गुरुवार, 29 सितंबर 2022

विश्वविदित हो भाषा

Nayi soch blog pic

 मनहरण घनाक्षरी

(घनाक्षरी छन्द पर मेरा एक प्रयास)


 हिंदी अपनी शान है

भारत का सम्मान है

प्रगति की बाट अब

इसको दिखाइये


मान दें हिन्दी को खास

करें हिंदी का विकास

सभी कार्य में इसे ही

अग्रणी बनाइये


संस्कृत की बेटी हिंदी

सोहती ज्यों भाल बिंदी

मातृभाषा से ही निज

साहित्य सजाइये


हिंदी के विविध रंग

रस अलंकार छन्द

इसकी विशेषताएं

सबको बताइये


समानार्थी मुहावरे

शब्द-शब्द मनहरे

तत्सम,तत्भव सभी

उर में बसाइये


संस्कृति की परिभाषा

उन्नति की यही आशा

राष्ट्रभाषा बने हिन्दी

मुहिम चलाइये


डिजिटल युग आज

अंतर्जाल पे हैं काज

हिंदी का भी सुगम सा

पोर्टल बनाइए


विश्वविदित हो भाषा

सबकी ये अभिलाषा

जयकारे हिन्दी के

जग में फैलाइए ।



बुधवार, 14 सितंबर 2022

बने राष्ट्रभाषा अब हिन्दी


Hindi diwas



आगे बढ़ ना सकेंगे जब तक,

                 बढ़े ना अपनी हिंदी ।

                भारत की गौरव गरिमा ये,

                 राष्ट्र भाल की बिंदी ।


                बढ़ा मान गौरवान्वित करती,

                मन में भरती आशा।

                सकल विश्व में हो सम्मानित,

                बने राष्ट्र की भाषा ।


               गंगा सी पावनी है हिन्दी,

               सागर सी गुणग्राही ।

               हर भाषा बोली के शब्दों को ,

               खुद में है समाई ।


               सारी भगिनी भाषाओं को, 

               लगा गले दुलराती।

               तत्सम, तत्भव, देशी , विदेशी,

               सबको है अपनाती।


              आधे-अधूरे शब्दों का भी, 

               बन जाती है सहारा ।

               सारे भारत में संपर्कित,

               भावों की रसधारा।


               स्वाभिमान-सद्भाव जगाती,

               संस्कृति की परिभाषा।

               सर्वमान्य हो सकल जगत में,

               यही सबकी अभिलाषा।


                विश्वमंच पर गूँजे इक दिन,

                हिंदी का जयकारा ।

                बने राष्ट्रभाषा अब हिन्दी,

                यही अरमान हमारा ।




गुरुवार, 8 सितंबर 2022

सार-सार को गहि रहै

 

Road

साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय,

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय। 

"बच्चों इस दोहे मे कबीर दास जी कहते हैं कि, इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है न, जो सार्थक को बचा ले और निरर्थक को उड़ा दे " ।

"गलत ! बिल्कुल गलत"  !.....

मोटी और कर्कश आवाज में कहे ये शब्द सुनकर सरला और उसके पास ट्यूशन पढ़ने आये बच्चे चौंककर इधर-उधर देखने लगे ।

आस-पास किसी को न देखकर सरला के दिल की धड़कन बढ़ गयी उसने सोचा ये आवाज तो बरामदे की तरफ से आयी और वहाँ तो एक खाट पर पक्षाघात की चपेट में आये उसके बीमार पति लेटे हैं।  तो ! तो ये बोलने लगे?   

भावातिरेक से सरला की आँखों से आँसू टपक पड़े।   दीवार का सहारा लेकर खड़ी हुई और बरामदे की तरफ बढ़ी।   

बूढ़ी सिकुड़ी आँखें आशा से चमकती हुई कुछ फैल गयी। काँपते हाथों से पति के ऊपर से चादर हटाई। उखड़ी श्वास को वश में कर, जी ! कहकर उनकी आँखों में झाँका। जो निर्निमेष सीढ़ी के नीचे बने छोटे से स्टोर की ओर ताक रही थी ।

ओह ! ये तो !..  निराशा से शरीर की रही सही हिम्मत भी ज्यों ढ़ेर हो गयी।   ट्यूशन पढ़ने आये बच्चों का ख्याल आया, मन को फिर से ढ़ाँढ़स बंधाया और वापस जाते हुए बुदबुदाई "तो फिर ये आवाज किसकी थी " ?

