गुरुवार, 20 जनवरी 2022

कहाँ गये तुम सूरज दादा ?

 

Winter sun



कहाँ गये तुम सूरज दादा ?

क्यों ली अबकी छुट्टी ज्यादा ?

ठिठुर रहे हैं हम सर्दी से,

कितना पहनें और लबादा ?


दाँत हमारे किटकिट बजते ।

रोज नहाने से हम डरते ।

खेलकूद सब छोड़-छाड़ हम,

ओढ़ रजाई ठंड से लड़ते ।


क्यों देरी से आते हो तुम ?

साँझ भी जल्दी जाते क्यों तुम ?

अपनी धूप भी आप सेंकते,

दिनभर यूँ सुस्ताते क्यों तुम ?


धूप भी देखो कैसी पीली ।

मरियल सी कुछ ढ़ीली-ढ़ीली ।

उमस कहाँ गुम कर दी तुमने 

जलते ज्यों माचिस की तीली ।


शेर बने फिरते गर्मी में ।

सिट्टी-पिट्टी गुम सर्दी में ।

घने कुहासे से डरते क्यों ?

आ जाओ ऊनी वर्दी में !


निकल भी जाओ सूरज दादा ।

जिद्द न करो तुम इतना ज्यादा।

साथ तुम्हारे खेलेंगे हम,

लो करते हैं तुमसे वादा ।


कोहरे को अब दूर भगा दो !

गर्म-गर्म किरणें बिखरा दो !

राहत दो ठिठुरे जीवों को,

आ जाओ सबको गरमा दो !



मंगलवार, 11 जनवरी 2022

"पत्थरदिल मर्द बेदर्द कहलाता" हूँ मैं...

A man
चित्र साभार shutterstock से


दिल में सौ दर्द छिपे, करूँ किससे शिकवे गिले।

मर्द हूँ रो ना सकूँ , जख्म चाहे हों मिले।

घर से बेघर हूँ सदा फिर भी घर का ठहरा,

नियति अपनी है यही, विदा ना अश्रु ढ़ले।।


घर से निकला जो कमाने, दिल पत्थर का बनाया ।

माँ की गोदी में सिर रखा, फिर भी मैं रो नहीं पाया।

उन समन्दर भरी आँखों से आँखें चार कर खिसका ।

बही जब नाक अश्कों से ,तो मफलर काम तब आया।


झूठी मुस्कान झूठी शान ले के जी रहा हूँ।

मैं फौलाद कहने का,  टूक दिल सी रहा हूँ।

करनी कापुरुष की 'सजा ए शक' में हूँ मैं,

वेवजह बेएतबारी का जहर पी रहा हूँ।।


घर समाज हो या देश पहरेदार हूँ मैं ।

माँ बहन बेटी की सुरक्षा का जिम्मेदार हूँ मैं।

अनहोनियाँ करते नरपिशाच मेरा रूप लिए,

बेबस विवश हूँ उन हालात पर लाचार हूँ मैं।।


खामोशी ओढ़के जज्बात छुपाता हूँ मैं।

बेटा,भाई, पति,पिता बन फर्ज निभाता हूँ मैं।

भूलकर दर्द अपने जिम्मेदारियाँ निभाने

"पत्थरदिल मर्द बड़ा बेदर्द" कहलाता हूँ मैं।।


मंगलवार, 4 जनवरी 2022

पीनी है चाय तो धैर्य जरूरी है भाई !

A cup of tea
चित्र साभार,shutterstock से


शिशिर के कुहासे में ठिठुरता दिन देख मन चाय पीने का कर गया अब मन कर गया तो तन का क्या ! वो तो ठहरा मन के हाथ की कठपुतली ! मसालेदार चाय का कप लेकर हाजिर। 

मन को भी कहाँ सब्र था , सुड़कने को आतुर! आदेश पाते ही हाथ ने कप उठाया और होंठों तक ले ही गया कि जुबान कैंसी सी कटकटाते हुए बोली  ;   

"हे !  खबरदार !  खबरदार जो चाय का एक घूँट भी मुझ तक पहुँचाया ! चाय ! वह भी इतनी गरम ! ना बाबा ना ! अब ये अत्याचार सहन नहीं कर सकती।
ठहर जा हाथ ! मैं इस तरह जल कर नहीं मर सकती !

