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आओ बच्चों ! अबकी बारी होली अलग मनाते हैं

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  आओ बच्चों ! अबकी बारी  होली अलग मनाते हैं  जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । ऊँच नीच का भेद भुला हम टोली संग उन्हें भी लें मित्र बनाकर उनसे खेलें रंग गुलाल उन्हें भी दें  छुप-छुप कातर झाँक रहे जो साथ उन्हें भी मिलाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । पिचकारी की बौछारों संग सब ओर उमंगें छायी हैं खुशियों के रंगों से रंगी यें प्रेम तरंगे भायी हैं। ढ़ोल मंजीरे की तानों संग  सबको साथ नचाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । आज रंगों में रंगकर बच्चों हो जायें सब एक समान भेदभाव को सहज मिटाता रंगो का यह मंगलगान मन की कड़वाहट को भूलें मिलकर खुशी मनाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । गुझिया मठरी चिप्स पकौड़े पीयें साथ मे ठंडाई होली पर्व सिखाता हमको सदा जीतती अच्छाई राग-द्वेष, मद-मत्सर छोड़े नेकी अब अपनाते हैं  जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । पढ़िए  एक और रचना इसी ब्लॉग पर ●  बच्चों के मन से

माटी मेरे गाँव की : भावुक गढ़वाली गीत | पहाड़ की यादें

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क्या आपको भी अपने गाँव की मिट्टी की खुशबू और बचपन की यादें बार-बार अपनी ओर खींचती हैं ? प्रस्तुत है एक भावपूर्ण गढ़वाली गीत “ माटी मेरे गाँव की” , जिसमें पहाड़ की बदलती तस्वीर, पुरानी यादें और गाँव का स्नेहिल अपनापन झलकता है। यह गीत उन प्रवासियों को रैबार (संदेश) देकर पुकारता है, जो रोज़गार या परिस्थितियों के कारण गाँव छोड़कर दूर बस गए और फिर लौट नहीं पाए। साथ ही, यह गाँव की उन बेटियों को भी स्नेह से याद करता है, जो ससुराल और शहर की व्यस्तताओं में अपने मायके—अपने गाँव—तक अब कम ही पहुँच पाती हैं। छ्वाया फूटे सौण - भादों , धार नदियों संग आई  माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी बोली मुझसे खुद लगीं बा  हो सके तो गाँव आ जा बीसीयों बीते मिले आ अब तो ये सूरत दिखा जा मटण्या पाणी, सौंधी खुशबू समलौण्या दुलार लायी माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी वो पहाड़ी धार वाली बोली द्या अब ना गिरेगी बाट चौड़े पक्के वाले  माट में अब ना सनेगी गाड़ी मोटर पों-पों करती अब तो हर इक ख्वाल आयी माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी म्याल ना लिपने पड़ेंगे चमचमाती फर्श बोली कूड़ी में लेंटर पड़...

ज्ञान के भण्डार गुरुवर

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 ख्याति लब्ध पत्रिका 'अनुभूति' के 'अपनी पाठशाला' विशेषांक में मेरी रचना 'ज्ञान के भण्डार गुरुवर ' प्रकाशित करने हेतु आ.पूर्णिमा वर्मन दीदी का हार्दिक आभार । ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । डगमगाती नाव जीवन,  खे रहे गुरु के सहारे । गुरु की पारस दृष्टि से ही ,  मन ये कुंदन सा निखरता । कोरा कागज सा ये जीवन,  गुरु की गुरुता से महकता । देवसम गुरुदेव को हम,  दण्डवत कर, पग-पखारें  । ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । गुरु कृपा से ही तो हमने , नव ग्रहों का सार जाना । भू के अंतस को भी समझा,  व्योम का विस्तार जाना । अनगिनत महिमा गुरु की,  पा कृपा, जीवन सँवारें । ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । तन में मन और मन से तन,  के गूढ़ को बस गुरु ही जाने । बुद्धि के बल मन को साधें,  चित्त चेतन के सयाने । अथक श्रम से रोपते , अध्यात्म शिष्योद्यान सारे। ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । पढ़िए पत्रिका 'अनुभूति' में प्रकाशित मेरी एक और रचना ●  बने पकौड़े गरम-गरम

