शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

मुक्तक-- 'नसीब'

broken mirror ;broken hopes

इधर  सम्भालते  उधर से छूट जाता है

आइना हाथ से फिसल के टूट जाता है

बहुत की कोशिशें सम्भल सकें,हम भी तो कभी

पर ये नसीब तो पल-भर में रूठ जाता है


सहारा ना मिला तो ना सही , उठ बैठे हम 

घाव रिसते रहें, ना पा सके कोई मलहम

जमाना ये न समझे, हम गिरे भी राहों में

होंठ भींचे, मुस्कराये पी गये झट सारे गम


कभी रंगती दिखी हमको भी ये तकदीर ऐसे

लगा पतझड़ गयी अब खिल रही बसंत जैसे

चार दिन चाँदनी के फिर अंधेरी रात सी थी

बदा तकदीर में जो अब बदलता भी कैसे...?


फिर भी हारे नहीं चलते रहे, चलना ही था

रात लम्बी थी मगर रात को ढ़लना ही था

मिटा तम तो सवेरे सूर्य ज्यों ही जगमगाया

घटा घनघोर छायी सूर्य को छुपना ही था।


अंधेरों में ही मापी हमने तो जीवन की राहें

नहीं है भाग्य में तो छोड़ दी यूँ सुख की चाहें

राह कंटक भरी पैरों को ना परवाह इनकी

शूल चुभते रहे भरते नहीं अब दर्दे-आहें


सोमवार, 14 सितंबर 2020

सोसाइटी में कोरोना की दस्तक

 

Covid 19 fear ; lockdown


माफ कीजिएगा इंस्पेक्टर साहब ! आपसे एक रिक्वेस्ट है कृपया आप सोसाइटी के गेट को बन्द न करें और ये पेपर मेरा मतलब नोटिस....हाँ ...इसे भी गेट के बाहर चिपकाने की क्या जरूरत है  आप न इसे हमें दे दीजिए हम सभी को वॉर्न कर देंगे, और इसे यहाँ चिपकाते हैं न...ये सोसाइटी ऑफिस के बाहर ....यहाँ सही रहेगा ये ....आप बेफिक्र रहिए....सोसायटी के प्रधान राकेश चौहान ने जब कहा तो इंस्पेक्टर साहब बोले; चौहान जी मुझे ये नहीं समझ मे नहीं आ रहा कि आप गेट को सील क्यों नहीं करने देना चाहते.....आपकी सोसाइटी में इसके अलावा दो गेट और हैं और इस गेट के पास वाले अपार्टमेंट में कोरोना पॉजीटिव का पेशेंट मिला है तो ये गेट सबकी सुरक्षा को देखकर बन्द होना चाहिए इसमें आपको क्या परेशानी है?

परेशानी तो कुछ नहीं सर!बस सोच रहे हैं इसे हम ही अन्दर से लॉक देंगे सबको बता भी देंगे तो कोई इधर से नहीं आयेगा वो क्या है न सर! अगर आप बन्द करेंगे तो  लोगोंं के मन में इस बिमारी को लेकर भय बैठ जायेगा और आप तो जानते ही हैं भय से रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो सकती है...है न सर !

ठीक है चौहान जी आप इस गेट को कुछ दिन के लिए बन्द कर दीजिए और सोसाइटी में सोशल डिस्टेसिंग और अन्य नियमों का पालन जरूर होना चाहिए, इस तरह सख्त हिदायत देकर इंस्पेक्टर साहब अपनी टीम के साथ चले गये....।

तब साथ में खड़े शर्मा जी बोले; वैसे चौहान जी हम समझे नहीं आप काहे उस पुलिस वाले को गेट बन्द नहीं करने दिए....?

अजी शर्मा जी ! वो क्या है न , आप भी बड़े भोले हैं, अच्छा आप ही बताइए ये कौन सा महीना चल रहा है...? कहते हुए चौहान जी सोसाइटी ऑफिस में जाकर की कुर्सी में पसर गये।

शर्मा जी बोले ; "सावन है जी पर इसमें क्या" ?

