमाना बदल चुका है । आज बेटा बेटी में कोई फर्क नहीं । और पूरे दस दिन से वहीं तो है न निक्की।और कितना रहना, अब एक चक्कर तो अपने घर आना ही चाहिए न। आखिर हमारा भी तो हक है उसपे " ।

"बस !  तू चुप कर ! बड़ा आया हक जताने वाला...

अरे ! अगर वो खुद ही मना कर रही है तो कोई  काम होगा न वहाँ पर...।  कैसे सब छोड़ -छाड़ दौड़ती रहेगी तुम्हारे कहने पर वो " सरला ने डपटते हुए कहा।

"वही तो माँ ! काम होगा ! और काम करने के लिए बस हमारी निक्की ही है ? और कोई नहीं उस घर में? नौकरानी नहीं वो बहू है उस घर की।अरे ! उसको भी हक है अपनी मर्जी से जीने का"। सुरेश चिढ़कर बोला। 

"हाँ ! हक है ।  किसने कहा कि नहीं है उसका हक ?  हो सकता है उसकी खुद की मर्जी न हो अभी यहाँ आने की"।  

"नहीं माँजी निक्की तो खुश ही होगी न अपने घर आने में....जरूर उसे मना किया होगा उन्होंने ।  मुझे तो लगता है अभी से तेवर दिखाने लग गये हैं उसके सासरे वाले"। (शीला सास की बात बीच में ही काटते हुए बोली)

तभी सुरेश भी बोला;  "माँ ! आप तो जानती हैं न । आजकल क्या क्या सुनने को मिल रहा है , ससुराल में बहुओं से कैसा - कैसा व्यवहार कर रहे हैं लोग । अगर ध्यान नहीं दिया तो वे हमें कमजोर समझेंगे और फिर"...

"ना बाबा ना ! जाइये जाकर तैयार हो जाइये आज के आज ही निक्की को वापस घर ले आइये,  मेरा तो मन बैठा जा रहा है"।  शीला बेचैन होकर बोली।

दोनों की बातें सुन सरला खिन्न मन चुपचाप बगीचे में जाकर खुरपी से मिट्टी खुरचने लगी...

तो सुरेश झुंझलाकर बोला, "माँ ! आज बहुत ठंड है, देखो न तबियत बिगड़ जायेगी।पहले ही निक्की की टेंशन  कम है क्या ? क्या काम है यहाँ? मैं माली बुला देता हूँ उससे करवा लेना"।

नहीं माली की जरूरत नहीं मैं देख लुँगी , उखड़े स्वर में सरला बोली।

पर बेटे बहू दोनों जिद्द करने लगे तो उसने कहा ठीक है आती हूँ बस इस पौधे को जरा वहाँ रोप दूँ।

सुनकर दोनों बोले, "फिर से वहाँ?... 

 "माँजी आपने परसों ही तो इसे वहाँ से यहाँ लगाया, अब फिर वहीं क्यों "? शीला ने झुंझलाकर कहा तो सरला बोली;

"परसों कहाँ पूरे दस दिन हो गये अब वहीं वापस लगाती हूँ ...देखो पनप ही नहीं रहा ढंग से"!

"पर माँजी अभी तो ये जड़ पकड़ रहा होगा आप फिर उखाड़ेंगे तो कैसे पनपेगा"?

सुरेश भी बोला ,  "हाँ ! माँ ! वहीं रहने दो न उसे। कभी इधर कभी उधर कैसे पनपेगा बेचारा ! पता नहीं आप इसी के पीछे क्यों पड़ गयी हैं इसके साथ के बाकी पौधों पर फूल भी खिलने लग गये हैं,और ये बेचारा पनप तक नहीं पाया अभी" !

सुनकर सरला झुकी कमर लिए ही बगीचे से बाहर आयी और धीरे-धीरे बामुश्किल कमर सीधी करते हुए दोनों को देखकर बोली, "बात तो सही कही तुम दोनों ने...

कभी इधर -कभी उधर कैसे पनपेगा ये पौधा ?  और देखो पनप भी तो नहीं रहा...है न" ।

"वही तो"..."दोनों एक साथ बोले"।

"बड़े समझदार हो फिर निक्की के साथ ऐसा क्यों कर रहे हो ?  समझते क्यों नहीं कि बेटी भी तो ऐसे ही मायके के आँगन से उखाड़ कर ससुराल के आँगन में रोप दी जाती है। और फिर उसे भी पनपने में वक्त तो लगता ही है।  पर तुम उसे झट से यहाँ बुला देते हो, बार बार फोन कर उनके घर के निजी मामले पूछ-पूछकर जबरदस्ती अपनी राय थोपते हो।

उसे वहाँ के माहौल के हिसाब से ढ़लने ही नहीं दे रहे हो बल्कि अपने ही हिसाब से चलाये जा रहे हो। क्यों" ? (तैश में बढ़ते स्वर को संयत करते हुए सरला आगे बोली)

"क्या हमारी निक्की पढ़ी-लिखी और समझदार नहीं है?   क्या तुम्हें उसकी काबिलियत पर शक है?