बने पकौड़े गरम-गरम | बारिश में पकौड़े पर भावपूर्ण हिंदी कविता

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परिचय बारिश की रिमझिम फुहारें, भीगी मिट्टी की सौंधी खुशबू और गरमागरम पकौड़ों के साथ अदरक वाली चाय—बरसात का मौसम अपने साथ ऐसी ही मनभावन यादें लेकर आता है। ‘बने पकौड़े गरम-गरम’  बरसात पर लिखा एक भावपूर्ण और मनोरंजक हिंदी गीत है, जिसमें बारिश के सुहाने मौसम और परिवार के साथ पकौड़े-चाय का आनंद सहज शब्दों में चित्रित किया गया है। ख्यातिलब्ध पत्रिका  'अनुभूति'  के  'गरम पकौड़े'  विशेषाँक में मेरे गीत 'बने पकौड़े गरम-गरम' को सम्मिलित करने हेतु ' आदरणीया पूर्णिमा वर्मन जी ' का हार्दिक आभार । घुमड़-घुमड़ कर घिरी घटाएं बिजली चमकी चम चम चम   झम झम झम झम बरसी बूँदें बने पकौड़े गरम-गरम सनन सनन कर चली हवाएं,  सर सर सर सर डोले पात  भीगी माटी सौंधी महकी पुलकित हुआ अवनि का गात  राहत मिली निदाघ से अब तो हुआ सुहाना ये मौसम  झम झम झम झम बरसी बूँदें बने पकौड़े गरम-गरम अदरक वाली कड़क चाय की,  फरमाइश करते दादा । दादी बोली मेरी चाय में मीठा हो थोड़ा ज्यादा ! बच्चों को मीठे-मीठे  गुलगुले चाहिए नरम नरम झम झम झम झम बरसी बूँदें,  बने पकौड़े गरम-गरम खट्टी...

ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कराना आ गया

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दुपहरी बेरंग बीती सांझ हर रंग भा गया । ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कुराना आ गया । अजब तेरे नियम देखे,गजब तेरे कायदे । रोते रोते समझ आये,अब हँसी के फ़ायदे । भीगी पलकों संग लब को खिलखिलाना आ गया ।  ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कुराना आ गया । क्यों कहें संघर्ष तुझको, ये तो तेरा सिलसिला । नियति निर्धारित सभी , फिर क्या करें तुझसे गिला ।  सत्य को स्वीकार कर जीना जिलाना आ गया ।  ज़िन्दगी !  समझा तुझे तो मुस्कुराना आ गया । हो पूनम की रात सुन्दर या तिमिर घनघोर हो । राहें हों कितनी अलक्षित, आँधियाँ चहुँ ओर हो । हर हाल में मेरे 'साँवरे' तेरे गुण गुनाना आ गया । ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कराना आ गया । पढिए  ऐसे ही जिंदगी से जुड़ी एक और रचना ■  चल जिंदगी तुझको चलना ही होगा

हैं सृष्टि के दुश्मन यही इंसानियत के दाग भी | पर्यावरण संतुलन पर गीत

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कोयल का मौन होना, सूखती नदियाँ, उजड़ते बाग और बिगड़ता मौसम केवल कल्पना नहीं, बल्कि आज की वास्तविकता हैं। प्रस्तुत कविता जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभावों पर चिंता व्यक्त करती है तथा प्रकृति के प्रति मानव की जिम्मेदारी का स्मरण कराती है।                     खामोश क्यों कोयल हुई ? क्यों मौन है अब राग भी ? बदल रहा है क्यों समाँ ? तपने लगा क्यों फाग भी ? पंछी उड़े उड़ते रहे, ठूँठ तक ना पा सके । श्रीविहीन धरणी में अब, गीत तक न गा सके । उजड़ा सा क्यों चमन यहाँ ? सूने से क्यों हैं बाग भी ? सर्द आयी कंपकंपाई, ग्रीष्म अब तपने लगी । षट्ऋतु के अपने देश में, द्वयऋतु ही क्यों फलने लगी । बिगड़ रही बरसात क्यों ? सिकुड़ा सा क्यों ऋतुराज भी ? बन सघन अब ना रहे, क्षीण अति सरिता बहे । उगले क्यों सूरज उग्र ताप ? ऊष्मीकरण ज्यों भू पे श्राप । बदल रहे हैं क्यों भला, रुत के यहाँ मिजाज भी ? अब भी किसी को ना पड़ी, जब निकट है संकट घड़ी । घर सम्भलता है न जिनसे, हथिया रहे वे विश्व भी । हैं सृष्टि के दुश्मन यही, इंसानियत के दाग भी ।    निष्कर्ष :...

