संदेश

गुस्सा क्यों हो सूरज दादा

चित्र
गुस्सा क्यों हो सूरज दादा ! आग उगलते हद से ज्यादा ! लू की लपटें फेंक रहे हो , आतप अवनी देख रहे हो । छाँव भी डरकर कोने बैठी, रश्मि तपिश दे तनकर ऐंठी । बदरा जाने कहाँ खो गये, पर्णहीन सब वृक्ष हो गये । माँ धरती भी दुःखी रो रही, दया आपकी कहाँ खो गयी ? जल, जलकर बस रेत बची है । अग्निकुंड सी वो भी तची है ! दीन-दुखी को और दुखाते ! नीर नदी का भी क्यों सुखाते ? मेरी मानो सूरज दादा ! मत त्यागो निज नेक इरादा । सूर्य देव हो तुम जगती के ! अर्ध्य देते जल सब भक्ति से । जीव-जगत के हो रखवारे वन्य वनस्पति तुमसे सारे । क्यों गुस्से में लाल हो रहे दीन-हीन के काल हो रहे । इतना भी क्यों गरमाए हो ? दिनचर्या से उकताये हो ? कुछ दिन छुट्टी पर हो आओ ! शीत समन्दर तनिक नहाओ ! करुणाकर ! करुणा अब कर दो ! तप्त अवनि का आतप हर दो ! पढ़िए सूरज दादा पर मेरी एक और रचना ●  कहाँ गये तुम सूरज दादा !

माँ तो माँ है

चित्र
माँ का प्यार और समर्थन हमें सिर्फ बचपन में ही नहीं अपितु जीवन के हर संघर्षों में आत्मविश्वास के साथ खड़े होने की हिम्मत देता है । माँ की ममता और आशीर्वाद का एहसास होते ही हर मुश्किल का सामना करना सम्भव हो जाता है । और माँ के पास बैठते ही तमाम संघर्षों की थकन और दर्द छूमन्तर हो जाते हैं । आज मातृ-दिवस पर सभी मातृ-शक्तियों को नमन, वंदन, हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं । बहुत समय बाद कुछ दिनों के लिए माँ का सानिध्य मिला । माँ तो माँ है । मेरी लेखनी में इतना दम कहाँ कि माँ को लिख सकूँ , हाँ ! माँ की दिनचर्या लिखकर यादें संजोने की कोशिश कर रही हूँ ।                        ब च्चे बड़े हुए बेटियाँ विदा हुई बेटे भी नौकरीपेशा हुए । समय बदला , स्थान तक बदल गये । माँ को भी सास , नानी , दादी की डिग्रियां मिली। पर माँ है कि हमेशा माँ ही रही। वैसी ही फिकर , वैसी ही परवाह ,और वैसी ही व्यस्तता ।  कभी बच्चों के खानपान , स्कूल, पढाई के साथ ही गाय- बच्छी और खेत-खलिहान की परवाह तो अब तड़के सुबह फूल, पौधे, चिड़ियों के दाने पानी की परवाह ।  और तो और गली में घूमती गायें और उनके बछड़े ऊँचे गेट के कुण्डे पर सींग मारकर

कटता नहीं बक्त, अब नीड़ भी रिक्त

चित्र
  वो मंजिल को अपनी निकलने लगे हैं, कदम चार माँ-बाप भी संग चले हैं । बीती उमर के अनुभव बताकर आशीष में हाथ बढ़ने लगे हैं । सुबह शाम हर पल फिकर में उन्हीं की अतीती सफर याद करने लगे ह़ै । सफलता से उनकी खुश तो बहुत हैं मगर दूरियों से मचलने लगे हैं । राहें सुगम हों जीवन सफर की दुआएं सुबह शाम करने लगे हैं । मंदिम लगे जब कभी नूर उनका अर्चन में प्रभु पे बिगड़ने लगे हैं । कटता नहीं वक्त,अब नीड़ भी रिक्त परिंदे जो 'पर' खोल उड़ने लगे हैं । ********** पढ़िए एक और गजल इसी ब्लॉग पर ●  सफर ख्वाहिशों का थमा धीरे-धीरे