"मैडम जी !  ये मेरी आवाज है । वही मोटी कर्कश आवाज फिर कानों में गूँजी" ।  ध्यान दिया तो सीढ़ी के नीचे बने उसी छोटे से स्टोर की दीवार से आ रही थी ये आवाज।

दोबारा वही आवाज सुन बच्चे भी उठकर वहाँ आ गये और पूछने लगे ; "क्या हुआ मैम ! कौन है यहाँ" ?

"कक्क्...कोई नहीं बच्चों ! चलो अपनी -अपनी जगह बैठो ! मैं आ रही हूँ, अब हम आगे का पाठ पढ़ेंगे"।असमंजस में थोड़ा हकलाते हुए सरला बोली।

"क्यों ऐसा पाठ पढ़ा रही हैं मैडम जी इन बच्चों को" ?

फिर से वही आवाज सुन सब अन्दर से हिल गये।  बुरी आंशका और भय से सबकी साँसें चढ गयी इससे पहले कि सब भागते फिर से वही आवाज बोली, 

"डरो मत !  मैं सूप हूँ । कोई भूत-ऊत नहीं । इधर देखो यहाँ खूँटी पर टंगा हूँ" ! 

(सब विस्मित होकर स्टोर की दीवार पर टंगे सूप को आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे) 

सूप पुनः बोला ; "अरे मैडम जी ! आप मेरे बारे में पढ़ा रहे थे न, तो मुझसे रहा न गया ,  इन बच्चों को आज की सच्चाई बताना जरूरी समझा मैंने । इसीलिए तो" । 

"ह्ह..हँ...हो..." की आवाज करके भयभीत होकर सब एक दूसरे को पकड़ते हुए फटी आँखो से सूप को ताकने लगे ।

 थोड़ी हिम्मत जुटा सरला ने मुश्किल से कहा , "सूप! तुम  बोलते भी हो ? और ये कौन सी सच्चाई की बात कर रहे हो"?

"अरे मैडम जी ! वही जो आप पढ़ा रही हैं इन बच्चों को, वो तो कबीर के समय की बात थी न, अब वो बात कहाँ ? और सज्जन दुर्जन तो मैं कुछ नहीं जानता, न ही जानना चाहता ये सब जानकर मैं करुंगा भी क्या"? "हा हा हा" करके सूप हँसा,   फिर बोला; "पर मेरे जैसा बनके आप सबने भी क्या ही करना"?

"मतलब"? (सबने मिलकर एक साथ पूछा)

"अरे भई सार सार को बचाता हूँ तो वो सार मेरे पास रहता ही कहाँ है और थोथे को तो उड़ा ही देता हूँ इसीलिए तो वर्षों से अकेले टंगा हूँ यहाँ, इस खूँटी पर, एकदम तन्हा ।  अरे ! मुझसे तो ये डस्टबिन भला ।  हमेशा भरा भरा जो रहता है। मेरी तरह तन्हा भी क्या जीना ! किसे भाती है ऐसी तन्हाई ?  है न । इसीलिए मेरे जैसा मत ही बनो तो ही अच्छा रहेगा"।

"अरे सूप ! ये कैसी बात बता रहे हो तुम बच्चों को"? सरला ने रोष में कहा तो सूप व्यंग भरी आवाज में बोला,  "रहने दीजिए मैडम जी ! जैसा कि आप नहीं जानती तन्हाई का दर्द ! मुझसे कुछ नहीं छुपा है,सब जानता हूँ मैं"।

"अरे ! यहाँ बुरे लोगों को नहीं बुरे विचारों को छोड़ने की बात बताई गयी है। जाने दो! तुम नहीं समझोगे  कहते हुए सरला ने मुँह बिचकाया।

"हैं हैं हैं" व्यंगपूर्वक हँसते हुए सूप बोला, "आप भी कौन सा समझते हैं मैडम जी ? और ये गुरूजी ! ये तो हमेशा यही पढ़ते पढ़ाते थे न, पर देखो अपनों के कहे चार शब्द दिल पे लगा बैठे और ये हालत बना दी अपनी।  कहाँ गया तब इनका निरर्थक बातों और विचारों को छोड़ने वाला ये ज्ञान  ?  सब पढ़ने पढ़ाने की बातें हैं  मैडम जी ! अमल भी करो तो जानूँ" !