तमस राज अपना फैला रहा है

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                  चित्र साभार pixabay.com से दिवाली गयी अब दिये बुझ गये सब वो देखो अंधेरा पुनः छा रहा है... अभी चाँद रोशन हुआ जो नहीं है तमस राज अपना फैला रहा है अमा के तमस से सहमा सा जुगनू टिम-टिम चमकने में कतरा रहा है दिवाली गयी अब दिये बुझ गये सब वो देखो अंधेरा पुनः छा रहा है....। कितनी अयोध्या जगमग सजी हैं पर ना कहीं कोई राम आ रहा है कष्टों के बादल कहर ढ़ा रहे हैं  पर्वत उठाने ना श्याम आ रहा है दीवाली गयी अब दिये बुझ गये सब वो देखो अंधेरा पुनः छा रहा है। अभी चाँद रोशन हुआ जो नहीं है तमस राज अपना फैला रहा है.....। कहीं साँस लेना भी मुश्किल हुआ है सियासत का कोहरा गहरा रहा है करेंगे तो अपनी ही मन की सभी पर ढ़ीला हुकूमत का पहरा रहा है दीवाली गयी अब दिये बुझ गये सब वो देखो अंधेरा पुनः छा रहा है अभी चाँद रोशन हुआ जो नहीं है तमस राज अपना फैला रहा है.....। बने मुफ्तभोगी सत्ता के लोभी हराकर मनुज को दनुज जी रहा है निष्कर्म जीवन चुना स्वार्थी मन पकड़ रोशनी के वो पंख सी रहा है दीवाली गयी अब दिये बुझ गये सब  वो देखो अंधेरा पुनः छा रहा है अभी चा...

गति मन्द चंद्र पे तरस आया

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                    चित्र साभार,pixabay.com से बाद पूनम के चाँद वृद्ध सा सफर न पूरा कर पाया। घन बिच बैठा तब भोर भानु  गति मन्द चंद्र पे तरस आया। दी शीतलता दान विश्व को पूनम में है पाया मान नन्हा सा ये बढ़ा शुक्ल में  पाक्षिक उम्र में वृहद ज्ञान आज चतुर्थी के अरुणोदय नभ में दिखी यूँ मलिन काया घन बिच बैठा तब भोर भानु गति मन्द चंद्र पे तरस आया हर भोर उद्भव चमक रवि हर साँझ फिर अवसानी है दिन मात्र जीवन सफर विश्व सम और ना गतिमानी है आदि अंत का जटिल सत्य इनको न कभी भरमा पाया घन बिच बैठा तब भोर भानु गति मन्द चंद्र पे तरस आया नसीहत सदा देती प्रकृति हम सीखते ही हैं कहाँ नीयत से ही बनती नियति कर्मठ बताते हैं यहाँ प्रखर रवि और सौम्य शशि दोनों ने ही जग चमकाया घन बिच बैठा तब भोर भानु गति मन्द चंद्र पे तरस आया

अपनों को परखकर....

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 अपनों को परखकर यूँ परायापन दिखाते हो  पराए बन वो जाते हैं तो आंसू फिर बहाते हो न झुकते हो न रुकते क्यों बातें तुम बनाते हो  उन्हें नीचा दिखाने को खुद इतना गिर क्यों जाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर...... मिले रिश्ते जो किस्मत से निभाना है धरम अपना जीत लो प्रेम से मन को यही सच्चा करम अपना तुम्हारे साथ में वो हैं तो हक अपना जताते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो। अपनों को परखकर ...... कोई रिश्ता जुड़ा तुमसे निभालो आखिरी दम तक सुन लो उसके भी मन की, सुना लो नाक में दम तक बातें घर की बाहर कर, तमाशा क्यों बनाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर...... ये घर की है तुम्हारी जो, उसे घर में ही रहने दो कमी दूजे की ढूँढ़े हो, कमी अपनी भी देखो तो बही थी प्रेम गंगा जो, उसे अब क्यों सुखाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर.... चले घर त्याग करके जो, तो जाने दो न रोको तुम जहाँ खुश हैं रहें जाकर, न जाके उनको टोको तुम क्यों जाने वालों को घर की राह फिर फिर दिखाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर ...

कभी ले हरी नाम अरी रसना!

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फूटे घट सा है ये जीवन भरते-भरते भी खाली है कभी ले हरि नाम अरी रसना ! अब साँझ भी होने वाली है..... जब से हुई भोर और आँख खुली जीवन, घट भरते ही बीता कितना भी किया सब गर्द गया खुद को पाया रीता-रीता धन-दौलत जो भी कमाई है सब यहीं छूटने वाली है। कभी ले हरी नाम अरी रसना! अब साँझ भी होने वाली है...... इस नश्वर जग में नश्वर सब रिश्ते-नाते भी मतलब के दिन-रैन जिया सब देख लिया अन्तर्मन को अब तो मथ लें... मुरलीधर माधव नैन बसा छवि जिनकी बहुत निराली है कभी ले हरी नाम अरी रसना! अब साँझ भी होने वाली है......                            चित्र, photopin.comसे...

