संदेश

फ़रवरी, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

परित्यक्ता नहीं..परित्यक्त | पति की बेवफाई और सास ससुर का साथ - हिन्दी कहानी

चित्र
परिचय क्या एक पत्नी सिर्फ इसलिए सब कुछ सहती रहे क्योंकि उसके पास मायके से विदा लेने बाद जाने के लिए कोई और ठिकाना नहीं है ? क्या प्रेम विवाह करने वाली स्त्री अपने ही रिश्तों में सबसे अधिक अकेली हो जाती है ? यह कहानी है सना की जिसे पति की बेवफाई ने तोड़ने की कोशिश की लेकिन उसके सास ससुर ने उसे परित्यक्ता नहीं बल्कि सम्मानित बेटी बनाकर दुनिया के सामने एक मिसाल कायम कर दी पढ़िए रिश्तों विश्वासघात और स्वाभिमान की हृदयस्पर्शी हिंदी कहानी दिल्ली की हल्की ठंडी सुबह थी। खिड़की से छनकर आती धूप ड्रॉइंग रूम के फर्श पर सुनहरी चादर बिछा रही थी, लेकिन सना के मन में जैसे धूप का एक कतरा भी नहीं बचा था। पिछले कुछ महीनों से वह प्रतीक के व्यवहार में बदलाव साफ महसूस कर रही थी। देर रात तक मोबाइल पर मुस्कुराकर बातें करना, उसके आते ही स्क्रीन लॉक कर देना, छोटी-छोटी बातों पर झल्ला उठना—सब कुछ बदलता जा रहा था। "प्रतीक! आज बच्चों के स्कूल में पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग है... तुम भी चलोगे?" सना ने धीमे स्वर में पूछा। प्रतीक ने मोबाइल से नजर उठाए बिना कहा— "मुझसे क्यों पूछ रही हो? अपने काम खुद नहीं कर ...

बसंत तेरे आगमन पर

चित्र
बसंत तेरे आगमन पर खिलखिलाई ये धरा भी इक नजर देखा गगन ने तो लजाई ये धरा भी कुहासे की कैद से अब मुक्त रवि हर्षित हुआ रश्मियों से जब मिला तो मुस्कराई ये धरा भी बसंत तेरे आगमन पर खिलखिलाई ये धरा भी नभ निरभ्र  आज ज्यों उत्सव कोई मना रहा शशि सितारों संग निशा की बारात लेके आ रहा शशि निशा की टकटकी पर फुसफुसाई ये धरा भी बसंत तेरे आगमन पर खिलखिलाई ये धरा भी अधखिली सी कुमुदिनी पे भ्रमर जब मंडरा रहा पास आकर बड़ी अदा से मधुर गुनगुना रहा दूर जाये जब भ्रमर तो तिलमिलाई ये धरा भी बसंत तेरे आगमन पर खिलखिलाई ये धरा भी इक नजर देखा गगन ने तो लजाई ये धरा भी                               चित्र साभार गूगल से पढ़िए बसंत ऋतु पर एक गीत बसंत की पदचाप

कहमुकरी

चित्र
बल विद्या बुद्धि को बढ़ाता बस धनवानों से है नाता है छोटा पर बड़े हैं काम क्या सखि साजन ?... ...........न सखि बादाम । बिन उसके मैं जी न पाऊँ हर पल मैं उसको ही चाहूँ अब तक उसका न कोई सानी क्यों सखि साजन ?......... .................... ना सखी पानी। है छोटा पर काम बड़े हैं कण कोशों में भरे पड़े हैं कीट-पतंगों से अनुराग क्या सखि साजन ?.... .................. नहिं री पराग । प्रेम प्रतीक है माना जाता मन को मेरे अति हर्षाता काँटों में भी रहे शादाब हैं सखी साजन ?...... ..................नहिं री गुलाब ।   चित्र साभार गूगल से.....

बसंत की पदचाप

चित्र
                                                                                        चित्र साभार प्रिंट्स से बसंत की पदचाप सुन शिशिर अब सकुचा रही कुहासे की चादर समेटे  ्पतली गली से जा रही । हवाएं उधारी ले धरा पात पीले झड़ा रही       नवांकुर से होगा नवसृजन       मन्द-मन्द मुस्करा रही । फूली सरसों लहलहाके सबके मन को भा रही अमराइयों में झूम-झूमे    कोकिला भी गा रही । शिशिर देखे पीछे मुड़ के जीते कैसे मुझसे लड़ के !       रवि-रश्मियां भी खिलखिला के वसंत-राग गा रही  । पंखुड़ियाँ फूलों लदी सुगन्ध हैंं फैला रही गुनगुना रहे भ्रमर   तितलियां मंडरा रही । नवेली सी सजी धरा घूँघट में यूँ शरमा रही रति स्वयं ज्यों काम संग  अब धरा में आ रही । बसंत ऋतु पर एक और रचना पढ़िए निम्न लिंक पर ●  ऐ बसंत ...

कह मुकरी.....प्रथम प्रयास

चित्र
               चित्र सभार गूगल से.... ◆ चाह देखकर भाव बढ़ाता      हाथ लगाओ खूब रुलाता      है सखी उसको खुद पर नाज      क्या सखी साजन ?.....                 ..........ना सखी प्याज । ◆   बढ़ती भीड़ घटे बेचारा       वही तो हम सबका सहारा       उसके बिन न जीवन मंगल      क्या सखी साजन ?.......        .................  ना सखी जंगल । ◆   जित मैं जाऊँँ उत वो आये        शीतल काया मन हर्षाये        रात्रि समा वह देता बाँध        क्या सखी साजन ?......          ..................ना सखी चाँद । ◆     भोर-साँझ वह मन को  भाये         सर्दियों  में तन-मन गर्माये         उसके लिए सबकी ये राय        ...

फ़ॉलोअर