 सुनकर सरला के मनोमस्तिष्क में वही पुराने झगड़े की यादें ताजा हो गयी कि कैसे मास्टर जी ने बेटे की कही बातों को दिल पे ले लिया और हो गये धराशायी। 

सोचने लगी सही तो कहा सूप ने सार -सार अपने पास रहता ही कहाँ है, अपना ही बेटा लायक बना तो निकल पड़ा हमें अकेला छोड़ कर । वैसे ये झूठ तो नहीं बोल रहा कि हम जो पढ़ते पढ़ाते हैं उस पर स्वयं ही अमल तो करते नहीं ।  सिर्फ पढ़ने और बोलने से क्या ही होना।



बुधवार, 24 अगस्त 2022

वितृष्णा - "ये कैसा प्रेम था" ?

 

Vitrishna - story

आज खाना बनाते हुए बार-बार आँखें छलछला रही थी नेहा की। महीने भर से दुखी मन को बामुश्किल ढाँढ़स बँधाती नेहा का दुख जैसे आज फिर से हरा हो गया था जब उसे रमेश (पति) ने बताया कि राघव जी आ रहे हैं तो वही पुरानी यादें सिया के साथ बिताये वो पल और फिर वह भयावह हादसा सब दिमाग में ऐसे घूमने लगे,जैसे अभी-अभी की बात हो ।  दुख भी लाजमी था, सिया सिर्फ सखी ही नहीं बहन सी थी उसके लिए । 

पाँच साल पहले उसके पति का तबादला जब दिल्ली हुआ और नेहा बच्चों सहित यहाँ आई तो कितना अकेलापन महसूस कर रही थी । रमेश तो घर में सामान शिप्ट कर अपने नये ऑफिस और ड्यूटी में व्यस्त हो गये। नेहा अकेले क्या-क्या करे, बच्चों को सम्भाले, कि लाया हुआ सामान सैट करे या फिर मार्केट से राशन-पानी लाकर खाने-पीने की व्यवस्था करे । 

अपने फ्लैट में पहुँचकर वह सोच -सोचकर परेशान थी कि दिल्ली जैसे शहर में पानी भी खरीदकर लाना पड़ेगा और अभी तो ये भी नहीं मालूम कि यहाँ से  मार्केट है कितनी दूर ?

तभी डोरबेल की आवाज सुन ये सोचकर दरवाजा खोला कि शायद रमेश आ गये हों छुट्टी लेकर। देखा तो सामने शरबत एवं चाय नाश्ता लेकर कोई अनजान औरत खड़ी है ।

झुँझलाये चेहरे एवं बिखरे बालों पर हाथ फेरते हुए नेहा ने "जी" कहकर जबरन मुस्कुराते हुए आँखों से ही जैसे परिचय पूछा । तो वह  मुस्कराकर बोली,  "जी मैं सिया,  सिया शर्मा । वो सामने वाला फ्लैट हमारा है । अब आप यहाँ रहेंगे तो हम आपके पड़ोसी हुए"। फिर ट्रे को कुछ उठाकर दिखाते हुए बोली "अन्दर आ जाऊँ" ?

"जी , जी जरूर" कहकर नेहा कुछ कसमसा कर पीछे हटी तो सिया ट्रे लिए अन्दर आ गयी और खुद ही गिलास में शरबत डालकर बच्चों को देती हुई उनसे नाम पूछकर प्यार से बतियाने लगी । फिर नेहा को भी शरबत देते हुए बोली, "और आपका शुभनाम" ?