क्यों उसकेऔरअपने मन में ससुराल को लेकर शक और नकारात्मकता भर रहे हो ?

माता-पिता हो तुम दोनों उसके,  बिन सोचे-समझे तुम पर भरोसा कर जैसा तुम कहते हो वैसा कर और बोल रही है वो।

उसे वहाँ की परिस्थिति के अनुकूल सोच-समझकर व्यवहार करने की सीख दो न !

अपने मनसूबे और विचार उस पर मत थोपो"! कहते हुए सरला बरामदे में आकर वहीं रखे मोड़े में बैठ गयी।

सुरेश  माँ के पास आकर समझाते हुए बोला, "माँ ! हम निक्की का भला ही तो चाहते हैं न  ! उसके ससुराल वालों से थोड़ा होशियार होकर तो रहना ही होगा न ! देखा न आजकल जमाना कित्ता खराब है। ध्यान तो देना होगा न माँ! है न"...।

शीला ने भी हामी भरी, तो सरला बोली,

"जमाने को छोड़ो ! ये मत भूलो कि ससुराल निक्की का अपना घर है और वहाँ के लोग उसके अपने।अपनायेगी तभी सबका अपनापन भी पायेगी।

कही-कहाई सुनी-सुनाई सुनकर मन में ऐसे ही विचार आते हैं । और फिर तो सही भी गलत लगने लगता है।

हर बात के दो पहलू तो होते ही हैं। हो सकता है तुम दूसरा पहलू समझ ना पाये हों।

ऐसे ही राई का पहाड़ बनाते रहे न,  तो बिटिया का घर बसने से पहले ही उजाड़ दोगे तुम।

फिर समझाते हुए बोली, "अरे बेटा!  मैं ये नहीं कह रही कि उसे उसके हाल पर छोड़ दो। उसकी परवाह न करो!

पर जैसे पढ़ाई के दौरान परीक्षाएं दी न उसने,ठीक वैसे ही जीवन की परीक्षाएं भी देने दो उसे।

 विश्वास रखो ! वह पहले जैसी ही इस परीक्षा में भी अब्बल आयेगी और जीना सीखेगी वह भी हिम्मत से....।

कहीं पिछड़ेगी तो हम सब हैं न।

जाँच-परखकर रिश्ता ढूँढा है न तुमने उसके लिए।अपने चयन और अपनी परवरिश पर भरोसा रखो !और थोड़ा संयम रखो ! बाकी सब परमात्मा की मर्जी"। कहकर वह अन्दर आ गयी।

थोड़ी देर बाद निक्की का फोन आया तो सुरेश ने माँ के सामने आकर ही फोन उठाया और बोला, "कोई बात नहीं बेटा ! आज नहीं आ सकते तो कोई नहीं जब समय मिले तब आना, हाँ अपनी सासूमाँ और बाकी घर वालों से राय मशबरा करके । ठीक है बेटा!  अपना ख्याल रखना"।

सुनकर सरला ने संतोष की साँस ली ।


शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

पुस्तक समीक्षा - 'कासे कहूँ'

 

Book review

मन की महकी गलियों में,

बस दो पल हमें भी घर दो ना!

लो चंद मोती मेरी पलकों के

मुस्कान अधर में भर लो ना!

प्यार और मनुहार से अधरों में मुस्कान अर्पण कर 'कासे कहूँ , हिया की बात' तक  विविधता भरी संवेदना के चरम को छूती पूरी इक्यावन कविताओं का संग्रह  ब्लॉग जगत के स्थापित हस्ताक्षर एवं जाने -माने साहित्यकार पेशेवर इंजीनियर आदरणीय 'विश्वमोहन जी' के द्वितीय संग्रह 'कासे कहूँ'  के रूप में साहित्य जगत के लिए अनमोल भेंट है।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी आदरणीय विश्वमोहन जी एवं उनकी पुस्तक के विषय में विभिन्न शिक्षाविद् भाषाविद् एवं प्रतिष्ठित साहित्यकारों के आशीर्वचन  पुस्तक को और भी आकर्षक बना रहे हैं।

प्रस्तुत संग्रह की प्रथम कविता 'सपनों का साज' ही मन को बाँधकर सपनों की ऐसी दुनिया में ले जाता  है कि पाठक का मन तमाम काम-धाम छोड़ इसकी अन्य सभी रचनाओं के आस्वादन के लिए विवश हो जाता है।

चटक चाँदनी की चमचम

चंदन का लेप लगाऊँ

हर लूँ हर व्यथा थारी

मन प्रांतर सहलाऊँ।

आ पथिक, पथ में पग-पग-

सपनों के साज सजाऊँ।

 सहज सरल भाषा में आँचलिकता की मिठास एवं अद्भुत शब्दसंयोजन पाठक को विस्मित कर देता है।

जज्बातों की खूबसूरती एवं विभिन्न अलंकारों से अलंकृत आपकी समस्त रचनाओं में भावों की प्रधानता को तो क्या ही कहने!!!

