शरद भोर | मनहरण घनाक्षरी छंद में शरद ऋतु का मनोहारी चित्रण
परिचय प्रकृति का प्रत्येक प्रभात अपने साथ एक नया संदेश लेकर आता है, किंतु शरद ऋतु की भोर का आकर्षण कुछ अलग ही होता है। निर्मल नभ, सुनहरी किरणें, ओस से भीगी धरती, मंद समीर और पुष्पों की भीनी सुगंध मिलकर ऐसा मनोरम दृश्य रचते हैं कि मन सहज ही प्रकृति की अनुपम छटा में खो जाता है। प्रस्तुत मनहरण घनाक्षरी में उसी मनमोहक शरद प्रभात के सौंदर्य और उसके आनंदमय वातावरण को भावों के माध्यम से अभिव्यक्त करने का विनम्र प्रयास किया गया है। मोहक निरभ्र नभ भास्कर विनम्र अब अति मनभावनी ये शरद की भोर है पूरब मे रवि रथ शशि भी गगन पथ स्वर्णिम से अंबरांत छटा हर छोर हैं सेम फली झूम रही पवन हिलोर बही मालती सुगंध भीनी फैली चहुँ ओर है महकी कुसुम कली विहग विराव भली टपकन तुहिन बिंदु खुशी की ज्यों लोर है शब्दार्थ - लोर - अश्रु निष्कर्ष शरद की यह मोहक बेला प्रकृति के सौंदर्य का उत्सव है। निर्मल आकाश, स्वर्णिम प्रभात, सुगंधित समीर और तुहिन कणों से सजा यह दृश्य मन को शांति, प्रसन्नता और नवीन ऊर्जा से भर देता है। जब हम प्रकृति के इन सूक्ष्म रूपों को हृदय से अनुभव करते हैं, तब जीवन भी उसी निर्मलता...