आप देखे न शर्मा जी हमारे तीसरे गेट के पास बने मंदिर में आजकल कैसा तांता लगा है श्रद्धालुओं का...          जब सबको पता चलेगा कि हमारी सोसाइटी में भी ये कमबख्त कोरोना दस्तक दे चुका तो .......तब बाहर के लोग हमारी सोसाइटी के मंदिर में क्यों आयेंगे... अब तो समझ ही गये होंगे आप......चौहान जी अपनी भौहें नचाते हुए बोले।

ओह ! बात तो पक्की है चौहान जी मान गये आपको... मंदिर में लोग नहीं तो चढ़ावा भी नहीं... पहले ही लॉकडाउन में मंदिर बन्द रहे....अब जब खुले हैंं तो..........वैसे भी अब कोनों काम ठप्प नहीं तो मंदिर क्यों...है न...।

बगल में कुर्सी खिसकाकर बैठते हुए शर्मा जी बोले और उनके ठहाकों की आवाज से सिक्योरिटी ऑफिस गूँज उठा।









शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

लघुकथा---नानी दादी के नुस्खे



Old sick grandmother lying on bed


आज दादी की तबीयत ठीक नहीं है । अक्कू बेटा मुझे कीचन में कुछ काम है तुम दादी के पास बैठकर इनका ख्याल रखो मैं अपने काम निबटाकर अभी आती हूँ।

 "हाँ माँ ! मैं यही पर हूँ आप चिंता मत करो, मैं ख्याल रखूंगा दादी का......   दादी !  मैं हूँ आपके पास। कुछ परेशानी हो तो मुझे बताइयेगा" कहकर अक्षय अपने मोबाइल में व्यस्त हो गया।

थोड़ी देर बाद दादी ने कराहते आवाज दी; "अक्कू! बेटा! पैरों में तेज दर्द हो रहा है,देख तो चारपाई के नीचे मैंने दर्द निवारक तेल बनाकर शीशी मेंं रखा है , थोड़ा तेल लगा दे पैरों में....आराम पड़ जायेगा"।

"ओह दादी !  तेल लगाने से कुछ नहीं होगा । रुको !मैं मोबाइल में गूगल पर सर्च करता हूँ , यहाँ 'नानी दादी के नुस्खे'  में बहुत सारे घरेलू उपाय लिखे रहते हैं, उन्हें पढ़कर आपके  पैरों के दर्द को मिटाने का कोई अच्छा सा उपाय देखता हूँ और वही दवा बनाकर आपके पैरों में लगाउंगा", कहकर अक्षय पुनः मोबाइल में व्यस्त हो गया।

बेचारी दादी कराहते हुए बोली; "हम्म अपनी दादी नानी तो जायें भाड़ में..... गूगल पे दादी नानी के नुस्खे .....हे मेरे राम जी!  क्या जमाना आ गया है"...!

                               चित्र साभार गूगल से....


शनिवार, 5 सितंबर 2020

मेरे ऐक्वेरियम की वो नन्हींं फिश...

 

little golden fish

मेरे ऐक्वेरियम की वो नन्हींं फिश

देखो जीना हमें है सिखा रही

है बंधी फिर भी उन्मुक्त सोच से

काँच घर  को समन्दर बना रही


मेरे ऐक्वेरियम की वो नन्हींं फिश

देखो जीना हमें है सिखा रही


जब वो आयी तो थोड़ा उदास थी

बहुत प्यारी थी अपने में खास थी

जल्द हिलमिल गयी बदले परिवेश में

हर हालात मन से अपना रही


मेरे ऐक्वेरियम की वो नन्हीं फिश

देखो जीना हमें है सिखा रही


दाने दाने की जब वो मोहताज है

 खुद पे फिर भी उसे इतना नाज है

है विधाता की अनुपम सी कृति वो

मूल्यांकन स्वयं का सिखा रही


मेरे ऐक्वेरियम की वो नन्हींं फिश

देखो जीना हमें है सिखा रही।

     

                   चित्र साभार गूगल से...

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

हरि मेरे बड़े विनोदी हैं

peacock feather symbolisis lord krishna

देखो तो अब आयी महारानी !...क्या कह रही थी जाते समय ..."नहीं यार आज जाने का मन नहीं है तुम दोनों इतने सालों बाद मेरे घर मुझसे मिलने आये हो और मैं चली जाऊं ...नहीं नहीं आज के लिए माफी माँग लूंगी ठाकुर जी से...आज नहीं जा पाउँगी सत्संग में.....