"जी, मैं नेहा" ,  कहते हुए उसने शरबत का गिलास लिया और थैंक्स कहकर सामने रखी कुर्सी की तरफ इशारा करके बैठने का आग्रह किया ।

परन्तु सिया बोली "नेहा जी ! उठना बैठना तो अब होता ही रहेगा , पहले आप बच्चों के साथ चाय - नाश्ता लीजिए और आराम कीजिए । डिनर मैं बना रही हूँ सबका । फिर कल सुबह सब मिलकर आपका सामान सैट कर लेंगे ।आप चिंता मत करना और इस बीच बच्चों को या आपको किसी भी चीज की जरुरत हो तो सीधे आ जाइयेगा, दरवाजा खुला ही है", ओके ! कहते हुए सिया चली गयी । 

नेहा को कुछ ना-नुकर करने या किसी तरह की फॉर्मैलिटी का मौका भी नहीं दिया ।  वह बड़ी दुविधा में पड़ गयी । दरअसल वो पहली बार रमेश के साथ आई थी इससे पहले वो घर-परिवार में अपनों के साथ रही , किसी अनजान व्यक्ति से इस तरह की ना उसे अपेक्षा थी ना ही उम्मीद।

उसके दोनों बच्चे अभी शरबत पीने में व्यस्त थे, इससे पहले कि वे नाश्ता देखकर खाने की जिद्द करें, उसने तुरंत रमेश को फोन किया और सारी बात बताई । उसे लगा कि रमेश अनजान लोगों का दिया चाय नाश्ता नहीं लेने की बात कहेंगे, परन्तु इसके उलट रमेश ने कहा कि ये तो अच्छी बात है तुम लोग नाश्ता करो मजे से !

"हैं !  पर हम तो उन्हें नहीं जानते" ! आश्चर्यचकित हो नेहा बोली।

अरे !नहीं जानते तो जान जायेंगे न धीरे - धीरे  । जब पड़ोसी हैं तो जान -पहचान तो हो ही जायेगी। फिलहाल तुम आराम से बच्चों को नाश्ता करवा लो और खुद भी खा लेना  , ओके... बाय (कहकर रमेश ने फोन रख दिया) ।

बड़ा अजीब लगा नेहा को ये सब । उसने कुछ देर सोचा ,  फिर  हालात और मजबूरी समझते हुए चाय नाश्ता ले ही लिया । 

फिर एक रूम के बैड को झाड़-झपोड़ कर बिस्तर तैयार किया और बच्चों को सुलाने एवं थोड़ा सुस्ताने लेटी तो शाम तक सोती ही रह गयी।

डिनर ही नहीं अगली सुबह तड़के ही ब्रेकफास्ट भी भिजवा दिया सिया ने । और कहेनुसार अपने साथ अपनी मेड कमला को लेकर पहुँच गयी नेहा के घर ।

तीनो ने मिलकर फटाफट घर की साफ-सफाई कर सामान सैट कर दिया । कीचन सैट होने पर नेहा ने चाय बनाई और उन्होंने मिलकर चाय पीते हुए एक-दूसरे के बारे में जाना। बस तभी से आपस में ऐसे घुली-मिली कि जैसे बरसों पुराना रिश्ता हो।

दोनों हर छोटी बड़ी बातें एक-दूसरे से शेयर करती । नेहा के बच्चे छोटे थे, तो सिया ही आ जाती नेहा के घर बच्चों के स्कूल और पति (राघव) के ऑफिस जाने के बाद ।  उसके बच्चों को सम्भाल लेती ताकि वह भी जल्दी काम निबटा कर फ्री हो सके ।

एक-आध साल में नेहा के बच्चे भी स्कूल जाने लगे, तो भी नेहा का काम कभी सिया से पहले खतम नहीं हुआ, सिया तो पति और बच्चों के जाते ही खुद भी फ्री हो जाती और नेहा सबको भेजकर घर का काम शुरू करती क्योंकि रमेश कभी घर के काम में नेहा का हाथ नहीं बँटाते जबकि राघव और सिया सब काम मिल-जुलकर करते । 

इस बात के लिए तो अड़ोस-पड़ोस और जान-पहचान की औरतें भी सिया को बड़ा भाग्यशाली मानती । कई औरतें मजाक-मजाक में उससे पूछती भी कि "सिया कौन से पुण्य किये आपने जो इतने केरिंग हसबैंड मिले" ! तो जबाब में सिया कभी सिर्फ मुस्कुरा देती तो कभी बड़ी श्रद्धा से हाथ जोड नजरें ऊपर उठाते हुए कहती,  "भोलेनाथ की बड़ी कृपा है मुझ पर" । 

