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मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

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  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

राजनीति और नेता

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             आज मेरी लेखनी ने  राजनीति की तरफ देखा,  आँखें इसकी चौंधिया गयी  मस्तक पर छायी गहरी रेखा।                                                                                   संसद भवन मे जाकर इसने     नेता देखे बडे-बडे,  कुछ पसरे थे कुर्सी पर ,      कुछ भाषण देते खडे-खडे।                                 कुर्सी का मोह है ,         शब्दों में जोश है,  विपक्ष की टाँग खींचने का       तो इन्हें बडा होश है।                      लकीर के फकीर ये,और        इनके वही पुराने मुद्दे,   ...

प्रकृति की रक्षा ,जीवन की सुरक्षा

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       ो उर्वरक धरती कहाँ रही अब सुन्दर प्रकृति कहाँ रही अब  कहाँ रहे अब हरे -भरे  वन ढूँढ रहा है जिन्हें आज मन                            तोड़ा- फोड़ा इसे मनुष्य ने    स्वार्थ -सिद्ध करने  को      विज्ञान का नाम दे दिया     परमार्थ सिद्ध करने को     सन्तुलन बिगड़ रहा है  अब भी नहीं जो सम्भले   भूकम्प,बाढ,सुनामी तो   कहीं तूफान  चले    बर्फ तो पिघली ही  अब ग्लेशियर भी बह निकले   तपती धरा की लू से   अब सब कुछ जले                       विकास कहीं विनाश न बन जाये विद्युत आग की लपटों में न बदल जाए संभल ले मानव संभाल ले पृथ्वी को आविष्कार तेरे तिरस्कार न बन जायें कुछ कर ऐसा कि सुन्दर प्रकृति शीतल धरती हो हरे-भरे वन औऱ उपवन हों कलरव हो पशु -पक्षियों का वन्य जीवों का संरक्षण हो           ...

'माँ ! तुम सचमुच देवी हो '

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किस मिट्टी की बनी हो माँ? क्या धरती पर ही पली हो माँ !? या देवलोक की देवी हो, करने आई हम पर उपकार। माँ ! तुम्हें नमन है बारम्बार!                                                     सागर सी गहराई तुममें,                     आसमान से ऊँची हो।.                     नारी की सही परिभाषा हो माँ !                     सद्गुणों की पूँजी हो। जीवन बदला, दुनिया बदली, हर परिवर्तन स्वीकार किया। हर हाल में धैर्य औऱ साहस से, निज जीवन का सत्कार किया।।                                                 सारे दुख-सुख दिल में रखकर,           ...

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