प्राची से पश्चिम तक दिन भर

खड़ी खेत में घड़ियाँ गिनकर।

नयन मीत में टाँके रहती,

तपन प्यार का दिनभर सहती।

क्या गुजरी उस सूरजमुखी पर,

अँधियारे जब डाले पहरे।

तुम क्या जानो , पुरुष जो ठहरे!

'तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे' कविता में कवि की नारीभावना उजागर हुई है।

 नारी के प्रति श्रद्धा एवं सम्मान इनकी कविताओं में यत्र-तत्र पल्लवित एवं पुष्पित हुआ है

 'जुलमी फागुन! पिया न आयो। में नारी के प्रति संवेदना हो या फिर 'नर-नपुंसक' में युग-युग से नारी शोषण व अत्याचार पर दम्भी कायर पुरुषत्व को फटकार।👇👇

राजनीति या राजधरम यह,

कायर नर की अराजकता है।

सरयू का पानी भी सूखा,

अवध न्याय का स्वाँग रचता है


हबस सभा ये हस्तिनापुर में,

निरवस्त्र फिर हुई नारी है।

अन्धा राजा, नर-नपुंसक,

निरलज ढीठ रीत जारी है!

आपके दृष्टिकोण में नारी के प्रति संवेदना ही नहींअपितु अपार श्रद्धा भी है जो आपकी  कविता 'नर-नारी' और  'परमब्रह्म माँ शक्ति-सीता' एवं समस्त सृजन में भी साफ दृष्टिगोचर होती है

कवि नारी को पुरुष से श्रेष्ठ एवं अत्यधिक सहनशील मानते हुए कहते हैं कि

मातृ-शक्ति, जनती-संतति,

चिर-चैतन्य, चिरंतन-संगति।

चिन्मय-आलोक, अक्षय-ऊर्जा,

सृष्टि सुलभ सुधारस सद्गति।


प्रतीक बिम्ब सब राम कथा में,

कौन है हारा और कौन जीता।

राम भटकता जीव मात्र है

परमब्रह्म माँ शक्ति-सीता।

माँ शक्ति-सीता परमब्रह्म एवं  श्रीराम जीव मात्र!

नारी के प्रति श्रद्धा श्रेष्ठता और सम्मान के ऐसे उदाहरण आपके सृजन में यत्र-तत्र उद्धृत हैं ।

कवि हमेशा सीमाएं तोड़ता है।चाहे वह आर्थिक हो राजनीतिक हो या फिर सामाजिक। 

'कासे कहूँ' में अपने  बेबाक एवं धारदार लेखन से सम सामयिकी,  मीडिया, सियासत और  अन्य व्यवस्थाओं की धांधलेबाजियों  पर करारा कटाक्ष करते हुए कवि  कहते हैं कि..

कैसलेस, डिजिटल समाज,

मंदी....फिर...आर्थिक बुलंदी।

जन-धन आधार माइक्रो एटीएम

आर्थिक नाकेबन्दी!जय नोटबंदी!!

ऐसे ही आह नाजिर! और वाह नाजिर!में देखिये...

जहाँ राजनीति का कीड़ा है 

वहीं भयंकर पीड़ा है।

जय भारत जय भाग्य-विधाता,

जनगण मनधन खुल गया खाता।

दिग्भ्रमित लेखकों और पत्रकारों पर कटाक्ष है 'पुरस्कार वापसी'...

कलमकार कुंठित- खंडित है

स्पंदनहीन  हुआ दिल है।

वाद पंथ के पंक में लेखक,

विवेकहीन मूढ़ नाकाबिल है।।

दल-दलदल में हल कर अब,

मिट जाने का अंदेशा है।

साहित्य-सृजन अब मिशन नहीं,

पत्रकार-सा पेशा है।।

डेंगू काल में चिकित्सा व्यवस्था के गिरते स्तर पर करारी चोट...

'प्लेटलेट्स की पतवार फँसी 'डेंगी'में।

धन्वन्तरी के धनिक अनुयायी

चिकित्सा की दुकान 

पर बैठे व्यवसायी

कुत्सित-चित्त

धिक-धिक पतित।

कोरोना काल की त्रासदी और लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की पीड़ा तथा शहरी एवं सरकारी उपेक्षा पर...

