गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

....रवि शशि दोनों भाई-भाई.......

स्कूल की छुट्टियां और बच्चों का आपस में
लड़ना झगड़ना.....
फिर शिकायत.... बड़ों की डाँट - डपट......
पल में एक हो जाना....अगले ही पल रूठना...
माँ का उन्हें अलग-अलग करना...
तो एक-दूसरे के पास जाने के दसों बहाने ढूँढ़ना....
न मिल पाने पर एक दूसरे के लिए तड़पना....
     
तब माँ ने सोचा---
यही सजा है सही, इसी पर कुछ इनको मैं बताऊँ,
दोनोंं फिर न लड़ें आपस में,ऐसा कुछ समझाऊँ...

दोनोंं को पास बुलाकर बोली....
आओ बच्चों तुम्हें सुनाऊँ एक अजब कहानी,
ना कोई था राजा जिसमें ना थी कोई रानी...

बच्चे बोले--तो फिर घोड़े हाथी थे...?
                 या हम जैसे साथी थे....!!

माँ बोली---हाँ ! साथी थे वे तुम जैसे ही
                 रोज झगड़ते थे ऐसे ही......

अच्छा!!!... कौन थे वे ?..
  
  ...."रवि और शशि"...
रवि शशि दोनों भाई-भाई
खूब झगड़ते  थे लरिकाई
रोज रोज के शिकवे सुनकर
तंग आ गयी उनकी माई......

एक कर्मपथ ता पर विपरीत मत
झगड़ेंगे यूँ ही तो होगी जगहँसाई
     भाई भाई के झगड़ों से
   चिंताकुल थी उनकी माई!!!!

  बहुत सूझ-बूझ संग माँ ने,
  युक्ति अनोखी तब लगाई!!!
एक ही कर्मपथ, वक्त विलग कर
  माँ ने समता भी निभाई।

🌙शशि निशा संग चमके चन्द्र बन🌜
   🌞रवि दिवाकर कहलाये🌞
   सदैव के लिए बिछड़े तब दोनों
      दण्डित कर माँ ने समझाये।।

यूँ न लड़ो तुम कहा था तुमसे,
फिर भी तुम जो नहीं माने.....
भ्रातृ विरह का दुख है कैसा,
  विलग हुए तब तो जाने...

भ्रातृ विरह में दुखित हुए शशि
 गुमसुम कभी छुप जाते हैं....
रवि भी भ्रातृ मिलन को तरसे
 शीत में मलीन हो जाते हैं.....

      अच्छा ....!!!!
इसी वजह से चंदा मामा
कभी-कभी नहीं आते हैंं....
घुप्प अंधेरे नभ में कुछ दिन
बस तारे टिमटिमाते हैंं.......
और सूरज दादा दुखी, खिन्न,
कभी दीन, नरम हो जाते हैं,
ठिठुर-ठिठुर सर्दी में जब,
हम  धूप ढूँढने जाते हैं.......।

माँ ! हम ज्यादा न लडेंगे अब से
हमको यूँ न सजा देना....
साथ रहेंगे हम जीवन भर,
हमें  दूर नहीं कर देना.....

           




            चित्र ;साभार गूगल से...

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

वृद्ध होती माँ........




सलवटें चेहरे पे बढती ,मन मेरा सिकुड़ा रही है
वृद्ध होती माँ अब मन से बचपने में जा रही हैं।

देर रातों जागकर जो घर-बार सब सँवारती थी,
*बीणा*आते जाग जाती , नींद को दुत्कारती थी ।
शिथिल तन बिसरा सा मन है,नींद उनको भा रही है,
वृद्ध होती माँ अब मन से बचपने में जा रही हैंं ।

हौसला रखकर जिन्होंने हर मुसीबत पार कर ली ,
अपने ही दम पर हमेशा, हम सब की नैया पार कर दी ।
अब तो छोटी मुश्किलों से वे बहुत घबरा रही हैं,
वृद्ध होती माँ अब मन से बचपने में जा रही हैं ।

सुनहरे भविष्य के सपने सदा हमको दिखाती ,
टूटे -रूठे, हारे जब हम, प्यार से उत्साह जगाती ।
अतीती यादों में खोकर,आज कुछ भरमा रही हैं ,
वृद्ध होती माँ अब मन से बचपने में जा रही हैंं ।

                                 
                              चित्र : साभार गूगल से..