हाथ बेचारा ठिठककर रह गया, फिर थोड़ी हिम्मत कर धीरे से बोला, 
"ठंडी का मौसम है यार ! मन है थोड़ा डोला"। 

जुबान फिर किटकिटाती हुई बोली, "सिर में डाल न, पता चल जायेगा, बड़ा आया तन मन का हमजोली ! समझ क्या रखा है तुमने मुझे ? जो चाहे ठूँसते जाते हो। अब ऐसा ना करने दूँगी किसी भी हाल में मैं तुझे!

बताये देती हूँ , ये चाय-वाय नहीं पीनी मुझे। देख कितनी कोमल हूँ मैं ? क्या दिखता नहीं तुझे ?

चाय पीने के लिए सबसे पहले धैर्य की जरूरत पड़ती है, और धैर्य/ सब्र तो तुम्हारे उस मुएँ मन में जरा भी नहीं।
 हर बार हड़बड़ी में गटकता है गरम गरम चाय ! और जलकर छाले पड़ जाते हैं मुझ में तो हाय ! 

इत्मिनान से सुड़कना तो उसके बस का है नहीं भाई!  बस हड़बड़ी मची रहती है इसे...।
बिना दिमाग जो ठहरा !  कभी गर्म तो कभी ठंडा !
तंग करके रखा है इसने तो"  जुबान बड़बड़ाई।

ये सब सुनकर मन को तो लग गयी अंदर तक... 
गुस्से से गरमाकर बोला, जुबान! सम्भाल कर बात कर!   इतने में ही क्यों है तू मरती ?
देखा नहीं लोगों को तूने सर्दियों में एक नहीं पाँच- पाँच कप चाय पीते हैं, उनकी जुबान को देख वो तो कभी मना नहीं करती ।

जुबान बोली, देखना मेरा काम नहीं , अब दूसरों का काम भी मुझ पर मत थोप! 
और ये अपनी खाली-पीली अकड़ न मुझको नहीं इस तन दिखा जिसने तुझे सर चढ़ाया है।
गुलाम था तू दिमाग का पर दिमाग को तेरा गुलाम बनाया है !

अपना नाम सुनते ही कोने में पड़ा दिमाग कुलबुलाया ! भींचकर आँखें खोली,तो कुछ होश आया।
दुखी हुआ देखकर कि तन पर मन का राज है
अंकुश से छूटा मन मर्जी चलाता है और 
सहमा- सहमा सारा पंच-इन्द्रीय समाज है।

झट पैंतरा बदल खड़ा हुआ दिमाग ! आखिर दिमाग जो ठहरा !  पल में फैंका अंकुश और मन पर डाला पहरा।

उई.......!   करके मन दिमाग का दास हो गया, 
तन भी खुश हुआ कि दिल दिमाग के पास हो गया।

अब दिल -दिमाग का अनुशासन देख जुबान इतराई 
बोली चाय क्या अब तो कॉफी भी पी लो भाई!

तुम दोनों हो साथ तो धैर्य भी तुम्हारे पास होता है ।
हर बुरी बला या बीमारी का सहज ही नाश होता है।

पीनी है चाय तो धैर्य जरूरी है भाई!
धीरे -धीरे सुड़क लो गर्म चाय
अब ठिठुरन है जब आई !!

बुधवार, 29 दिसंबर 2021

बिटिया का घर बसायें संयम से

Protecting home
चित्र,साभारShutterstock.com से

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"क्या
हुआ माँ जी ! आप यहाँ बगीचे में....? और कुछ परेशान लग रही हैं" ? शीला ने सासूमाँ (सरला) को घर के बगीचे में चिंतित खड़ी देखा तो पूछा। 

तभी पीछे से सरला का बेटा सुरेश आकर बोला,

"माँ !  आप  निक्की को लेकर वही कल वाली बात पर परेशान हैं न ? माँ आप अपने जमाने की बात कर रहे हो, आज जमाना बदल चुका है । आज बेटा बेटी में कोई फर्क नहीं । और पूरे दस दिन से वहीं तो है न निक्की।और कितना रहना, अब एक चक्कर तो अपने घर आना ही चाहिए न। आखिर हमारा भी तो हक है उसपे " ।

"बस !  तू चुप कर ! बड़ा आया हक जताने वाला...