सिया हर सोमवार का व्रत किया करती ।  एक बार नेहा ने व्रत के बारे में पूछा उसने  बताया कि मैं अपनी शादी के पहले से ही व्रत करती हूँ भगवान शंकर के । और मैं सच्ची में मानती हूँ कि भोलेनाथ की कृपा से ही पति-पत्नी में आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ता है ।

नेहा पहले कभी ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देती थी , लेकिन अब उसे भी इन सब बातों पर विश्वास होने लगा था । क्योंकि वह जब भी सिया के घर जाती तो देखती कि पति-पत्नी हर काम मिल-जुलकर निबटाते हैं । यहाँ तक कि कीचन में खाना बनाते हुए भी राघव साथ होते हैं सिया के । उसने कभी उन दोंनो के बीच तू-तू  मैं-मैं तो दूर हल्का सा मनमुटाव भी नहीं देखा ।  

वह मन ही मन रमेश पर कुढ़ती । कई बार सामने से भी कहती कि रमेश आप भी मेरा हाथ बँटाया करो न घर के कामों में ! अरे कुछ तो सीखो अपने पड़ोसी राघव जी से ! देखो कितना प्यार है उन्हें अपनी पत्नी से । हर समय साथ होते हैं उनके, हर काम में मदद करते हैं। और एक आप हैं ऑफिस से आते ही टीवी और मोबाइल से चिपक जाते हैं, ना मेरी परवाह न बच्चों की चिंता ।

"अरे ! ऐसा मत कहो यार ! प्यार तो मैं भी बहुत करता हूँ तुमसे , पर क्या करूँ ऑफिस में ही बुरी तरह से थक जाता हूँ , और फिर तुम सब कुछ अच्छे से सम्भाल भी तो लेती हो । तुम्हीं ने तो बिगाड़ी मेरी आदत , और अब ऐसे ताने मार रही हो",  कहकर रमेश मुँह फुला लेते ,  तो कभी मजाक में कहते,  "यार ! राघव जी से बात करनी पड़ेगी मुझे,  कि इतना भी जोरू के गुलाम ना बने कि हम सरीखों को ताने पड़ें" ।

एक सोमवार जब रमेश को पता चला कि नेहा व्रत कर रही है तो उसे समझाते हुए बड़े मनुहार से कहा, "नेहा व्रत रहने दो यार ! दिया-बत्ती और पूजा पाठ करके भगवान का स्मरण करते हैं न हम सुबह शाम । बस बहुत है इतना । ये उपवास रख कर खाली पेट घर और बच्चों को कैसे सम्भालोगी । चलो खाना खा लो "!

सुनकर नेहा बहुत खुश हुई, एकदम चहकती हुई बोली, "अरे वाह! रमेश ! , आप मेरी केयर कर रहे हैं ! सही कहती हैं सिया । सोमवार का व्रत अभी तो शुरू ही किया कि भोलेनाथ की कृपा होने लगी।अब तो मैं सारे सोमवार व्रत रखूंगी" ।

रमेश समझ गया कि नेहा नहीं मानने वाली ।  इसलिए बस कोशिश करता कि सोमवार को नेहा की थोड़ी बहुत मदद करूँ ताकि भूखे पेट उस पर काम का बोझ थोड़ा हल्का हो सके ।और नेहा को खुशी होती कि भोलेनाथ की कृपा से रमेश अब उसकी परवाह करने लगे हैं । वह ये सभी बातें सिया से शेयर करती और भगवान के साथ-साथ उसका भी धन्यवाद करती ।

एक सुबह सिया ने नेहा को घर की चाबी देते हुए बताया कि "राघव को हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ा है उन्हें बुखार था, जाँच से पता चला कि उन्हें खतरनाक डेगूं हुआ है मैं वही जा रही हूँ बच्चों के स्कूल से आने पर खाना खिला देना" ।  

सुनकर नेहा को बहुत दुख हुआ उसने चाबी मेज पर रखी और फटाफट अपने को व्यवस्थित किया और चिंतित होकर बोली , "चलो मैं भी चलती हूँ और रमेश को भी फोन करके ऑफिस से वहीं बुला लेते हैं , बच्चों की बाद में सोच लेंगे ।