छुप गये सारे सियार , अपनी माँद में।

अगर पहले ही कोई कह देता 

"आओ ,रहो ,ठहरो

अब तक तमने खिलाया 

अब हमारी भी थोड़ी खाओ


वह 'नीति-निष्ठुरवा' नहीं  न बकबकाता

कवि समाज में फैली बुराइयों रूढियों में जकड़ी जिंदगियों और दरकती मानवीय संवेदनाओं से व्यथित होकर कहते हैं

गाँजे का दम

हाकिम की मनमानी।

दारू की तलाशी

खाकी की चानी

कुटिल कौम ! कैसी फितरत!में सियासत का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए कवि कहते हैं..

सियासत की सड़ी सड़कों पर,

गिद्ध चील मंडराते हैं।

बच्चों की लाशों को जुल्मी,

नोंच -नोंच कर खाते हैं।

तमाम विसंगतियों और विडम्बनाओं में भी कवि आशा का दामन नहीं छोड़ते कवि के अनुसार 'आशा का बीज' कहीं न कहीं अंकुरित हो ही जाता है.....

मरा मानव

पर जागी मानवता

दम भर छलका करूणा का अमृत

थामने को बढ़े आतुर हाथ,

और बाँटने को 

आशा का नया बीजन।

समवेत स्वर।

सृजन!सृजन!!सृजन!!!

विलुप्त होती गौरैया हो या भोर-भोरैया कवि की लेखनी से कोई भी विषय अछूता नहीं है...फिर रिश्तों की तो बात ही क्या... 

'बाबूजी'  में देखिये मध्यमवर्गीय परिवार का ऐसा हृदयस्पर्शी शब्दचित्रण भावुक कर देता है...

कफ और बलगम नतमस्तक!

अरमान तक घोंटने में माहिर,

जेब की छेद में अँगुली नचाते

पकता मोतियाबिंद, और पकाते

सपनों के धुँधले होने तक!

बाबूजी की आँखों में, रोशन अरमान

बच्चों के बनने का सपना!

ऐसे ही समूचे देश के 'बापू' को एक हृदयस्पर्शी  आवाहन ...

उठ न बापू ! जमना तट पर ,

क्या करता रखवाली?

'गरीबन के चूल्हा' /पानी - पानी/ बैक वाटर/बेटी बिदा/मृग मरीचिका/रिश्तों की बदबू/आस्तीन का साँप /पंथ-पंथ मौसेरे भाई'दुकान से दूर । साहित्यकार,'भूचाल, फुटपाथ, जनता जनार्दन की जय आदि जैसे बरबस आकर्षित करते शीर्षक हैं वैसी ही अप्रतिम  एवं गहन चिंतनपरक रचनाएं भी।

 ऐसी कविताएं भावनाओं की प्रसव पीड़ा के उपरान्त ही जन्म लेती हैं जिनमें सृजनात्मकता एवं गहन अनुभूति का चरमोत्कर्ष होता है।

भोर भिनसारे,कउआ उचरे,

छने-छने,मन भरमात।

जेठ दुपहरिया, आग लगाये,

चित चंचल , अचकात।

कासे कहूँ, हिया की बात!

अनेकानेक विसंगतियों की विकलता विविधतापूर्ण सृजनात्मकता आकुल कवि मन कहे तो किससे कहे। अतः ,'कासे कहूँ' शीर्षक पुस्तक को सार्थकता प्रदान करता है।

'कासे कहूँ' पूर्ण साहित्यिक पुस्तक पाठक को अपने काव्याकर्षण में बाँध सकने में पूर्णतः सक्षम है।

फिर भी समीक्षा के नियमों के तहत पुस्तक की आलोचना करूँ तो मेरे हिसाब से 

●अनुक्रमणिका में कविताओं कोअलग-अलग भागों में(विषयवस्तु के आधार पर)बाँटते हुए  क्रमबद्ध किया होता,  शायद ज्यादा बेहतर होता।

● कविताओं में लिखे आँचलिक भाषा के शब्दों का हिन्दी अर्थ जैसे पुस्तक के अंतिम पृष्ठ में दिये हैं हर कविता के अंत में होते तो रचनाएं सभी को समझने में और भी सुलभ होती।

इसके अलावा काव्य सृजन की दृष्टि से सभी कविताएं बेहद उत्कृष्ट हैं भाषा में प्रवाह है कविता में लय एवं शिल्प सौन्दर्य है।खूबसूरत कवरपृष्ठ के साथ प्रस्तुत संग्रह सभी काव्य प्रेमियों एवं साहित्य सेवियों के लिए अत्यंत संग्रहणीय एवं पठनीय पुस्तक है

यदि आप समीक्षा पढ़ रहे हैं तो संग्रह भी अवश्य पढ़िएगा ताकि इस समीक्षा की सत्यता को जाँच सकें।

