संदेश

नवंबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मोबाइल फोन: सुविधा या लत?

चित्र
 परिचय आधुनिक युग में विज्ञान का एक अद्भुत और महत्त्वपूर्ण उपहार मोबाइल फोन है। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को विश्राम करने तक यह हमारे जीवन का लगभग अभिन्न साथी बन चुका है। जहाँ एक ओर इसने हमारे अनेक कार्यों को सरल बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसका अत्यधिक उपयोग कई नई समस्याओं का कारण भी बन रहा है। प्रस्तुत लेख में मोबाइल फोन की उपयोगिता के साथ-साथ इसकी लत से होने वाले दुष्प्रभावों पर चर्चा की गई है।                                आज मोबाइल फोन ने पूरी दुनिया को मानो हमारी मुट्ठी में समेट दिया है। कुछ दशक पहले जिन कार्यों के लिए घंटों या कई दिनों का समय लगता था, वे आज कुछ ही क्षणों में पूरे हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीकी सुविधा है जिसने मनुष्य के जीवन को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल और सुविधाजनक बना दिया है। किसी से तुरंत संपर्क करना हो, पढ़ाई करनी हो, बैंकिंग का कार्य हो या मनोरंजन—अनेक कार्य अब एक ही मोबाइल फोन से सहजता से पूरे हो जाते हैं। यही कारण है कि आज यह बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर आयु वर...

प्रेम

चित्र
                  प्रेम   अपरिभाषित एहसास।     'स्व' की तिलांजली...        "मै" से मुक्ति !    सर्वस्व समर्पण भाव    निस्वार्थ,निश्छल        तो प्रेम क्या ?      बन्धन या मुक्ति  !  प्रेम तो बस, शाश्वत भाव     एक सुखद एहसास !!             एहसास ?     हाँ !  पर  होता है..        दिल का दिल से     आत्मिक /अलौकिक        कहीं भी, कभी भी..   बिन सोचे,  बिन समझे  एक अनुभूति , अलग सी             बहुत दूर..     दिल के  बहुत  पास,  टीस बनकर चुभ जाती है, औऱ उस दर्द में आनन्द आता है,        असीम आनन्द !       और   चुभन   ?  आँसू  बनकर बहते आँखों से         ...

मन इतना उद्वेलित क्यों ?

चित्र
मानव मन इतना उद्वेलित क्यों ? अस्थिर, क्रोधित, विचलित बन,  हद से ज्यादा उत्तेजित क्यों ? अटल क्यों नहीं ये पर्वत सा, नहीं आसमां सा सहनशील स्वार्थ समेटे है बोझिल मन ! नहीं नदियों सा इसमें निस्वार्थ गमन मात्र मानव को दी प्रभु ने बुद्धिमत्ता ! बुद्धि से मिली वैचारिक क्षमता इससे पनपी वैचारिक भिन्नता ! वैचारिक भिन्नता से टकराव टकराव से शुरू समस्याएं ? उलझी फिर मन से मानवता ! होता है वक्त और कारण  समुद्री ज्वार भाटे का पर मन के ज्वार भाटे का, नहीं कोई वक्त नहीं कारण  उद्वेलित मन ढूँढे इसका निवारण ! शान्ति भंग कर देता सबकी, पहले खुद की,फिर औरों की विकट समस्या बन जाता है, विचलित जब हो जाता मन । बाबाओं की शरण न जाकर, कुछ बातों का ध्यान रखें गर तुलनात्मक प्रवृति से उबरें, "संतुष्टि, धैर्य" भी अपनाकर योगासनों का सहारा लेकर, मानसिक ,चारित्रिक और आध्यात्मिक मजबूती ,निज मन को देकर "ज्ञान और आत्मज्ञान" बढायें मन-मस्तिष्क की अतुलनीय शक्ति से पुनः सर्व-शक्तिमान बन जायें ।           ...