हो सके तो समभाव रहें

चित्र
जीवन की धारा के बीचों-बीच बहते चले गये ।  कभी किनारे की चाहना ही न की ।  बतेरे किनारे भाये नजरों को , लुभाए भी मन को ,  पर रुके नहीं कहीं, बहना जो था, फिर क्या रुकते ! कई किनारे अपना ठहराव छोड़ साथ भी आये,  अपनापन दिखाए,कुछ बतियाये,                         फिर कुछ कदम साथ चलकर ठहर गये ।  ऐसे ही कुछ किनारे साथ-साथ चले,  पर साथ नहीं चले !  धारा के मध्य आकर साथ निभाना  शायद मुश्किल था उनके लिए ।  बस किनारे किनारे ही बराबर में दौड़ते रहे, देख-देखकर हँसते-मुस्कराते । हाँ , कहीं उलझनों में उलझा देख, वे भी किनारों पर ठीक सामने ही कुछ ठहरे,  सुलझने की तरकीबें सुझाकर अलविदा बोल  वापस हो लिए अपने ठहराव की ओर ।  आखिर कब तक साथ चलते ! कभी-कभी लगा भी, कि कहीं रुकना था ! तनिक ठहरना था ।  आप-पास,आगे पीछे सब देखा  पर ठहराव मिला ही नहीं।  अपनी तो जड़ें भी मध्य धार में  हिचकोलें खाती बहती चली आ रही थी,  अपने पीछे -पीछे । फिर सोचा ! अब तो तभी ठहरेंगे,  जब मिलेगा अपना एक अच्छा सा ठहराव ।  जहाँ सुकून से समा सकेंगी अपनी ये जड़े भी , जो वक्त की तेज धार में हिचकोले खा-खाकर  कमजोर और मृतप्राय सी होने को हैं । बस फ

मरे बिना स्वर्ग ना मिलना

चित्र
 कंधे में लटके थैले को खेत की मेंड मे रख साड़ी के पल्लू को कमर में लपेट उसी में दरांती ठूँस बड़े जतन से उस बूढ़े नीम में चढ़कर उसकी अधसूखी टहनियों को काटकर फैंकते हुए वीरा खिन्न मन से अपने में बुदबुदायी, "चल फिर से शुरू करते हैं । हाँ ! शुरू से शुरू करते हैं, एक बार फिर , पहले की तरह"।  फिर धीरे-धीरे उसकी बूढ़ी शाखें पकड़ नीचे उतरी। लम्बी साँस लेकर टहनी कटे बूढ़े नीम को देखकर बोली, "उदास मत हो ,  अब बसंत आता ही है फिर नई कोंपल फूटेंगी तुझ पर । तब दूसरों की परवाह किए बगैर लहलहाना तू, और जेष्ठ में खूब हराभरा बन बता देना इन नये छोटे बड़बोले नीमों को, कि यूँ हरा-भरा बन लहलहाना मैंने ही सिखाया है तुम्हें" ! बता देना इन्हें कि बढ़ सको तुम खुलकर इसलिए मैंने अपनी टहनियां मोड़ ली,पत्ते गिरा दिये ,जीर्ण शीर्ण रहकर तुम्हारी हरियाली देख और तुम्हें बढ़ता देख खुश होता रहा पर तुम तो मुझे ही नकचौले दिखाने लगे" ! दराँती को वहीं रखकर कमर में बंधे पल्लू को खोला और बड़े जतन से लपेटते हुए सिर में ओढ़ थैला लिए वीरा चलने को थी कि पड़ोसन ने आवाज लगायी ,  "वीरा ! अरी ओ वीरा ! आज बरसों बाद आखिर

फ़ॉलोअर