Thursday, January 31, 2019

🌜नन्हेंं चाँद की जिद्🌛




           
भोर हुई पर नन्हें शशि आज
आसमान में ही विराजमान हैं
       
पिता आकाश इससे अनभिज्ञ
पुत्र रवि के आगमन की शान में हैं।
   
माँ धरती प्रतीक्षा में चिन्तित......
पुत्र शशि की राहें ताक रही ।

कहाँ रह गया नन्हा शशि.......
झुक सुदूर तक झाँक रही ।
     
नन्हा शशि तो जिद्द कर बैठा.....
मैं आज नहीं घर जाऊँँगा ।
               
याद आती है रवि भैया की......
मैं उनसे यहीं मिल पाऊँँगा ।

धरती माँ ने भेजा संदेशा.....
शशि जल्दी से आओ घर !
                 
क्रोधित होंगे आकाश पिता......
तुम क्या करते हो राहों पर ?...

शीत की ठण्डी में ठिठुरा मैं.....
माँ ! काँप रहा हूँ यहाँ थर-थर ।
               
भाई रवि मेरे धूप मुफ्त में......
बाँट रहे हैं ,धरती पर ।

मिलकर उनसे थोड़ी - सी......
गर्माहट भी ले आऊँगा ।
               
याद आती है रवि भैया की.....
उनसे मिलकर ही घर आऊँँगा ।।

      चित्र ;साभार गूगल से...

Monday, January 28, 2019

"कल दे दूंगी.....कसम से"





सीमा बहुत ही सीधी-सादी लड़की थी,बहुत दूर के गाँव से आती थी स्कूल में पढ़ने..........अकेली वही लड़की थी उस गाँव की...लड़के तो बहुत आते थे वहाँ से....  पर लड़कियों को नहीं पढ़ाते थे वे लोग....
उनके गाँव में तो कोई स्कूल था नहीं, दूर के गाँव भेजकर लड़कियों को पढाना वे ठीक नहीं समझते थे ।
क्योंकि  बारहवीं तक के स्कूल में कॉलेज से भी बद्तर माहौल था स्कूल दूर होने के कारण बच्चों को देर से पढाना शुरू करते थे । बारहवीं तक पहुँचते-पहुँचते वे विवाह योग्य हो जाते.........।
लड़कों  में अक्सर अनुशासनहीनता ज्यादा रहती थी।कुछ बिगड़ैल लड़के स्कूल में दादागिरी करते,जिनके  डर से वहाँ लड़कियों कम ही पढ़ती थी.....

सीमा पढ़ने में बहुत ही होशियार थी सबके खिलाफ जाकर उसकी विधवा माँ उसे पढ़ाने भेजती ढ़ेर सारी सीख के साथ।  और सीमा भी माँ की सीख का मान रखने में कोई कसर ना छोड़ती।  जंगल के लम्बे रास्ते आते-जाते ढे़र सारी मुसीबतें पार करते हुए सीमा का बारहवीं का आखिरी साल चल रहा था ।

कुछ लड़कियों से सीमा की पक्की दोस्ती हो गयी थी इतने सालों में ।  पर अब बारहवीं कक्षा के बाद हमेशा के लिए बिछड़ना था इनसे ।   इसीलिए ये सब एक दूसरे
की यादों को सहेजने के लिए उनसे फोटोग्राफ (तस्वीर) ले रहे थे ।

एक सहेली का फोटो सीमा ने अपनी नोटबुक मेंं रखा था।नोटबुक चैक करवाकर लाते हुए राहुल के हाथ लग गयी वह तस्वीर ।
उन दिनों किसी लड़की की तस्वीर किसी लड़के के पास बहुत बड़ी चर्चा का विषय बन जाया करती थी....सीमा की तो आफत ही आ गयी...उफ! अब कैसे निकालूँ इससे ये तस्वीर............। कहींं सहेली को पता चल गया तो...क्या सोचेगी वो मेरे बारे में उसकी एक फोटो भी न सम्भाल पायी मैं.....।  नहीं मुझे कुछ भी करके उससे फोटो वापस लेनी होगी........।

राहुल के पास जाकर बोली;...... मेरी सहेली का फोटो जो तुमने मेरी नोटबुक से लिया उसे मुझे दे दो प्लीज....