आरक्षण और बेरोजगारी

चित्र
   चित्र : "साभार गूगल से" जब निकले थे घर से ,अथक परिश्रम करने, नाम रौशन कर जायेंगे,ऐसे थे अपने सपने । ऊँची थी आकांक्षाएं , कमी न थी उद्यम में, बुलंद थे हौसले भी तब ,जोश भी था तब मन में !! नहीं डरते थे बाधाओं से, चाहे तूफ़ान हो राहों में ! सुनामी की लहरों को भी,हम भर सकते थे बाहों में शिक्षित बन डिग्री लेकर ही, हम आगे बढ़ते जायेंगे। सुशिक्षित भारत के सपने को, पूरा करके दिखलायेंगे ।।  महंगी जब लगी पढ़ाई, हमने मजदूरी भी की ।  काम दिन-भर करते थे,  रात पढ़ने में गुजरी।। शिक्षा पूरी करके हम ,  बन गये डिग्रीधारी। फूटी किस्मत के थे हम ,झेलते हैं बेरोजगारी ।। शायद अब चेहरे से ही , हम पढ़े-लिखे दिखते हैं ! तभी तो हमको मालिक , काम देने में झिझकते हैं कहते ; पढ़े-लिखे दिखते हो कोई अच्छा सा काम करो !  ऊँचे पद को सम्भालो, देश का ऊँचा नाम करो" !   कैसे उनको समझाएं? हम सामान्य जाति के ठहरे,   देश के सारे पदोंं पर तो अब,  हैं आरक्षण के पहरे ! सोचा सरकार बदल जायेगी, अच्छे दिन अपने आयेंगे ! 'आरक्षण और जातिवाद' से, ...

इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ?.

चित्र
चित्र :  साभार, गूगल से- जब जान लिया पहचान लिया, नहीं वो तेरा यह मान लिया । बेरुखी उसकी स्वीकार तुझे, फिर घुट-घुट जीवन जीना क्या ? हर पल उसकी ही यादों में, गमगीन तेरा यूँ रहना क्या ? तेरा छुप-छुप आँँसू पीना क्या ? उसके आते ही तेरी नजर, बस उसमें थम जाती है । धड़कन भी बढ़ जाती है, आँखों में चमक आ जाती है। तू साथ चाहता क्यों उसका, वो तुझसे कोसों दूर खड़ा ? जब उसको ये मंजूर नहीं, इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ? उसकी राहें भी तुझसे जुदा, मंजिल उसकी कहीं और ही है, नहीं हो सकता तेरा उसका मिलन, दिल में उसके कुछ और ही है। वो चाँद आसमां का ठहरा, चकोर सा तेरा तड़पना क्या ? फिर मन ही मन यूँ जलना क्या, इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ? जीवन तेरा भी अनमोल यहाँ, तेरे चाहने वाले और भी हैं। इकतरफा सोच से निकल जरा, तेरे दुख से दुखी तेरे और भी हैं। वीरान पड़ी राहों में तेरा. यूँ फिर-फिर आगे बढ़ना क्या ? इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ? फिर मन ही मन यूँ जलना क्या ?

फ़ॉलोअर

लेबल

कुण्डलिया छन्द3 गजल10 गढ़वाली कविता एवं उसका हिन्दी रूपांतरण1 गढ़वाली गीत1 गर्मी पर कविता1 गर्मी पर बाल कविता1 गीत18 गीतात्मक कविता1 घरेलू हिंसा1 चौपाई1 जल संरक्षण पर कविता1 जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग1 दोहा मुक्तक3 दोहे6 नवगीत15 नारी सशक्तिकरण1 पाँच लिंकों का आनंद स्थापना दिवस1 पारिवारिक कहानी1 पारिवारिक रिश्ते1 पावस पर कविता1 पुस्तक समीक्षा1 प्रकृति1 प्रसंग1 प्रार्थना3 प्रेणादायक आलेख1 प्रेरक लघुकथा1 प्रेरणादायक कहानी1 प्रेरणादायक हिंदी कविता1 बाल कविता3 भावनात्मक1 भावनात्मक रचना1 मन1 मनहरण घनाक्षरी2 मनहरण घनाक्षरी छंद5 महिला सशक्तिकरण पर प्रेरणादायक कहानी।1 माँ का त्याग1 माता पिता1 मुक्तक3 मुहावरे पर आधारित लघुकथा1 मोबाइल फोन मोबाइल की लत तकनीक डिजिटल जीवन1 रिश्ते1 रोला छंद2 लघु कथा2 लघु कहानी6 लघुकथा19 लेख4 वर्षा ऋतु1 व्यंग कविता1 व्यंग लेख1 शिक्षा -परीक्षा1 शुभकामना कविता1 संघर्ष1 संस्मरण1 संस्मरणात्मक लेख1 सकारात्मक सोच1 समीक्षा2 साहित्य1 हाइबन1 हायकु3 हास्यव्यंग कविता1 हास्यव्यंग लघुकथाएं1 हिंदी भावनात्मक कहानी1 हिंदी लघुकथा प्रेरक लघुकथा रिश्ते मनमुटाव संवाद जीवन दर्शन1 हिंदी लघुकथा माँ का त्याग प्रेरक लघुकथा प्रेरणादायक कहानी1 हिंदी साहित्य1 हिन्दी कविता1
ज़्यादा दिखाएं