अरे ! अगर वो खुद ही मना कर रही है तो कोई  काम होगा न वहाँ पर...।  कैसे सब छोड़ -छाड़ दौड़ती रहेगी तुम्हारे कहने पर वो " सरला ने डपटते हुए कहा।

"वही तो माँ ! काम होगा ! और काम करने के लिए बस हमारी निक्की ही है ? और कोई नहीं उस घर में? नौकरानी नहीं वो बहू है उस घर की।अरे ! उसको भी हक है अपनी मर्जी से जीने का"। सुरेश चिढ़कर बोला। 

"हाँ ! हक है ।  किसने कहा कि नहीं है उसका हक ?  हो सकता है उसकी खुद की मर्जी न हो अभी यहाँ आने की"।  

"नहीं माँजी निक्की तो खुश ही होगी न अपने घर आने में....जरूर उसे मना किया होगा उन्होंने ।  मुझे तो लगता है अभी से तेवर दिखाने लग गये हैं उसके सासरे वाले"। (शीला सास की बात बीच में ही काटते हुए बोली)

तभी सुरेश भी बोला;  "माँ ! आप तो जानती हैं न । आजकल क्या क्या सुनने को मिल रहा है , ससुराल में बहुओं से कैसा - कैसा व्यवहार कर रहे हैं लोग । अगर ध्यान नहीं दिया तो वे हमें कमजोर समझेंगे और फिर"...

"ना बाबा ना ! जाइये जाकर तैयार हो जाइये आज के आज ही निक्की को वापस घर ले आइये,  मेरा तो मन बैठा जा रहा है"।  शीला बेचैन होकर बोली।

दोनों की बातें सुन सरला खिन्न मन चुपचाप बगीचे में जाकर खुरपी से मिट्टी खुरचने लगी...

तो सुरेश झुंझलाकर बोला, "माँ ! आज बहुत ठंड है, देखो न तबियत बिगड़ जायेगी।पहले ही निक्की की टेंशन  कम है क्या ? क्या काम है यहाँ? मैं माली बुला देता हूँ उससे करवा लेना"।

नहीं माली की जरूरत नहीं मैं देख लुँगी , उखड़े स्वर में सरला बोली।

पर बेटे बहू दोनों जिद्द करने लगे तो उसने कहा ठीक है आती हूँ बस इस पौधे को जरा वहाँ रोप दूँ।

सुनकर दोनों बोले, "फिर से वहाँ?... 

 "माँजी आपने परसों ही तो इसे वहाँ से यहाँ लगाया, अब फिर वहीं क्यों "? शीला ने झुंझलाकर कहा तो सरला बोली;

"परसों कहाँ पूरे दस दिन हो गये अब वहीं वापस लगाती हूँ ...देखो पनप ही नहीं रहा ढंग से"!

"पर माँजी अभी तो ये जड़ पकड़ रहा होगा आप फिर उखाड़ेंगे तो कैसे पनपेगा"?

सुरेश भी बोला ,  "हाँ ! माँ ! वहीं रहने दो न उसे। कभी इधर कभी उधर कैसे पनपेगा बेचारा ! पता नहीं आप इसी के पीछे क्यों पड़ गयी हैं इसके साथ के बाकी पौधों पर फूल भी खिलने लग गये हैं,और ये बेचारा पनप तक नहीं पाया अभी" !

सुनकर सरला झुकी कमर लिए ही बगीचे से बाहर आयी और धीरे-धीरे बामुश्किल कमर सीधी करते हुए दोनों को देखकर बोली, "बात तो सही कही तुम दोनों ने...

