पेंशन
"माँ आज सुबह-सुबह तैयार हो गई सत्संग है क्या" ?मीना ने पूछा तो सरला बोली; "ना बेटा सत्संग तो नहीं है, वो कल रात जब तुम सब सो गये थे न तब मनीष का फोन आया था मेरे मोबाइल पर । बड़ा पछता रहा था बेचारा, माफी भी मांग रहा था अपनी गलती की" । "अच्छा ! और तूने माफ कर दिया ? मेरी भोली माँ ! जरा सोच ना, पूरे छः महीने बाद याद आई उसे अपनी गलती । पता नहीं क्या मतलब होगा उसका, मतलबी कहीं का" ! मीना बोली तो सरला ने उसे टोकते हुए कहा, "ऐसा नहीं कहते बेटा ! आखिर वो तेरा छोटा भाई है, चल छोड़ न, वो कहते हैं न, 'देर आए दुरुस्त आए' अभी भी एहसास हो गया तो काफी है। कह रहा था सुबह तैयार रहना मैं लेने आउंगा"। और तू चली जायेगी माँ ! मीना ने पूछा तो सरला बड़ी खुशी से बोली, "हाँँ बेटा ! यहाँ रहना मेरी मजबूरी है, ये तेरा सासरा है,आखिर घर तो मेरा वही है न" । मीना ने बड़े प्यार से माँ के कन्धों को दबाते हुए उन्हें सोफे पर बिठाया और पास में बैठकर बोली; माँ ! मैं तुझे कैसे समझाऊँ कि मैं भी तेरी ही हूँ और ये घर भी"। तभी फोन की घंटी सुनकर सरला ने ...