उत्तम संग्रह हेतु मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।


पुस्तक :  कासे कहूँ

लेखक : © विश्वमोहन

प्रकाशक :  

विश्वगाथा, सुरेन्द्रनगर - 363 002, गुजरात

मूल्य: 150/-

आप निम्न लिंक से पुस्तक प्राप्त कर सकते हैं

https://www.amazon.in/Kase-kahu-Vishwamohan/dp/8194261090/ref=sr_1_1?crid=3GKSK4ZBVWNWF&keywords=kase+kahu&qid=1640337321&s=books&sprefix=kase+kahu+%2Cstripbooks%2C183&sr=1-1




बुधवार, 15 दिसंबर 2021

सेवानिवृत्ति ; पत्नी के भावोद्गार

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चित्र साभार pixabay.com से


रिटायरमेंट करीब होने पर जब पति ने पत्नी के मन की जाननी चाही तो एक पत्नी के भावोद्गार....


जब से प्रेम किया

तभी से सह रहे हैं विरह वेदना

तभी तो विवाहोपरांत युवावस्था में ही

बूढ़े हो जाने की चाहना की।


बुढ़ापे की चाहना !..?


हाँ ! बुढ़ापे की चाहना !

जानते हो क्यों ?

क्योंकि हमारे बुढापे में ही तो

समाप्त होगी न हमारी 

ये विरह वेदना !!...

आपकी सेवानिवृत्त होने पर ।


आज यहाँ कल वहाँ

आपका भी न......


कुछ कह भी तो न पायी आपसे

क्योंकि जानती हूँ 

आप भी ऐसा कहाँ चाहते कभी

बस मजबूरी जो थी।


प्रेम तो अथाह रहा दूरियों में भी 

परन्तु फिर भी 

कुछ अधूरा सा रहा रिश्ता हमारा

लड़ने-झगड़ने, रूठने मनाने का

वक्त जो न मिल पाया

है न....



चन्द छुट्टियाँ आपकी 

घर गृहस्थी की तमाम उलझनें

बड़ी समझदारी से सुलझाते हम

प्यार-प्यार में दूर हो गये एक दूसरे से

बिन लड़े-झगडे़ बिन रूठे-मनाये ही

हमेशा...

मानते तो हैं न आप भी ।


जानती हूँ सेवानिवृत्ति से 

आप तो खुश ना होंगे 

सभी की तरह

पर मैं इन्तजार में हूँ 

उस दिन के

सदा-सदा से.....



बस फिर साथ होंगे हम 

हर-लम्हा, हर-पल

बहुत हुआ प्यार और समझदारी 

अब नासमझी का वक्त आया है

रूठने मनाने का वक्त 

प्रेम की इंतहा का वक्त

मंजूर तो है न....

आपको भी !!




शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

पुस्तक समीक्षा - 'समय साक्षी रहना तुम'

 

'
Book review
'समय साक्षी रहना तुम'

अतल गहराइयों में आत्मा की   

जो भरेगा उजास नित - नित

गुजर जायेंगे दिन महीने

ना होगा आँखों से ओझल किंचित

हो न जाऊँ तनिक मैं विचलित

प्राणों में धीरज भर देना तुम

अपने अनंत प्रवाह में बहना तुम ,

पर समय साक्षी  रहना तुम!!

जी हाँ! दोस्तों! समय साक्षी रहना तुम' ये 'क्षितिज' की उजास है जो ब्लॉग जगत से अब साहित्य जगत तक चमकने लगी है।


*समय साक्षी रहना तुम* पूर्णतया साहित्यिक पुस्तक ब्लॉग जगत की प्रतिष्ठित लेखिका एवं मेरी प्रिय सखी परम विदुषी*रेणु बाला जी*की प्रथम पुस्तक के रूप में सभी साहित्य प्रेमियों एवं सुधि पाठकों के लिए एक अनमोल भेंट है।

बहुत ही मनमोहक कवर पृष्ठ के साथ प्रथम पेज में लेखिका ने अपने स्नेहमयी एवं संस्कारवान स्वभाव के अनुरूप इसे अपने बड़ों को अपने जीवन का जीवट एवं सशक्त स्तम्भ बताते हुए सादर समर्पित किया है

तदन्तर  सुप्रसिद्ध ब्लॉगर एवं स्थापित साहित्यकार अत्यंत सम्मानीय आदरणीय विश्वमोहन जी की चमत्कृत लेखनी से उदृत भूमिका इसकी महत्ता को बढ़ाते हुए इसे और भी रूचिकर बना रही है।

साथ हीअन्य प्रसिद्ध ब्लॉगर साथियों के आत्मीय उद्गारों के साथ विषय सूचि को चार भागों में विभाजित किया गया है।