अच्छा ! तुम्हें दे दूँ ?...बदले में क्या दोगी तुम मुझे.....?  राहुल बोला, तो सीमा ने कहा; "क्या चाहिए तुम्हें ! किसी विषय का काम पूरा न हो तो मैं कर दुंगी या मेरी नोटबुक चाहिए तो दे देती हूँ, पर राहुल प्लीज वह तस्वीर मुझे दे दो"।

ए......!  मुझे तेरी नोटबुक वगैरह नहीं चाहिए... इस फोटो के बदले अपनी फोटो देनी है तो बात कर,वरना....(कुटिलता से भौंहों को उचकाते हुए) बोल ! देगी अपनी फोटो ...?   बोल न !.......

सीमा असमंजस में पड़ गयी सोचने लगी अपनी फोटो क्यूँ दूँ इसे.........फिर भी सहेली का फोटो लेने के चक्कर में कह दिया, हाँ ! दे दुंगी, अब फोटो दो मुझे....।

राहूल बोला; "तो फिर एक हाथ दे एक हाथ ले....ले पकड़ अपनी सहेली की फोटो......और ला दे अपनी फोटो !......।

झट से फोटो उसके हाथ से लेते हुए सीमा बोली ; "पर मेरी फोटो तो आज मेरे पास नहीं है, पर मैं कल ले आउंगी पक्का" !!!........।

ऐ......!   झूठ मत बोल !!  होगी तेरे पास जरूर.......दे जल्दी अपनी फोटो...!!! नखरे मत दिखा मुझे !!!!     (राहुल चिढ़ते हुए बोला) .......
सीमा ने विश्वास दिलाते हुए कहा ; सच्ची में आज नहीं है मेरे पास......कल पक्का ले आउंगी...।

ऐ......!   खा कसम ! कल पक्का लायेगी, राहुल उंगली दिखाते हुए बोला...तो सीमा ने भी अपनी उंगलियों  से गले को छू्ते हुए बोल ही दिया कसम से !कल जरूर ले आउंगी.....।

(कह तो दिया पर सारे रास्ते इसी उधेड़बुन में रही कैसे टालूं इसे...अपनी फोटो इसे दूंगी तो भूचाल ही आ जायेगा....उफ ! अब क्या करूँ? छुट्टी मार लेती हूँ एक दो दिन की .....पर घर में क्या कहूंगी ? ना ना ....कुछ और ही करना होगा... माँ से पूछूँ ? नहीं यार माँ नहीं समझ पायेगी......माँ से कहना भी ठीक नहीं होगा...खुद ही सोचना होगा मुझे....भगवान जी साथ देना हाँ मेरा!
(आसमान में ताकते हुए हाथ जोड़कर सीमा ने मन्नत माँगी)....।

अगली सुबह राहुल तो अपनी मित्र मंडली के साथ रास्ते में खड़ा था उस के इन्तजार में....।

उसे देखते ही सीमा अन्दर से तो डर सी गयी पर झट से खुद को सम्भालते हुए और भी संजीदा होकर सामने से निकलने लगी तो राहुल बड़े ही छिछोरेपन से उसे रोकते हुए बोला ;    ए...! फोटो कहाँ है ?.......ला दे जल्दी !

सीमा चुप खड़ी होकर उसकी तरफ देखने लगी तो वह बोला; देखती क्या है कसम खायी है तूने......अब मुकर मत जाना...ला दे !!!.

ओह ! फोटो ! अब इसमेंं क्या मुकरना?..वो तो मैने लानी ही है,जब कसम खायी है तो लानी तो है ही...कहा है न "कल पक्का लाउंगी कसम से"....सीमा ने फिर उसी तरह विश्वास दिलाते हुए सादगी से कहा तो उसके दोस्तों ने कहा;चल छोड़ यार!आज भूल गयी होगी...कह रही है तो कल ले ही आयेगी......