मेरे ऐक्वेरियम की वो नन्हींं फिश...

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  मेरे ऐक्वेरियम की वो नन्हींं फिश देखो जीना हमें है सिखा रही है बंधी फिर भी उन्मुक्त सोच से काँच घर  को समन्दर बना रही मेरे ऐक्वेरियम की वो नन्हींं फिश देखो जीना हमें है सिखा रही जब वो आयी तो थोड़ा उदास थी बहुत प्यारी थी अपने में खास थी जल्द हिलमिल गयी बदले परिवेश में हर हालात मन से अपना रही मेरे ऐक्वेरियम की वो नन्हीं फिश देखो जीना हमें है सिखा रही दाने दाने की जब वो मोहताज है  खुद पे फिर भी उसे इतना नाज है है विधाता की अनुपम सी कृति वो मूल्यांकन स्वयं का सिखा रही मेरे ऐक्वेरियम की वो नन्हींं फिश देखो जीना हमें है सिखा रही।                          चित्र साभार गूगल से...

आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया | भावपूर्ण हिंदी कविता

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परिचय (Introduction) कभी-कभी हम अपनों की खुशियों के लिए इतना कुछ सहते रहते हैं कि स्वयं को भूल जाते हैं। समय बीतने के बाद जब सचाई का एहसास होता है, तब पछतावे के अलावा बहुत कुछ हाथ नहीं आता। प्रस्तुत कविता "आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया" जीवन, रिश्तों, त्याग और आत्मबोध की ऐसी ही मार्मिक अनुभूति को शब्द देती है । "रिश्तों में त्याग, आत्मबोध और जीवन के बदलते मौसमों पर आधारित हिंदी कविता" की जो नादानियाँ तब खुद पे अब तरस आया आज मौसम का रुख, जब उसे समझ आया तप्त तो था मौसम वो कड़वी दवा पीती रही  वजह बेवजह ही खुद को सजा देती रही सजा-ए-दर्द सहे मन भी बहुत पछताया आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया हाँ ! मौसम की ये फितरत ना समझ पाती थी उसकी खुशियों के खातिर कुछ भी कर जाती थी उसकी गर्मी और सर्दी में खुद को उलझाया आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया दी सजाएं जो रोग बनके तन में पलती रही नैन बरसात से बरसे ये उम्र ढ़लती रही कुछ सुहाना हुआ मौसम पर न अब रास आया आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया। सुख में दुःख में जो न सम्भले वो दिन रीत गये सर्दी गर्मी और बरसात के दिन बीत गये ढ़ल गयी साँझ, देखो ...

गीत- मधुप उनको भाने लगा...

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देखो इक भँवरा बागों में आकर मधुर गीत गाने लगा कभी पास आकर कभी दूर जाकर अदाएं दिखाने लगा पेड़ों की डाली पे झूले झुलाये फूलों की खुशबू को वो गुनगुनाए प्रीत के गीत गाकर वो चालाक भँवरा पुष्पों को लुभाने लगा कभी पास आकर कभी दूर जाकर अदाएं दिखाने लगा । नहीं प्रेम उसको वो मकरन्द चाहता इक बार लेकर कभी फिर न आता मासूम गुल को बहकाये ये जालिम स्वयं में फँसाने लगा कभी पास आकर कभी दूर जाकर अदाएं दिखाने लगा । सभी फूल की दिल्लगी ले रहा ये वफा क्या ये जाने नहीं यहाँ आज कल और जाने कहाँ ये सदाएं भी माने नहीं पटे फूल सारे रंगे इसके रंग में मधुप उनको भाने लगा कभी पास आकर कभी दूर जाकर अदाएं दिखाने लगा । ना लौटा जो जाके तो गुल बिलबिलाके राह उसकी तकने लगे विरह पीर सहते , दलपुंज ढ़हते नयन अश्रु बहने लगे दिखी दूजि बगिया खिले फूल पर फिर बेवफा गुनगुनाने लगा । कभी पास आकर कभी दूर जाकर अदाएं दिखाने लगा ।      चित्र साभार गूगल से पढ़िए मानवीकरण पर आधारित एक और गीत              ◆  पुष्प और भ्रमर

गीत-- शीतल से चाँद का क्या होना

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                इस गरम मिजाजी दुनिया में शीतल से चाँद का क्या होना कुछ दिन ही सामना कर पाता फिर लुप्त कहीं छुप छुप रोना जस को तस सीख न पाया वो व्यवहार कटु न सह पाता क्रोध स्वयं पीकर अपना निशदिन ऐसे घटता जाता निर्लिप्त दुखी सा बैठ कहीं प्रभुत्व स्वयं का फिर खोना इस गरम मिजाजी दुनिया में शीतल से चाँद का क्या होना स्वामित्व दिखाने को जग में कड़वा बनना ही पड़ता है सूरज जब ताप उगलता है जग छाँव में तभी दुबकता है अति मीठे गुण में गन्ने सा कोल्हू में निचोड़ा नित जाना इस गरम मिजाजी दुनिया में शीतल से चाँद का क्या होना                          चित्र साभार गूगल से...