(*बीणा* -- भोर का तारा)



                             

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

जानी ऐसी कला उस कलाकार की....


 

कुछ उलझने ऐसे उलझा गयी
असमंजस के भाव जगाकर
बुरी तरह मन भटका गयी,
जब सहा न गया, मन व्यथित हो उठा
आस भी आखिरी सांस लेने लगी
जिन्दगी जंग है हार ही हार है
नाउम्मीदी ही मन में गहराने लगी
पल दो पल भी युगों सा तब लगने लगा
कैसे ये पल गुजारें ! दिल तड़पने लगा
थक गये हारकर , याद प्रभु को किया
हार या जीत सब श्रेय उनको दिया
मन के अन्दर से "मै" ज्यों ही जाने लगा
एक दिया जैसे तम को हराने लगा
बन्द आँखों से बहती जो अश्रुधार थी
सूखती सी वो महसूस होने लगी
नम से चेहरे पे कुछ गुनगुना सा लगा
कुछ खुली आँख उजला सा दिखने लगा
उम्मीदों की वो पहली किरण खुशनुमा
नाउम्मीदी के बादल छटाने लगी
आस में साँस लौटी और विश्वास भी
जीने की आस तब मन में आने लगी
जब ये जानी कला उस कलाकार की
इक नयी सोच मन में समाने लगी
भावना गीत बन गुनगुनाने लगी....

गहरा सा तिमिर जब दिखे जिन्दगी में
तब ये माने कि अब भोर भी पास है
दुख के साये बरसते है सुख बन यहाँ
जब ये जाने कि रौशन हुई आस है
रात कितनी भी घनी बीत ही जायेगी
नयी उजली सुबह सारे सुख लायेगी
जब ये उम्मीद मन में जगाने लगी
हुई आसान जीवन की हर इक डगर
जब से भय छोड़ गुण उसके गाने लगी
इक नयी सोच मन में समाने लगी
जानी ऐसी कला उस कलाकार की
भावना गीत बन गुनगुनाने लगी......


                         चित्र ;साभार गूगल से-

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

वह प्रेम निभाया करता था....



एक कली जब खिलने को थी,
तब से ही निहारा करता था।
दूर कहीं क्षितिज में खड़ा
वह प्रेम निभाया करता था.....

दीवाना सा वह भ्रमर, पुष्प पे
जान लुटाया करता था.....

कली खिली फिर फूल बनी,
खुशबू महकी फ़िज़ा में मिली।
फ़िज़ा में महकी खुशबू से ही
कुछ खुशियाँ चुराया करता था।
वह दूर कहीं क्षितिज में खड़ा
बस प्रेम निभाया करता था ......

फूल की सुन्दरता को देख
सारे चमन में बहार आयी।
आते जाते हर मन को ,
महक थी इसकी अति भायी।
जाने कितनी बुरी नजर से
इसको बचाया करता था ।
दूर कहीं क्षितिज में खड़ा, 
वह प्रहरी बन जाया करता था......

फूल ने समझा प्रेम भ्रमर का,
चाहा कि अब वो करीब आये।
हाथ मेरा वो थाम ले आकर
प्रीत अमर वो कर जाये।
डरता था छूकर बिखर न जाये,
बस  दिल में बसाया करता था ।
दीवाना सा वह भ्रमर पुष्प पे
जान लुटाया करता था........

एक वनमाली हक से आकर,
फूल उठा कर चला गया....
उसके बहारों भरे चमन में,
काँटे बिछाकर चला गया....
तब विरही मन यादों के सहारे,
जीवन बिताया करता था.....
दूर वहीं क्षितिज में खड़ा
वह आँसू बहाया करता था......

दीवाना था वह भ्रमर पुष्प पे,
जान लुटाया करता था.......
दूर कहीं क्षितिज में खड़ा,
बस प्रेम निभाया करता था।

                 चित्र; साभार गूगल से...