जिसमें माँ सरस्वती की वंदना के साथ शुरू प्रत्येक भाग में एक से बढ़कर हृदयस्पर्शी एवं मानवीय संवेदनाओं को जगाती रिश्तों के स्नेहिल बंधन, कुदरत के पैगाम, भाव प्रवाह,और समसामयिक विषयों पर आधारित सहज सरल भाषा में कुल मिलाकर 65 रचनाएं सुसज्जित हैं।

प्रथम भाग में कवयित्री ने देश की संस्कृति के अनुरूप माँ सरस्वती की ही नहीं अपितु पूज्य गुरुदेव के साथ -साथ अपने गाँव,  देश के प्रहरी हिमालय एवं देश की रक्षा में जान न्योछावर करते शहीदों का भी वंदन किया है ।  

आज जब पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित युवाओं में संस्कृति का ह्रास दिख रहा है,तब अति आवश्यकता है ऐसे साहित्य की जो याद दिला सके हमें हमारी संस्कृति और संस्कार।   

जहाँ जीव मात्र तो क्या सृष्टि के कण -कण में प्रभु का वास माना जाता है ....पूज्यनीय रही है देश एवं जन्मस्थान की माटी युगों -युगों से।

स्वयं भगवान श्री राम जब चौदह वर्षों के वनवास हेतु निकले तो साथ में अपनी अयोध्या की मिट्टी भी पोटली में साथ ले गये ।और नित्यप्रति उसका वंदन करते थे।

ऐसे ही हमारे ग्रंथ एवं इतिहास साक्ष्य हैं हमारी संस्कृति के जहाँ पेड़ पौधे पर्वत नदियों एवं सभी चर अचराचर का सम्मान एवं वंदन किया जाता है।

फिर बेटी की तो बात ही क्या...असीम अनुराग होता है अपने मायके से उसे...।अपने गाँव की वंदना में कवयित्री गाँव की माटी तो क्या वहाँ की सुबह शाम का भी वंदन करती है...अपने गाँव एवं सभी गाँववालों की खुशहाली की कामना में बहुत ही हृदयस्पर्शी एवं भावपूर्ण पंक्तियाँ...👇

ना आये बला कोई ना हो कभी बेहाल तू

ले बेटी की दुआ सदा रहे खुशहाल तू

रौशन रहे उजालों से सुबह शामें तेरी

अपनी चौखट पे सजा खुशी की ताल तू

लहराती रहें हरी फसलें तेरी

मुरझाये ना कभी हरियाला सावन तेरा

तुझसे अलग कहाँ कोई परिचय मेरा?

तेरे संस्कारों में पगा तन-मन मेरा!!!

सभी पूज्यनीयों के वंदन के बाद दूसरे भाग में जीवन के बजूद से जुडे़ सबसे महत्वपूर्ण हिस्से हमारे रिश्ते और इनसे जुड़ी बहुत ही भावपूर्ण कविताएं है...

👇👇👇

माँ बनकर ही मैंने 

तेरी ममता को पहचाना है

माँ बेटी का दर्द का रिश्ता 

क्या होता ये जाना है

दिल को छूती इस भावपूर्ण कविता की सराहना के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास....ऐसे ही हर एक रिश्ते पर एक से बढ़कर उत्कृष्ट रचनाएं 'स्मृति शेष पिताजी', बिटिया, ये तेरी मुस्कान लाडली, धीरे-धीरे पग धरो सजनिया, नवजात शिशु के लिए, ओ नन्हें शिशु, नन्हे बालक, जिस पहर से, बूढ़े बाबा, भाई! तुम हो अनमोल, घर से भागी बेटी के नाम।सभी रचनाएं नेह एवं अपनेपन से ऐसी ओतप्रोत हैं कि पाठक इनमें स्वयं के देखने लगे।

तृतीय भाग-कुदरत के पैगाम में आप समझ सकतें हैं कि कुदरत पर आधारित कविताएं हैं ।अब प्रकृति की सुन्दरता एवं अचरजों से भला कवयित्री की कलम कैसे अछूती रह सकती है.....

औरआप जानते हैं कवि की कल्पनाशीलता और प्रकृति दर्शन का भी अनोखा ही दृष्टिकोण होता है ।

बादल आवारा हैं पर उपकारी हैं इनके बिना धरती का श्रृंगार एवं सृजन असम्भव है...अद्भुत शब्द संयोजन के साथ गुँथी इस कविता को जितनी बार पढ़ो उतना कम है।

इसके अलावा अन्य कविताएं- ओ, री तितली! , सुनो गिलहरी !, पेड़ ने पूछा चिड़िया से , आई आँगन के पेड़ पे चिड़िया , चलो नहाएं बारिश में, ओ शरद पूर्णिमा के शशि नवल! ,चाँद फागुन का,  मरुधरा पर, गाय बिन बछड़ा' जैसे मनमोहक एवं बरबस आकर्षित करते ये शीर्षक हैं वैसी ही रचनाएं भी हैं जिन्हें जितनी बार पढ़ो मन ही भरता।