तो सिया बोली, "नहीं नेहा ! रमेश जी को बुलाने की जरूरत नहीं है और तुम भी घर पर ही रुककर बच्चों को देख लेना , मैं जाकर देखती हूँ अगर जरूरत पड़ी तो मैं तुम्हें फोन करुँगी" ।

राघव बीमार थे और प्राण सिया के सूख रहे थे । कितनी दुबली हो गयी थी वह। ना खाती थी ना ही चैन से सो ही पाती थी । सुबह शाम हॉस्पिटल के चक्कर काटना ।  मन्नतें करना उपवास रखना । नेहा ने कितनी बार समझाया, सिया चिंता मत करो, डॉक्टर ने कहा न चिंता वाली कोई बात नहीं, राघव जी पहले से बेहतर हैं और जल्द ही बिल्कुल ठीक हो जायेंगे । अपना भी ख्याल रखो , पर सिया कहती "यार मैं तो ठीक ही हूँ बस एक बार ये ठीक-ठाक घर आ जायें तो चैन मिले ।

और भगवान ने उसकी सुन ली । उस शाम जब सिया हॉस्पिटल से लौटी तो उसके मुरझाए बेचैन चेहरे पर थोड़ी सी राहत थी ।  सूखे पपड़ाये होंठ खुशी से कुछ पसरे तो खून रिसने लगा, नेहा ने झट से पानी लाकर उसे बिठाते हुए पहले पानी पीने को कहा तो एक घूट बामुश्किल गटक कर लम्बी की साँस खींच उतावली हो बोली, "राघव कल डिस्चार्ज हो जायेंगे, नेहा !

"अच्छा !  ये तो बड़ी खुशी की बात है , चलो अब तो खुश हो न सिया ! अब शान्ति से बैठो मैं चाय बनाकर लाती हूँ । बच्चे भी ट्यूशन से आते ही होंगे । खुश हो जायेंगे सुनकर" ।

"चाय -वाय छोड़ो न नेहा ! पहले मेरे साथ कल के लिए कुछ सरप्राइज प्लान करो ना" । 

"सरप्राइज" !  खुशी से चिल्लाते हुए उसके दोनों बच्चे आकर उस पे चिपक गये । फिर पूछने लगे "कैसा सरप्राइज मम्मा ! सरप्राइज पार्टी ? मतलब पापा आ रहे हैं" ? सिया ने खुशी से हाँ में सिर हिलाया तो दोनों  "ए "   करके खुशी से नाचने लगे । फिर बोले, "मम्मा ! हम भी कल की छुट्टी कर लें स्कूल की ? प्लीज" ?

तो सिया बोली, "ठीक है बाबा कर लेना" ! 

 "ए..."  कहते हुए दोनों खुशी से उछलने लगे।

उन सबको खुश देखकर नेहा भी बहुत खुश हुई । इतने दिनों से बच्चे नेहा के ही पास थे वे जब तब पापा को याद करके उदास हो जाते थे, आज उनकी इस खुशी के लिए उसने मन ही मन भगवान का धन्यवाद किया और सिया से बोली, कि मैं सुबह बच्चों को स्कूल भेजकर साढ़े सात बजे तक आ जाउंगी फिर मिलकर तैयारी करेंगे सरप्राइज पार्टी की  ।  अकेले शुरू मत हो जाना , सिया ! तुम्हें आराम की जरूरत है । फिलहाल आराम करो । कल सुबह मिलकर सारी तैयारी कर लेंगे" ।

अगली सुबह नेहा ने अपने बच्चों को स्कूल भेजा।  रमेश ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था , उसे बताकर सिया के घर चली गयी । दरवाजा बंद था डोरबेल की आवाज से भी सिया ने दरवाजा नहीं खोला तो नेहा ने कीचन की खिड़की से उचककर आवाज देते हुए अंदर झाँका ।

बह रहे खून को देखकर आँखें भींच ली फिर अपनी ही आँखों पर संदेह करते हुए मन ही मन सोचा कि ये मुझे सुबह-सुबह कैसा भ्रम हो रहा है । दुबारा झाँककर देखा तो उसके होश उड़ गये, आँखें फटी की फटी रह गयी, मुँह से बोल नहीं निकल रहे थे , पूरी शक्ति लगाकर एक चीख निकली , "सिया !......"

