सोमवार, 10 जुलाई 2017

भीख माँगती छोटी सी लड़की



जूस(fruit juice) की दुकान पर,
   एक छोटी सी लड़की....
एक हाथ से,  अपने से बड़े,
   फटे-पुराने,मैले-कुचैले
      कपड़े सम्भालती.....
एक हाथ आगे फैलाकर सहमी-सहमी सी,
         सबसे भीख माँगती.......

वह छोटी सी लड़की उस दुकान पर
     हाथ फैलाए भीख माँगती....
आँखों में शर्मिंदगी,सकुचाहट लिए,
      चेहरे पर उदासी ओढे......
ललचाई नजर से हमउम्र बच्चों को
       सर से पैर तक निहारती.......
वह छोटी सी लड़की ,खिसियाती सी,
         सबसे भीख माँगती.......

कोई कुछ रख देता हाथ में उसके ,
        वह नतमस्तक हो जाती......
कोई "ना" में हाथ हिलाता,तो वह
       गुमसुम आगे बढ जाती.....
     
अबकी  जब उसने हाथ  बढाया,
    सामने एक सज्जन को पाया.....
सज्जन ने  निज हाथों  से अपनी,
      सारी जेबों को थपथपाया........
लड़की आँखों में  उम्मीदें  लेकर,
       देख रही विनम्र वहाँ पर......

सज्जन ने "ना" में हाथ हिलाकर,
   बच्ची की तरफ जब देखा.......
दिखाई दी  उनको भी  शायद,
     टूटते उम्मीदों  की  रेखा......

बढ़ी तब आगे वह होकर  निराश.....
     रोका सज्जन ने उसे........
बढा दिया उसकी तरफ, अपने
     जूस का भरा गिलास......

लड़की   थोड़ा  सकुचाई, फिर
 मुश्किल से  नजर  उठाई ।
सज्जन की आँखों में उसे,
 कुछ दया सी नजर आई।
फिर हिम्मत उसने बढाई......

देख रही थी यह सब मैं भी,
   सोच रही कुछ आगे.....
कहाँ है ये सब नसीब में उसके
   चाहे कितना भी भागे.....
जूस  देख  लालच  वश  झट से,
      ये गिलास झपट जायेगी......
एक ही साँस में जूस गटक कर ये
      आजीवन इतरायेगी.......

परन्तु ऐसा हुआ नहीं, वह तो
   साधारण भाव में थी......
जूस लिया कृतज्ञता से और,
  चुप आगे बढ दी.......

हाथ में जूस का गिलास लिए, वह
        चौराहे पार गई..........
अचरज वश मैं भी उसके फिर
        पीछे पीछे ही चल दी.........

चौराहे पर ; एक टाट पर बैठी औरत,
  दीन मलिन थी उसकी सूरत...
नन्हा बच्चा गोद लिए वह, भीख
   माँगती हाथ बढ़ाकर.....

लड़की ने उस के पास जाकर,
 जूस का गिलास उसे थमाया ।
और उसने नन्हे बच्चे को बड़ी
     खुशी से जूस पिलाया.....

थोड़ा जूस पिया बच्चे ने, थोड़ा-सा
       फिर बचा दिया.....
माँ ने ममतामय होकर, लड़की को
       गिलास थमा दिया.....
बेटी ने गिलास लेकर, माँ के होठों
        से लगा लिया.....
माँ ने एक घूँट छोटी सी पीकर,सर पर
     उसकी थपकी देकर......
  बड़े लाड़ से पास बिठाया ,
फिरअपने हाथों से उसको, बचा हुआ
      वह जूस पिलाया.....
देख प्रेम की ऐसी लीला,मेरा भी
     हृदय भर आया........

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

"मन और लेखनी"




लिखने का मन है,......
लिखती नहीं लेखनी,
लिखना मन चाहता,
कोई जीवनी कहानी ।
शब्द आते नहीं, मन
बोझिल है दुःखी लेखनी ।
लिखने का मन है.......
लिखती नहीं लेखनी ।
मन मझधार में है .......
लेखनी पार जाना चाहती,
मन में अपार गम हैं....
लेखनी सब भुलाना चाहती ।
सारे दुखों  को भूल.......
अन्त सुखी बनाना चाहती,
मन मझधार में है.....
लेखनी पार जाना चाहती ।
चन्द लेख बन्द रह गये,
यूँ  ही  किताबों  में........
जैसे कुछ राज छुपे हों ,
जीवन की यादों में......
वक्त बेवक्त उफनती ,
लहरेंं "मन-सागर" में........
देखो ! कब तक सम्भलती
हैं, ये यादें जीवन में.........?
लेखनी समझे उलझन,
सम्भल के लिख भी पाये......
वो लेख ही क्या लिखना.....
जो "सुलझी-सीख" न दे पाये.......