अब चतुर्थ एवं अंतिम भाग के तो कहने ही क्या !मन्त्रमुग्ध करती रचनाएं पाठक को निःशब्द करती हैं मेरी लेखनी में इतना दम ही कहाँ कि इनकी समीक्षा कर सके.......हर एक रचना प्रेम की रूहानियत से सरोवार है...आप स्वयं ही देख लीजिए👇

सब कुछ था पास मेरे

फिर भी कुछ ख्वाब अधूरे थे

तुम संग जो बाँटे,

मन के संवाद अधूरे थे

जीवन से ओझल साथी

ये उमंगों के सिलसिले थे

जब हम तुमसे ना मिले थे।

ये तो तब की रूहानियत है जब मिले भी न थे जब मिले तब कैसा होगा !! सोच भी नहीं सकते...उस "चाँदनगर -सा गाँव तुम्हारा" इस बारे मे तो कहना ही क्या!!!कैसा होगा वो गाँव?है न......

फिर मिलन की वो रात जिसमे चाँद साक्षी हो...और मिलन के बाद  वो बिछड़न 'तुम्हारे दूर जाने पर' फिर तुम्हारे आने का इंतजार 'राह तुम्हारी तकते-  तकते' निष्ठुर पिया के तब भी ना लौटने पर 'मन पाखी की उड़ान'  !!!!

अहा ! सिर्फ शीर्षक ही पूरे लिखूँ तो एक कहानी बन जाय ! पर अपनी बोरिंग सी लेखनी से आप सभी को और बोर नहीं करती.... है न...वैसे भी अब तो आप भी पुस्तक पढ़ ही लेंगे।

देखिये ये रचना क्या कहती है आपसे।👇

निःशब्द हो सहेज लेना

अक्षय स्नेहकोश मेरा

याद रखना ये स्नेहिल पल

भुला देना हर दोष मेरा,

दूर आँखों से हो जाओ

ये सजा कभी मत देना तुम

मेरे साथ यूँ ही रहना तुम

कभी अलविदा ना कहना तुम!!

अंततः मैं कह सकती हूँ कि यदि साहित्य प्रेमी होकर आपने ये पुस्तक*समय साक्षी रहना तुम*ना पढ़ी तो क्या ही पढ़ा।

     👇👇👇

     रहेगी ये खुमारी

    मिटेगी हर दुश्वारी

    भले ना जुड़ सके हम

     जुड़ेंगी रूहें हमारी

     और फिर मिलेंगे

     जीवन के पार ह

   *समय साक्षी रहना तुम*

      🙏🙏🙏🙏🙏

    जरूर याद रखना दोस्तों!!!

     समय साक्षी रहना तुम

             (कविता संग्रह)

              रचनाकार

             *रेणु बाला*

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मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

गुलदाउदी--"आशान्वित रहूँगी, अंतिम साँस तक"

 

Gudaudi flower
चित्र, साभार pixabay से

यूँ ही ऊबड़-खाबड़ राह में

पैरों तले कुचली मलिन सी

गुलदाउदी को देखा ...


इक्की-दुक्की पत्तियाँ और 

कमजोर सी जड़ों के सहारे

जिन्दगी से जद्दोजहद करती

जीने की ललक लिए...

जैसे कहती, 

"जडे़ं तो हैं न 

काफी है मेरे लिए"...


तभी किसी खिंचाव से टूटकर

उसकी एक मलिन सी टहनी

जा गिरी उससे कुछ दूरी पर

अपने टूटे सिरे को 

मिट्टी में घुसाती 

पनाह की आस लिए

जैसे कहती,

"माटी तो है न...

काफी है मेरे लिए"।


उन्हें देख मन बोला,

आखिर क्यों और किसलिए 

करते हो ये जद्दोजहद ?

बचा क्या है जिसके लिए 

सहते हो ये सब?


अरे! तुमपे ऊपर वाले की

कृपा तो क्या ध्यान भी न होगा ।

नहीं पनप पाओगे तुम कभी !

छोड़ दो ये आशा... !!


पर नहीं वह तो पैर की 

हर कुचलन से उठकर 

जैसे बोल रही थी ,

"आशान्वित रहूँगी,अंतिम साँस तक"


व्यंग उपेक्षा और तिरोभाव 

की हंसी हँस आगे बढ़ 

छोड़ दिया उसे मन ने

फिर कभी न मिलने 

न देखने के लिए।


बहुत दिनों बाद पुनः जाना हुआ 

उस राह तो देखा !!