इधर रमेश ने उसके चिल्लाने की आवाज सुनी तो दौड़कर वहाँ पहुँचा, देखा नेहा बेहोशी में गिरने ही वाली है तो झट से उसे थामकर हिलाया तो उसने कुछ सम्भलकर आँखें खोली। डबडबाई भयभीत आँखों से रमेश को देखा और फफकते हुए आधे-अधूरे शब्द बोलकर खिड़की की तरफ इशारा किया।

"क्या हुआ नेहा ? क्या है वहाँ "  कहकर रमेश ने उसे वहीं बिठाया और खिड़की से अन्दर झाँका, तो देखा सिया जमीन में गिरी है और उसके सिर से खून की नदी सी बह रही है।

सिया जी !...सिया जी ! कहकर जोर जोर से आवाज देते हुए वह कभी दरवाजे पर तो कभी खिड़की पर हाथ मारने लगा । नेहा भी उठी और जोर-जोर से सिया और बच्चों को आवाज देने लगी ।

उनका शोर सुनकर अगल-बगल के और लोग भी इकट्ठा हो गये मजबूरन दरवाजा तोड़कर अन्दर गये , किसी ने फोन कर एम्बुलेंस बुलाई, आनन-फानन उसे हॉस्पिटल पहुँचाया परन्तु  सिर का बहुत ज्यादा खून बह जाने कारण डॉक्टर उसकी जान नहीं बचा पाये ।

डॉक्टर के अनुसार  तनाव व कमजोरी से चक्कर खाकर गिरने और किसी भारी चीज से सिर टकराकर  ज्यादा रक्तस्राव होने के कारण उसकी मृत्यु हुई ।

गिरकर चोट लगने पर शायद वह चिल्लाई भी हो परन्तु अफसोस कि उसके बच्चे जो अन्दर कमरे में सो रहे थे कूलर की आवाज में अपनी माँ की चीख न सुन पाये ।

नेहा रोते हुए  खुद को कोस रही थी कि काश मैं ही थोड़ा पहले आती तो शायद उसकी जान बच जाती। तो कभी बदहवास सी ज्यों उसे डाँटती कि "सब्र नहीं था सिया ! जब कहा था मैंने कि साथ मिलकर तैयारी करेंगे फिर इतनी जल्दी अकेले लगने की क्या जरूरत थी ।

राघव पर तो दुखों का मानो पहाड़ ही टूट गया था ।हॉस्पिटल से घर आकर उसे क्या देखने को मिला था ।बच्चे जो सरप्राइज पार्टी और पापा के लिए स्कूल नहीं गये थे, पापा मिले पर माँ को खो चुके थे ।

खबर मिलते ही गाँव से उनके अपने सगे सम्बन्धी पहुँच गये थे सिया का अंतिम संस्कार व अन्य सभी कर्मकाण्डों के लिए वे सभी अपने पैतृक गाँव चले गये।

आज एक महीने से ऊपर ही हो गया था जब रमेश को राघव ने फोन पर अपने आने की सूचना दी थी और नेहा उनके भोजन की व्यवस्था कर रही थी । 

वह रमेश से बोली, "बच्चों का ख्याल मैं रख लूँगी , आपको बस राघव जी को सम्भालना होगा ,बेचारे कैसे उबरेंगे इस दुख से । पूरे घर भर में सिया की यादें हैं ।सिया के बगैर अब क्या होगा उनका ? बेचारे" ! कहते हुए वह रुआंसी हो गयी।

"चिंता मत करो नेहा ! भगवान दुख देते हैं तो सहने और सम्भलने की शक्ति भी देते हैं । फिर हम हैं न यहाँ पर । ख्याल रखेंगे उनका । पर तुम खुद ही ऐसे दुखी रहोगी तो उन बच्चों को कैसे सम्भालोगी ! सब ठीक हो जायेगा" कहकर रमेश ने नेहा को ढाँढ़स बंधाया ।

रात करीबन आठ बजे  डोरबेल की आवाज सुन  दरवाजा खोला तो बच्चों को देख नेहा भावुक हो गयी दोनों को एक साथ गले लगाया । पर बच्चे भावशून्य से मिले और रमेश को भी नमस्ते कहकर सिया के दोनों तरफ खड़े हो गये ।