कभी इधर -कभी उधर कैसे पनपेगा ये पौधा ?  और देखो पनप भी तो नहीं रहा...है न" ।

"वही तो"..."दोनों एक साथ बोले"।

"बड़े समझदार हो फिर निक्की के साथ ऐसा क्यों कर रहे हो ?  समझते क्यों नहीं कि बेटी भी तो ऐसे ही मायके के आँगन से उखाड़ कर ससुराल के आँगन में रोप दी जाती है। और फिर उसे भी पनपने में वक्त तो लगता ही है।  पर तुम उसे झट से यहाँ बुला देते हो, बार बार फोन कर उनके घर के निजी मामले पूछ-पूछकर जबरदस्ती अपनी राय थोपते हो।

उसे वहाँ के माहौल के हिसाब से ढ़लने ही नहीं दे रहे हो बल्कि अपने ही हिसाब से चलाये जा रहे हो। क्यों" ? (तैश में बढ़ते स्वर को संयत करते हुए सरला आगे बोली)

"क्या हमारी निक्की पढ़ी-लिखी और समझदार नहीं है?   क्या तुम्हें उसकी काबिलियत पर शक है?

क्यों उसकेऔरअपने मन में ससुराल को लेकर शक और नकारात्मकता भर रहे हो ?

माता-पिता हो तुम दोनों उसके,  बिन सोचे-समझे तुम पर भरोसा कर जैसा तुम कहते हो वैसा कर और बोल रही है वो।

उसे वहाँ की परिस्थिति के अनुकूल सोच-समझकर व्यवहार करने की सीख दो न !

अपने मनसूबे और विचार उस पर मत थोपो"! कहते हुए सरला बरामदे में आकर वहीं रखे मोड़े में बैठ गयी।

सुरेश  माँ के पास आकर समझाते हुए बोला, "माँ ! हम निक्की का भला ही तो चाहते हैं न  ! उसके ससुराल वालों से थोड़ा होशियार होकर तो रहना ही होगा न ! देखा न आजकल जमाना कित्ता खराब है। ध्यान तो देना होगा न माँ! है न"...।

शीला ने भी हामी भरी, तो सरला बोली,

"जमाने को छोड़ो ! ये मत भूलो कि ससुराल निक्की का अपना घर है और वहाँ के लोग उसके अपने।अपनायेगी तभी सबका अपनापन भी पायेगी।

कही-कहाई सुनी-सुनाई सुनकर मन में ऐसे ही विचार आते हैं । और फिर तो सही भी गलत लगने लगता है।

हर बात के दो पहलू तो होते ही हैं। हो सकता है तुम दूसरा पहलू समझ ना पाये हों।

ऐसे ही राई का पहाड़ बनाते रहे न,  तो बिटिया का घर बसने से पहले ही उजाड़ दोगे तुम।

फिर समझाते हुए बोली, "अरे बेटा!  मैं ये नहीं कह रही कि उसे उसके हाल पर छोड़ दो। उसकी परवाह न करो!

पर जैसे पढ़ाई के दौरान परीक्षाएं दी न उसने,ठीक वैसे ही जीवन की परीक्षाएं भी देने दो उसे।

 विश्वास रखो ! वह पहले जैसी ही इस परीक्षा में भी अब्बल आयेगी और जीना सीखेगी वह भी हिम्मत से....।

कहीं पिछड़ेगी तो हम सब हैं न।

जाँच-परखकर रिश्ता ढूँढा है न तुमने उसके लिए।अपने चयन और अपनी परवरिश पर भरोसा रखो !और थोड़ा संयम रखो ! बाकी सब परमात्मा की मर्जी"। कहकर वह अन्दर आ गयी।

थोड़ी देर बाद निक्की का फोन आया तो सुरेश ने माँ के सामने आकर ही फोन उठाया और बोला, "कोई बात नहीं बेटा ! आज नहीं आ सकते तो कोई नहीं जब समय मिले तब आना, हाँ अपनी सासूमाँ और बाकी घर वालों से राय मशबरा करके । ठीक है बेटा!  अपना ख्याल रखना"।

सुनकर सरला ने संतोष की साँस ली ।


शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

पुस्तक समीक्षा - 'कासे कहूँ'

 

Book review

मन की महकी गलियों में,

बस दो पल हमें भी घर दो ना!