शुक्रवार, 30 जून 2017

अहंकार



मानसूनी मौसम में बारिश के चलते,
सूखी सी नदी में उफान आ गया ......
देख पानी से भरा विस्तृत रूप अपना,
इतराने लगी नदी, अहंकार छा गया.....
बहाती अपने संग कंकड़-पत्थर,
फैलती काट साहिल को अपने......

हुई गर्व से उन्मत इतनी,
पास बने कुएं से उलझी.......
बोली कुआं ! देखो तो मुझको,
देखो ! मेरी गहराई चौड़ाई ,
तुम तो ठहरे सिर्फ कूप ही ,
मैं नदी कितनी भर आयी !....

शक्ति मुझमें इतनी कि सबको बहा दूँ ,
चाहूँ  गर  तो  तुमको भी खुद में समा दूँ....
मैं उफनती नदी हूँ. ! देखो जरा मुझको,
देखो !बढ रही कैसे मेरी गहराई चौड़ाई...

मेरा नीर हिल्लौरें भरता,
मंजिल तक जायेंगे हम तो....
कूप तू सदा यहीं तक सीमित,
सागर हो आयेंगे हम तो......

कुआं मौन सुन रहा,नदी को ,
नहीं प्रतिकार किया तब उसने.....
जैसे  दादुर  की टर्र - टर्र से ,
कोयल मौन हुई तब खुद में......

चंद समय में मौसम बदला ,
बरसाती जल अब नहीं बरसा....
नदी बेचारी फिर से सूखी
पुनः पतली धारा में बदली......

कुआं नदी को सम्बोधित करके,
फिर बोला  मर्यादित  बनके.......
सुनो नदी !कुछ अनुभव मेरे,
विस्तार ही सब कुछ नहीं बहुतेरे.....

गुणवत्ता बिन व्यर्थ है जीवन ,
बिन उद्देश्य दिग्भ्रमित सा मन....
लक्ष्यविहीन व्यर्थ है विस्तार,
विनाशकारी  है अहंकार.......

क्षमा प्रार्थी संकुचित हो नदी बोली,
गलत किया जब "स्व" को भूली......








मंगलवार, 27 जून 2017

लौट आये फिर कहीं प्यार...




सांझ होने को है......
रात आगे खडी,
बस भी करो अब शिकवे,
बात बाकी पडी........
सुनो तो जरा मन की.,
वह भी उदास है ।
ऐसा भी क्या है तड़पना
अपना जब पास है ।
ना कर सको प्रेम तो,
चाहे झगड़ फिर लो.......
नफरत की दीवार लाँघो,
चाहे उलझ फिर लो......
शायद सुलझ  भी जाएंं
खामोशियों के ये तार......
लौट आयेंं बचपन की यादें,
लौट आये फिर कहीं प्यार....?

खाई भी गहरी सी है,
तुम पाट डालो उसे.......
सांझ ढलने से पहले,
बाग बना लो उसे.........
नन्हींं नयी पौध से फिर,
महक जायेगा घर-बार .........
लौट आयें बचपन की यादें....
लौट आये फिर कहीं प्यार....?

अहम को बढाते रहोगे
स्वयं को भुलाते रहोगे....
वक्त हाथों से फिसले तभी,
कर न पाओगे तुम कुछ भी सार....
सांझ ढलते समझ आये भी,
बस सिर्फ पछताते रहोगे......
लौट आओ जमीं ताकती है,
वक्त कम है,राह झांकती है.....
रात तम में गिरोगे कहाँ तुम,
राह धुंधली हुई जा रही है......
दूरियां ज्यों बढाते रहोगे,
गिरकर उतने ही टुकड़े सहोगे....
टुकड़े- टुकड़े में ही जो सही ,
आने की तो डगर है यहीं ......
यही है इस जीवन का सार...
तुम भी समझो जमीं का ये प्यार......
लौट आओ वहींं से जहाँँ हो,
बन भी जाये पुनः परिवार......
लौट आयेंं बचपन की यादें,
लौट आये फिर कहीं प्यार......?
                                               चित्र साभार गूगल से......

                         



बुधवार, 21 जून 2017

समय तू पंख लगा के उड़ जा......