शुक्रवार, 25 मई 2018

ज्येष्ठ की तपिश और प्यासी चिड़िया


सुबह की ताजी हवा थी महकी
कोयल कुहू - कुहू बोल रही थी....
घर के आँगन में छोटी सी सोनल
अलसाई आँखें खोल रही थी....
चीं-चीं कर कुछ नन्ही चिड़ियां
सोनल के निकट आई......
सूखी चोंच उदास थी आँखें
धीरे से वे फुसफुसाई....
सुनो सखी ! कुछ मदद करोगी ?
छत पर थोड़ा नीर रखोगी ?

बढ़ रही अब तपिश धरा पर,
सूख गये हैं सब नदी-नाले
प्यासे हैं पानी को तरसते,
हम अम्बर में उड़ने वाले.....
तुम पंखे ,कूलर, ए.सी. में रहते
हम सूरज दादा का गुस्सा सहते
झुलस रहे हैं, हमें बचालो !
छत पर थोड़ा पानी तो डालो !!
जेठ जो आया तपिश बढ गयी
बिन पानी प्यासी हम रह गयी....

सुनकर सोनल को तरस आ गया
चिड़ियों का दुख दिल में छा गया
अब सोनल सुबह सवेरे उठकर
चौड़े बर्तन में पानी भरकर,
साथ में दाना छत पर रखती है....
चिड़ियों का दुख कम करती है ।

मित्रों से भी विनय करती सोनल
आप भी रखना छत पर थोड़ा जल ।।



चित्र: साभार गूगल से...










शनिवार, 19 मई 2018

पेड़-- पर्यावरण संतुलन की इकाई



हम अचल, मूक ही सही मगर
तेरा जीवन निर्भर है हम पर
तू भूल गया अपनी ही जरूरत
हम बिन तेरा जीवन नश्वर

तेरी दुनिया का अस्तित्व हैं हम
हम पर ही हाथ उठाता है,
आदम तू भूला जाता है
हम संग खुद को ही मिटाता है

अपना आवास बनाने को
सौ सौ घर  तोड़े जाता है
परिन्दोंं के नीड़ों को तोड़
तू अपनी खुशी  मनाता है

बस बहुत हुआ ताण्डव तेरा
अबकी तो अपनी बारी है
हम पेड़ भले ही अचल,अबुलन
हम बिन ये सृष्टि अधूरी है

वन-उपवन मिटाकर,बंगले सजा
सुख शान्ति कहाँ से लायेगा
साँसों में तेरे प्राण निहित तो
प्राणवायु कहाँ से पायेगा.....

चींटी से लेकर हाथी तक
आश्रित हैं हम पर ही सब
तू पुनः विचार ले आदम हम बिन
पर्यावरण संतुलित नहीं रह पायेगा ।


शनिवार, 5 मई 2018

सुख का कोई इंतजार....


                       चित्र :साभार गूगल से"

मेरे घर के ठीक सामने
बन रहा है एक नया घर
वहीं आती वह मजदूरन
हर रोज काम पर.....
देख उसे मन प्रश्न करता
मुझ से बार-बार......
होगा इसे भी जीवन में कहीं
सुख का कोई इंतजार...?

गोद में नन्हा बच्चा
फिर से है वह जच्चा
सिर पर ईंटों का भार
न सुख न सुविधा ऐसे में
दिखती बड़ी लाचार....
होगा इसे भी जीवन में कहीं
खुशियों का इन्तजार...?


बोझ तन से ढो रही वह
मन से बच्चे का ध्यान
पल-पल में होता उसको
उसकी भूख-प्यास का भान...
छाँव बिठाकर सिर सहलाकर
देती माँ का प्यार...
होगा इसे भी जीवन में कहीं
खुशियों का इन्तजार....?

जब सब सुस्ताते,थकान मिटाते
वह बच्चे पर प्यार लुटाती
बड़ी मुश्किल से बैठ जतन से
गोदी मेंं अपना बच्चा सुलाती
ना कोई शिकवा इसे अपने रब से
ना ही कोई गिला इस किस्मत से
जो है उसी में जीती जाती...
अचरज होता देख के उसको
मुझको तो बार-बार......
होगा इसे भी जीवन में कहीं
सुख का कोई इंतजार...?

लगता है खुद की न परवाह उसको
वो माँ है सुख की नहीं चाह उसको
संतान सुख ही चरम सुख है उसका
उसे पालना ही अब कर्तव्य उसका
न मानेगी किस्मत से हार.....
होगा इसे भी जीवन में कहीं
सुख का कोई इंतजार.......।