लो चंद मोती मेरी पलकों के

मुस्कान अधर में भर लो ना!

प्यार और मनुहार से अधरों में मुस्कान अर्पण कर 'कासे कहूँ , हिया की बात' तक  विविधता भरी संवेदना के चरम को छूती पूरी इक्यावन कविताओं का संग्रह  ब्लॉग जगत के स्थापित हस्ताक्षर एवं जाने -माने साहित्यकार पेशेवर इंजीनियर आदरणीय 'विश्वमोहन जी' के द्वितीय संग्रह 'कासे कहूँ'  के रूप में साहित्य जगत के लिए अनमोल भेंट है।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी आदरणीय विश्वमोहन जी एवं उनकी पुस्तक के विषय में विभिन्न शिक्षाविद् भाषाविद् एवं प्रतिष्ठित साहित्यकारों के आशीर्वचन  पुस्तक को और भी आकर्षक बना रहे हैं।

प्रस्तुत संग्रह की प्रथम कविता 'सपनों का साज' ही मन को बाँधकर सपनों की ऐसी दुनिया में ले जाता  है कि पाठक का मन तमाम काम-धाम छोड़ इसकी अन्य सभी रचनाओं के आस्वादन के लिए विवश हो जाता है।

चटक चाँदनी की चमचम

चंदन का लेप लगाऊँ

हर लूँ हर व्यथा थारी

मन प्रांतर सहलाऊँ।

आ पथिक, पथ में पग-पग-

सपनों के साज सजाऊँ।

 सहज सरल भाषा में आँचलिकता की मिठास एवं अद्भुत शब्दसंयोजन पाठक को विस्मित कर देता है।

जज्बातों की खूबसूरती एवं विभिन्न अलंकारों से अलंकृत आपकी समस्त रचनाओं में भावों की प्रधानता को तो क्या ही कहने!!!

प्राची से पश्चिम तक दिन भर

खड़ी खेत में घड़ियाँ गिनकर।

नयन मीत में टाँके रहती,

तपन प्यार का दिनभर सहती।

क्या गुजरी उस सूरजमुखी पर,

अँधियारे जब डाले पहरे।

तुम क्या जानो , पुरुष जो ठहरे!

'तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे' कविता में कवि की नारीभावना उजागर हुई है।

 नारी के प्रति श्रद्धा एवं सम्मान इनकी कविताओं में यत्र-तत्र पल्लवित एवं पुष्पित हुआ है

 'जुलमी फागुन! पिया न आयो। में नारी के प्रति संवेदना हो या फिर 'नर-नपुंसक' में युग-युग से नारी शोषण व अत्याचार पर दम्भी कायर पुरुषत्व को फटकार।👇👇

राजनीति या राजधरम यह,

कायर नर की अराजकता है।

सरयू का पानी भी सूखा,

अवध न्याय का स्वाँग रचता है


हबस सभा ये हस्तिनापुर में,

निरवस्त्र फिर हुई नारी है।

अन्धा राजा, नर-नपुंसक,

निरलज ढीठ रीत जारी है!

आपके दृष्टिकोण में नारी के प्रति संवेदना ही नहींअपितु अपार श्रद्धा भी है जो आपकी  कविता 'नर-नारी' और  'परमब्रह्म माँ शक्ति-सीता' एवं समस्त सृजन में भी साफ दृष्टिगोचर होती है

कवि नारी को पुरुष से श्रेष्ठ एवं अत्यधिक सहनशील मानते हुए कहते हैं कि

मातृ-शक्ति, जनती-संतति,

चिर-चैतन्य, चिरंतन-संगति।

चिन्मय-आलोक, अक्षय-ऊर्जा,

सृष्टि सुलभ सुधारस सद्गति।


प्रतीक बिम्ब सब राम कथा में,

कौन है हारा और कौन जीता।

राम भटकता जीव मात्र है

परमब्रह्म माँ शक्ति-सीता।

माँ शक्ति-सीता परमब्रह्म एवं  श्रीराम जीव मात्र!