तभी मिठाई का डिब्बा हाथ में लिए राघव के साथ एक नई-नवेली दुल्हन सी सजी अल्हड़ उम्र की लड़की को देख दोनों ने असमंजस में एक दूसरे की तरफ देखा।  ।

मिठाई का डिब्बा सामने रखे मेज पर रख राघव ने  रमेश की तरफ हाथ बढ़ाया, जबरन हाथ पकड़कर खुशी-खुशी बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाकर लड़की की तरफ इशारा कर बोला, "ये मेरी पत्नी है श्रुति और श्रुति ये हैं रमेश जी और नेहा जी हमारे पड़ोसी" ।

सुनकर हतप्रभ सी नेहा की आँखें फटी की फटी रह गयी, "हुँह" की आवाज के साथ वह लड़खड़ाकर गिरने को हुई तो पास खड़े बच्चों ने उसे सम्भाल लिया । कितने ही सवाल एक साथ उसके जेहन में बबाल मचाने लगे परन्तु होंठ फड़फड़ाकर रह गये । तभी कन्धे पर रमेश के हाथों का स्पर्श महसूस किया तो जबरन आँखें मूँदकर मुँह फेर लिया ।

रक्तवर्ण जलती आँखों से रमेश ने राघव की तरफ देखा  बहुत कुछ कहना चाहा परंतु हाथ झटक कर रह गया फिर मेज से मिठाई का डिब्बा उठा वापस उसके के हाथ में पकड़ाते हुए बोला , "मुबारक हो आपको शादी भी और ये मिठाई भी ! अब हम तो पड़ोसी ठहरे कुछ कहने का हक ही कहाँ है हमें । 

हाँ पर इतना तो कह सकते हैं कि आप अपना ये डिब्बा लीजिए और अपने घर चले जाइए ! चले जाओ यहाँ से प्लीज !  दबी आवाज में दाँत पीसते हुए रमेश ने कहा और उनकी तरफ पीठ फेरते हुए अपनी मुट्ठियाँ भींच ली ।

अगली सुबह नेहा अनमने से उठी और बालकनी में पौधों को पानी देने गयी तो पडोस में नजर पड़ी, राघव अब श्रुति के आगे पीछे डोल रहा था , सिया उसका बीता कल बनकर उसकी जिंदगी से ही नहीं यादों से भी जा चुकी थी ।  हाँ बच्चों की खामोशी और उदासी देखी नहीं जा रही थी, पर वह जान चुकी थी कि बच्चे भी सम्भल ही जायेंगे । दुखी मन वह बुदबुदायी "महीने भर में ही तुम्हारी जगह किसी और को दे दी सिया ! वह भी उसने जिसके लिए तुमने खुद की परवाह तक नहीं की। ये कैसा रिश्ता था तुम्हारा ? इसमें प्यार था भी या नहीं। उसका मन वितृष्णा से भर उठा ।।


सोमवार, 1 अगस्त 2022

जिसमें अपना भला है , बस वो होना है

Poem nayisoch


जब से खुद को खुद सा ही स्वीकार किया

हाँ औरों से अलग हूँ, खुद से प्यार किया ।


अपने होने के कारण को जब जाना ।

तेरी रचनात्मकता को कुछ पहचाना ।


जाना मेरे आस-पास चहुँ ओर है तू।

दिखे जहाँ कमजोर वही दृढ़ छोर है तू।


ना चाहा फिर बल इतना मैं कभी पाऊँ ।

तेरे होने के एहसास को खो जाऊँ ।


दुनिया ने जब जब भी नफरत से टेरा ।

तूने लाड दे आकर आँचल से घेरा ।


तेरी पनाह में जो सुख मैंने पाया है  ।

किसके पास मेरा सा ये सरमाया है  ।


दुनिया ढूँढ़े मंदिर मस्जिद जा जा के,

ना देखे,  तू पास मिरे ही आया है ।


तेरी प्रणाली को लीला सब कहते हैं ।

शक्ति-प्रदाता ! निर्बल के बल रहते हैं ।


अब न कभी अपनी कमियों का रोना है ।

जिसमें अपना भला है, बस वो होना है ।


कुछ ऐसा विश्वास हृदय में आया है ।

माया प्रभु की कहाँ समझ कोई पाया है ।


सरमाया = धन - दौलत, पूँजी 







विश्वविदित हो भाषा

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