अतीती स्मृतियाँँ

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प्रदत्त चित्र पर मेरी भावाभिव्यक्ति फूल गुलाब तुम्हें भेजा जो जाने कहाँ मुरझाया होगा तुमने मेरे प्रेम पुष्प को यूँ ही कहीं ठुकराया होगा टूटा होगा तृण-तृण में वो जैसे मेरा दिल है टूटा.... रोया होगा उस पल वो भी जान तिरा वो प्रेम था झूठा दिल पे पड़ी गाँठों को ऐसे कब किसने सुलझाया होगा फूल गुलाब तुम्हें भेजा जो जाने कहाँ मुरझाया होगा आज उन्हीं राहों पे आकर देखो मैं जी भर रोया हूँ प्यार में था तब प्यार में अब भी तेरी यादों में खोया हूँ। अतीत की उन मीठी बातों में कैसे मन बहलाया होगा.... फूल गुलाब तुम्हें भेजा जो जाने कहाँ मुरझाया होगा एक बारगी लौट के आओ देखो मेरा हाल है क्या जीवन संध्या भी ढ़लती है दिन हफ्ते या साल है क्या. रिसते घावों के दर्द में ऐसे मलहम किसने लगाया होगा फूल गुलाब तुम्हें भेजा जो जाने कहाँ मुरझाया होगा।।

वह प्रेम निभाया करता था....

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एक कली जब खिलने को थी, तब से ही निहारा करता था। दूर कहीं क्षितिज में खड़ा वह प्रेम निभाया करता था । दीवाना सा वह भ्रमर, पुष्प पे जान लुटाया करता था । कली खिली फिर फूल बनी, खुशबू महकी फ़िज़ा में मिली। फ़िज़ा में महकी खुशबू से ही कुछ खुशियाँ चुराया करता था। वह दूर कहीं क्षितिज में खड़ा बस प्रेम निभाया करता था । फूल की सुन्दरता को देख सारे चमन में बहार आयी। आते जाते हर मन को , महक थी इसकी अति भायी। जाने कितनी बुरी नजर से इसको बचाया करता था । दूर कहीं क्षितिज में खड़ा,  वह प्रहरी बन जाया करता था । फूल ने समझा प्रेम भ्रमर का, चाहा कि अब वो करीब आये। हाथ मेरा वो थाम ले आकर, प्रीत अमर वो कर जाये। डरता था छूकर बिखर न जाये, बस  दिल में बसाया करता था । दीवाना सा वह भ्रमर पुष्प पे जान लुटाया करता था । एक वनमाली हक से आकर, फूल उठा कर चला गया । उसके बहारों भरे चमन में, काँटे बिछाकर चला गया । तब विरही मन यादों के सहारे, जीवन बिताया करता था । दूर वहीं क्षितिज में खड़ा, वह आँसू बहाया करता था । दीवाना था वह भ्रमर पुष्प पे, जान लुटाया कर...

"पुष्प और भ्रमर"

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तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया । हमेशा रहोगे तुम साथ मेरे, बसंत अब हमेशा खिला ही रहेगा तुम मुस्कुराये तो मैंं खिलखिलाई ये सूरज सदा यूँ चमकता रहेगा । न आयेगा पतझड़ न आयेगी आँधी, मेरा फूलमन यूँ ही खिलता रहेगा। तुम सुनाते रह़ोगे तराने हमेशा और मुझमें मकरन्द बढता रहेगा। तुम्हें और जाने की फुरसत न होगी मेरा प्यार बस यूँ ही फलता रहेगा ।।            "मगर अफसोस" !!! तुम तो भ्रमर थे मै इक फूल ठहरी वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ? मैंं पलकें बिछा कर तेरी राह देखूँ                    ये इन्तजार अब यूँ ही चलता रहेगा । मौसम में जब भी समाँ लौट आये मेरा दिल हमेशा तडपता रहेगा कि ये "शुभ मिलन" अब पुनः कब बनेगा                                                      ...

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