नारी के प्रति श्रद्धा श्रेष्ठता और सम्मान के ऐसे उदाहरण आपके सृजन में यत्र-तत्र उद्धृत हैं ।

कवि हमेशा सीमाएं तोड़ता है।चाहे वह आर्थिक हो राजनीतिक हो या फिर सामाजिक। 

'कासे कहूँ' में अपने  बेबाक एवं धारदार लेखन से सम सामयिकी,  मीडिया, सियासत और  अन्य व्यवस्थाओं की धांधलेबाजियों  पर करारा कटाक्ष करते हुए कवि  कहते हैं कि..

कैसलेस, डिजिटल समाज,

मंदी....फिर...आर्थिक बुलंदी।

जन-धन आधार माइक्रो एटीएम

आर्थिक नाकेबन्दी!जय नोटबंदी!!

ऐसे ही आह नाजिर! और वाह नाजिर!में देखिये...

जहाँ राजनीति का कीड़ा है 

वहीं भयंकर पीड़ा है।

जय भारत जय भाग्य-विधाता,

जनगण मनधन खुल गया खाता।

दिग्भ्रमित लेखकों और पत्रकारों पर कटाक्ष है 'पुरस्कार वापसी'...

कलमकार कुंठित- खंडित है

स्पंदनहीन  हुआ दिल है।

वाद पंथ के पंक में लेखक,

विवेकहीन मूढ़ नाकाबिल है।।

दल-दलदल में हल कर अब,

मिट जाने का अंदेशा है।

साहित्य-सृजन अब मिशन नहीं,

पत्रकार-सा पेशा है।।

डेंगू काल में चिकित्सा व्यवस्था के गिरते स्तर पर करारी चोट...

'प्लेटलेट्स की पतवार फँसी 'डेंगी'में।

धन्वन्तरी के धनिक अनुयायी

चिकित्सा की दुकान 

पर बैठे व्यवसायी

कुत्सित-चित्त

धिक-धिक पतित।

कोरोना काल की त्रासदी और लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की पीड़ा तथा शहरी एवं सरकारी उपेक्षा पर...

छुप गये सारे सियार , अपनी माँद में।

अगर पहले ही कोई कह देता 

"आओ ,रहो ,ठहरो

अब तक तमने खिलाया 

अब हमारी भी थोड़ी खाओ


वह 'नीति-निष्ठुरवा' नहीं  न बकबकाता

कवि समाज में फैली बुराइयों रूढियों में जकड़ी जिंदगियों और दरकती मानवीय संवेदनाओं से व्यथित होकर कहते हैं

गाँजे का दम

हाकिम की मनमानी।

दारू की तलाशी

खाकी की चानी

कुटिल कौम ! कैसी फितरत!में सियासत का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए कवि कहते हैं..

सियासत की सड़ी सड़कों पर,

गिद्ध चील मंडराते हैं।

बच्चों की लाशों को जुल्मी,

नोंच -नोंच कर खाते हैं।

तमाम विसंगतियों और विडम्बनाओं में भी कवि आशा का दामन नहीं छोड़ते कवि के अनुसार 'आशा का बीज' कहीं न कहीं अंकुरित हो ही जाता है.....

मरा मानव

पर जागी मानवता

दम भर छलका करूणा का अमृत

थामने को बढ़े आतुर हाथ,

और बाँटने को 

आशा का नया बीजन।

समवेत स्वर।

सृजन!सृजन!!सृजन!!!

विलुप्त होती गौरैया हो या भोर-भोरैया कवि की लेखनी से कोई भी विषय अछूता नहीं है...फिर रिश्तों की तो बात ही क्या... 

'बाबूजी'  में देखिये मध्यमवर्गीय परिवार का ऐसा हृदयस्पर्शी शब्दचित्रण भावुक कर देता है...

कफ और बलगम नतमस्तक!