गुलदाउदी उसी हाल में 

पर अपनी टहनियां बढ़ा रही

दूर बिखरी वो टहनी भी 

वहीं जड़ पकड़ जैसे

परिवार संग मुस्कुरा रही

अब कुछ ना पूछा न सुना उससे

बस वही व्यंग और उपेक्षित हंसी

हंसकर मन पुनः बोला....

"बतेरे हैं तेरे जैसे इस दुनिया में 

जो आते हैं... जाते हैं ...

खरपतवार से ।

पर उसकी कृपा बगैर 

नहीं पनप पाओगे तुम कभी

छोड़ दो ये आशा....!!!


लेकिन वह एक बार फिर 

मौन ही ज्यों बोली

जीवटता में जीवित हूँ

कोई तो वजह होगी न...

"आशान्वित रहूँगी,अंतिम साँस तक"


मन की अकड़ थोड़ा 

ढ़ीली तो पड़ ही गयी 

उसका वो विश्वास मन के

हर तर्क को जैसे परास्त कर रहा था।


इतनी विषमता में जीने की उम्मीद !

सिर्फ जीने की या खुशियों और 

सफलताओं की भी ?....

क्या सच में कोई वजह होगी ?

सचमुच फुर्सत होगी इन्हें देखने की 

ऊपर वाले को ?


इसका टुकड़ा-टुकड़ा

पुनः नवनिर्माण को आतुर है

जिजीविषा की ऐसी ललक !

हद ही तो है न  !!!

पर क्यों और कैसे ?


जबकि मानव तो थोड़ी विषमता में

आत्मदाह पर उतारू है..

 फिर इसमें इतना विश्वास और आस !

इस जीवटता में भी ! 

उफ्फ ! !


गुलदाउदी अब मन की सोच 

में रहने लगी थी ।

तभी एक दिन सहसा एक मीठी सुगन्ध

हवा के झोंके के संग आकर बोली ; 

"पहचानों तो मानूँ "!


सम्मोहित सा मन होशोहवास खोये

चल पड़ा उसके पीछे-पीछे....


मधुर खिलखिलाहट से

तन्द्रा सी टूटी...

देखा कितनी कलियाँ उस 

गुलदाउदी से फूटी !


अहा ! मन मोह लिया

उन असंख्य कलियों ने

मधुर सुगन्ध फैली थी

ऊबड़-खाबड़ गलियों में.....


अब तो ज्यों त्योहार मना रही थी गुलदाउदी !

ताजे खिले पीले फूलों पर 

मंडराते गुनगुनाते भँवरे !

इठलाती रंग-बिरंगी तितलियाँ !

चहल-पहल थी बहुत बड़ी।


कुचलने वाले पैर भी 

अब ठिठक कर देख रहे थे

सब्र का फल और आशा

का ऐसा परिणाम  !

शिशिर की ठिठुरन और पतझड़ में ।

खिलखिलाती गुलदाउदी पर

मंत्र-मुग्ध हो रहे थे....


आश्चर्य चकित सा मन भी मान गया था 

जीवटता में जिलाये रखने की वजह।

अपनें हर सृजन पर 

उसकी असीम अनुकम्पा !


खुशियाँ मनाती गुलदाउदी को

हौले से छूकर पूछा उसने 

"राज क्या है बता भी दो"?

इस पतझड़ में भी खिली हो यूँ

मेहर  है किसकी जता भी दो ?


गुलदाउदी खिलखिलाकर बोली, 

"राज तो कुछ भी नहीं 

हाँ मेहर है ऊपर वाले की

उसके घर देर है अंधेर नहीं  !




गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

चल जिंदगी तुझको चलना ही होगा

 

Winter weather
चित्र, साभार pixabay से..

हर इक इम्तिहा से गुजरना ही होगा

चल जिंदगी तुझको चलना ही होगा


 रो-रो के काटें , खुशी से बिताएं 

 है जंग जीवन,तो लड़ना ही होगा


बहुत दूर साहिल, बड़ी तेज धारा

संभलके भंवर से निकलना ही होगा


शरद कब तलक गुनगुनी यूँ रहेगी

धरा को कुहासे से पटना ही होगा


मधुमास मधुरिम सा महके धरा पर

तो पतझड़ से फिर-फिर गुजरना ही होगा


ये 'हालात' मौसम से, बनते बिगड़ते

डर छोड़ डट आगे बढ़ना ही होगा


बिखरना नहीं अब निखरना है 'यारा'

कनक सा अगन में तो तपना होगा ।।


गई शरद आया हेमंत

गई शरद आया हेमंत , हुआ गुलाबी दिग दिगंत । अलसाई सी लोहित भोर, नीरवता पसरी चहुँ ओर । व्योम उतरता कोहरा बन, धरा संग जैसे आलिंगन । तुहिन कण मोत...