हैं न मीना ! यही कह रही थी न ये"(कमला ने चुटकी लेते हुए कहा)।

"हाँ सखी! कहा तो यही था और हमने ही इसे जबरदस्ती भेजा इसका दोहरा मन देखते हुए .....।

और अब देखो सबके बाद आयी ....अरे लगता है इसे तो याद भी न रहा होगा वहाँ कि हम आये हैं ......हैं न!...

दोनों सखियाँ सरला का मजाक बनाते हुए हँसने लगी

तो सरला बोली;   "हँसो हँसो खूब हँसो तुम दोनों भी......खूब मजाक उड़ाओ मेरा.......

पर मैं भी बता देती हूँ कि मैं भूली नहीं थी तुमको वहाँ भी.....

अरे !सच बताऊँ तो आज मन ही नहीं लगा सत्संग में....

बचपन की जिन मस्तियों को याद कर हम तीनों खूब हँसे थे न सुबह से...रह रहकर वही यादें वहाँ भी कुलबुला रही थी मन में".......

"अच्छा तब ही देरी हुई न हमारे पास आने में"...कहकर दोनों सखियां फिर खिल्ली उड़ाई।

अरे नहीं सखी ! सुनो तो बताऊं न कि क्यों देरी हुई.. पर तुम तो अपनी ही चलाये जा रही हो...सरला बोली।

"अच्छा! चल बता ...कौन सा बहाना बनायेगी सुनते हैं" कहते हुए एक दूसरे के हाथ पे ताली मारकर दोनों खिलखिलाई।

सरला बोली; "बहाना नहीं सखी, सच कह रही हूँ जब जा रही थी न तो सोचा आज सबसे आखिरी में दरवाजे के पास ही बैठूंगी सत्संग खत्म होते ही सबसे पहले प्रसाद लेकर दौड़ी चली आउंगी ।

सत्संग भवन के बाहर पहुंची तो चप्पलें उतारते हुए ख्याल आया कहीं चप्पलें इधर-उधर न हो जायें, मुझे जल्दी जाना है न, इसलिये सबसे आखिरी मे सबसे हटकर अपनी चप्पलें उतारी ताकि झट से पहन कर आ सकूँ।

और संत्संग में भी कहाँ मन लगा, बचपन की मस्तियाँ जो याद की थी न हमने,  अनायास ही याद आकर होंठों में मुस्कराहट फैला रही थी, तभी ध्यान आता सत्संग में हूँ तो मन ही मन माफी माँग रही थी ठाकुर जी से...

संत्संग खत्म होते ही अपनी बारी का इंतज़ार किये बिना ही झपटकर प्रसाद लिया और बाहर की तरफ भागी।

चप्पलें पहनने लगी तो देखा एक चप्पल गायब... हड़बड़ाकर चप्पल ढूंढने लगी तो सबकी चप्पलें इधर-उधर कर दी.....

क्या बताऊँ सखी! कुछ लोग ताने मारने लगे तो कुछ आश्चर्य से घूर रहे थे मुझे......।

बहुत कोशिश के बाद भी चप्पल न मिली तो मैं समझ गयी और चुपचाप एक कोने में खड़ी इस ठिठोली का आनंद लेने लगी।

ठिठोली ! कैसी ठिठोली ? दोनों सखियों ने एक साथ पूछा।

तब सरला बोली; "हाँ सखी! ठिठोली नहीं तो और क्या?...जब सब अपनी चप्पलें पहनकर चले गये न, तब मेरी चप्पल पूर्ववत स्थान पर जहाँ मैंने रखी थी वहीं पर वैसे ही नजर आयी...

हैं !!!....पर ये ठिठोली की किसने....?   आश्चर्यचकित होकर दोनों समवेत स्वर में बोली।

भक्ति भाव से आनंदित होते हुए सरला बोली;"मेरे हरि ने....हाँ सखी !  ये ठिठोली मेरे हरि ने की।

आज मुझे तुम्हारे साथ हँसी ठिठोली करते देख  स्वयं सखा भाव में आ गये, और मेरे मन के भावों को समझ स्वयं भी ठिठोली कर बैठे....।

सच सखी ! मेरे हरि बड़े विनोदी हैं"।