अरमान तक घोंटने में माहिर,

जेब की छेद में अँगुली नचाते

पकता मोतियाबिंद, और पकाते

सपनों के धुँधले होने तक!

बाबूजी की आँखों में, रोशन अरमान

बच्चों के बनने का सपना!

ऐसे ही समूचे देश के 'बापू' को एक हृदयस्पर्शी  आवाहन ...

उठ न बापू ! जमना तट पर ,

क्या करता रखवाली?

'गरीबन के चूल्हा' /पानी - पानी/ बैक वाटर/बेटी बिदा/मृग मरीचिका/रिश्तों की बदबू/आस्तीन का साँप /पंथ-पंथ मौसेरे भाई'दुकान से दूर । साहित्यकार,'भूचाल, फुटपाथ, जनता जनार्दन की जय आदि जैसे बरबस आकर्षित करते शीर्षक हैं वैसी ही अप्रतिम  एवं गहन चिंतनपरक रचनाएं भी।

 ऐसी कविताएं भावनाओं की प्रसव पीड़ा के उपरान्त ही जन्म लेती हैं जिनमें सृजनात्मकता एवं गहन अनुभूति का चरमोत्कर्ष होता है।

भोर भिनसारे,कउआ उचरे,

छने-छने,मन भरमात।

जेठ दुपहरिया, आग लगाये,

चित चंचल , अचकात।

कासे कहूँ, हिया की बात!

अनेकानेक विसंगतियों की विकलता विविधतापूर्ण सृजनात्मकता आकुल कवि मन कहे तो किससे कहे। अतः ,'कासे कहूँ' शीर्षक पुस्तक को सार्थकता प्रदान करता है।

'कासे कहूँ' पूर्ण साहित्यिक पुस्तक पाठक को अपने काव्याकर्षण में बाँध सकने में पूर्णतः सक्षम है।

फिर भी समीक्षा के नियमों के तहत पुस्तक की आलोचना करूँ तो मेरे हिसाब से 

●अनुक्रमणिका में कविताओं कोअलग-अलग भागों में(विषयवस्तु के आधार पर)बाँटते हुए  क्रमबद्ध किया होता,  शायद ज्यादा बेहतर होता।

● कविताओं में लिखे आँचलिक भाषा के शब्दों का हिन्दी अर्थ जैसे पुस्तक के अंतिम पृष्ठ में दिये हैं हर कविता के अंत में होते तो रचनाएं सभी को समझने में और भी सुलभ होती।

इसके अलावा काव्य सृजन की दृष्टि से सभी कविताएं बेहद उत्कृष्ट हैं भाषा में प्रवाह है कविता में लय एवं शिल्प सौन्दर्य है।खूबसूरत कवरपृष्ठ के साथ प्रस्तुत संग्रह सभी काव्य प्रेमियों एवं साहित्य सेवियों के लिए अत्यंत संग्रहणीय एवं पठनीय पुस्तक है

यदि आप समीक्षा पढ़ रहे हैं तो संग्रह भी अवश्य पढ़िएगा ताकि इस समीक्षा की सत्यता को जाँच सकें।

उत्तम संग्रह हेतु मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।


पुस्तक :  कासे कहूँ

लेखक : © विश्वमोहन

प्रकाशक :  

विश्वगाथा, सुरेन्द्रनगर - 363 002, गुजरात

मूल्य: 150/-

आप निम्न लिंक से पुस्तक प्राप्त कर सकते हैं

https://www.amazon.in/Kase-kahu-Vishwamohan/dp/8194261090/ref=sr_1_1?crid=3GKSK4ZBVWNWF&keywords=kase+kahu&qid=1640337321&s=books&sprefix=kase+kahu+%2Cstripbooks%2C183&sr=1-1




कहाँ गये तुम सूरज दादा ?

  कहाँ गये तुम सूरज दादा ? क्यों ली अबकी छुट्टी ज्यादा ? ठिठुर रहे हैं हम सर्दी से, कितना पहनें और लबादा ? दाँत हमारे किटकिट बजते । रोज नहान...