माँँ !  मुझे भी हॉस्टल में रहना है,मेरे बहुत से दोस्त हॉस्टल में रहते हैं, कितने मजे है उनके !....हर पल दोस्तों का 
साथ.........नहीं कोई डाँट-डपट.....न ही कोई किचकिच......
मुझे भी जाना है हॉस्टल, शौर्य अपनी माँ से कहता.... माँ उसे समझाते हुए कहती "बेटा ! जब बड़े हो जाओगे तब तुम्हे भी भेज देंगे हॉस्टल....फिर तुम भी खूब मजे कर लेना"......
समझते समझाते शौर्य कब बड़ा हो गया पता ही नहीं चला, और आगे की पढ़ाई के लिए उसे भी हॉस्टल भेज दिया गया। बहुत अच्छा लगा शुरू-शुरू में शौर्य को हॉस्टल मेंं......परन्तु जल्दी ही उसे घर और बाहर का फर्क समझ में आने लगा......
अब वह घर जाने के लिए छुट्टियों का इन्तजार करता है,
और घर व अपनोंं की यादों में कुछ इस तरह गुनगुनाता है....



*समय तू पंख लगा के उड़ जा....
उस पल को पास ले आ...
जब मैंं मिल पाऊँ माँ -पापा से ,
माँ-पापा मिल पायें मुझसे
वह घड़ी निकट ले आ.....
*समय तू पंख लगा के उड़ जा ।

छोटे भाई बहन मिलेंगे प्यार से मुझसे,
हम खेलेंगे और लडे़ंगे फिर से.....
वो बचपन के पल फिर वापस ले आ,
*समय तू थोड़ा पीछे मुड़ जा......

तब ना थी कोई टेंशन-वेंशन ना था कोई लफड़ा
ना आगे की फिकर थी हमको ना पीछे का मसला।
घर पर सब थे मौज मनाते खाते-पीते तगड़ा...
खेल-खेल में हँसते गाते या फिर करते झगड़ा ।

माँ-पापा की डाँट डपट में प्यार छिपा था कितना !
अपने घर-आँगन में हम सब मौज मनाते इतना ......
उन लम्होंं को रात नींद में रोज बना दे सपना !
*समय तू कुछ ऐसा कर जा ......
*समय तू पंख लगा के उड़ जा....
मैं मिल पाऊँ अपनो से वह घड़ी निकट ले आ....
*समय तू पंख लगा के उड़ जा......
     

गुरुवार, 15 जून 2017

सुख-दुख





   दुख एक फर्ज है,
फर्ज तो है एहसान नहीं ।
  फर्ज है हमारे सर पर,
कोई भिक्षा या दान नहीं ।

 दुख सहना किस्मत के खातिर,
कुछ सुख आता पर दुख आना फिर ।
 दुख सहना किस्मत के खातिर....

    दुख ही तो है सच्चा साथी
सुख तो अल्प समय को आता है ।
    मानव जब तन्हा  रहता है,
दुख ही तो साथ निभाता है ।

फिर दुख से यूँ घबराना क्या ?
सुख- दुख में भेद  बनाना क्या ?
जीवन है तो सुख -दुख भी हैं,
ख्वाबों मे सुख यूँ सजाना क्या ?

एक  सिक्के के ही ये दो पहलू
सुख तो अभिलाषा में अटका....
दुख में अटकलें लगाना क्या ?

 मानव रूपी अभिनेता हम
सुख-दुख अपने किरदार हुए. ।
जो मिला सहज स्वीकार करें .....
सुख- दुख में हम इकसार बने.....

बुधवार, 7 जून 2017

कर्तव्य परायणता




उषा की लालिमा पूरब में
नजर आई.......
जब  दिवाकर रथ पर सवार,
गगन पथ पर बढने लगे.....
निशा की विदाई का समय
निकट था......
चाँद भी तारों की बारात संग
जाने लगे ..........

एक दीपक अंधकार से लडता,
एकाकी खडा धरा पर.....
टिमटिमाती लौ लिए फैला रहा 
प्रकाश तब......
अनवरत करता रहा कोशिश वह
अन्धकार मिटाने की......
भास्कर की अनुपस्थिति में उनके दिये
उत्तदायित्व निभाने की....
उदित हुए दिनकर, दीपक ने मस्तक
अपना झुका लिया......
दण्डवत किया प्रणाम ! पुनः कर्तव्य
अपना निभा लिया......
हुए प्रसन्न भास्कर ! देख दीपक की
कर्तव्य परायणता को......
बोले "पुरस्कृत हो तुम कहो क्या
पुरस्कार दें तुमको".......?
सहज भाव बोला दीपक, देव !
"विश्वास भर रखना"........
कर्तव्य सदा निभाऊंगा, मुझ पर
आश बस रखना.......
उत्तरदायित्व मिला आपसे,कर्तव्य मैं
निभा पाया.......
"कर्तव्य" ही सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार है ,
 जो मैने आपसे पाया......