अगली सुबह भी यही हुआ सीमा यही कहते हुए आगे बढ़ गयी परन्तु आज उसकी सहेलियां भी उसके साथ थी उन सबको जब पूरी बात पता चली तो उन्हें सीमा की फिक्र होने लगी बोली; क्या जरूरत थी उसके मुंह लगने की, कसम क्यों ली तूने.....? अब क्या करेगी......?  कब तक ऐसे चला पायेगी उसे.....?    तू जानती तो है न इन लड़को को..... अब क्या होगा......  चल और लड़कियों को इकट्ठा करते हैं तब सब मिलकर लड़ेंगे इनसे...।

सीमा जानती थी कोई भी लड़की नहीं लड़ेगी।
ऐसे लड़को से पंगा लेकर कौन खुद को मुसीबत में डालेगा...
वह बोली बस कल ही सब खत्म कर दूंगी चिन्ता मत करो..... सब ठीक हो जायेगा । 
तो तू देगी इसे अपनी फोटो ?......  दिमाग तो ठीक है न तेरा ? क्या करेगी अब?...... उसकी सहेलियां उसे घुड़कने लगी।

अगली सुबह स्कूल पहुँचते ही राहुल दोस्तोंं के साथ  वहीं खड़ा मिला, बोला अब आज भी मना मत कर देना.... चुपचाप दे दे अपनी फोटो....!    बस गुस्सा मत दिलाना मुझे, वरना...

तभी सीमा ने बीच में ही उसे रोकते हुए सादगी कहा; मैं क्यूँ मना करूंगी भला ?...आखिर कसम खायी है मैंने...तुम तो जानते हो मैं कभी झूठी कसम नहीं लेती......पर मैं क्या करूं ? रोज फोटो रखती हूँ अपने पास कि कल तुम्हें देनी है पर हर सुबह आज बन जाती है और मैंने कसम खाकर कहा है कि कल दूंगी फिर आज देकर कसम थोड़े न तोड़नी है ...है न...जब कल आयेगा पक्का दे दूंगी,  "कसम से"(कहकर सीमा धीरे-धीरे आगे बढ़ गयी)......।

राहुल और उसके दोस्त हक्के-बक्के से एक दूसरे का मुंह ताकने लगे.......। एक बोला अरे! इसने तो हम सबको बेवकूफ बना दिया....(मुंह बनाते हुए) कल दूंगी...कसम से...और कल तो आता ही नहीं....भई राहुल इसे तो छोड़ेंगे नहीं.... बड़ी आई सीधी-सच्ची लड़की....। पर राहुल एकदम शान्त स्वर में बोला; चलो कल देखते हैं...।

इधर सीमा की सहेलियां भी झिड़कने लगी उसे...तुझे क्या लगता है वो चुप बैठेगा... पता नहीं अब वो सब क्या करेंगे... सीमा शान्त स्वर में बोली,  देखते हैं....

अगले दिन सीमा का विज्ञान का प्रेक्टिकल था...वह प्रयोगशाला में जा रही थी , उसकी कक्षा की कुछ और लड़कियां और उसकी सहेलियां भी उसके साथ थी,तभी राहुल को अपनी तरफ आते हुए देख कर ये सभी वहीं खड़ी हो गयी.....एक अज्ञात सा भय था सबके मन में....।
राहुल सीमा के पास आया हाथ आगे बढ़ाकर मुस्कराते  हुए बोला ; ऑल दि बैस्ट सीमा! गुड लक... राहुल  से ऐसे अप्रत्याशित से शब्द सुनकर सीमा चुप खड़ी की खड़ी रह गयी...बिना हाथ मिलाये ही राहुल आगे बढ़ गया ...सीमा उसे जाते हुए देखकर सोचने लगी अरे मुझे भी तो उसे विश करना था,प्रेक्टिकल तो उसका भी है...... तभी राहुल ने पीछे मुड़कर देखा सीमा ने बिना कुछ बोले अपना अगूंठा दिखाते हुए विश किया उसने भी हाथ हिला दिया....बाकी सभी लड़कियां सीमा की समझदारी और बुद्धिमत्ता का लोहा मानने लगी... वे भी समझ चुकी थी कि हर जंग लड़कर ही नहीं जीती जाती।


Saturday, January 5, 2019

चलो बन गया अपना भी आशियाना




कहा था मैंने तुमसे
इतना भी न सोचा करो
एक दिन सब ठीक हो जायेगा
अपना ख्याल भी रखा करो
रहते थे तुम्हारे सूखे होंठ 
फुर्सत न थी इतनी कि
पी सको पानी के घूँट
अथक ,अनवरत परिश्रम करके 
हमेशा चली तुम संग मेरे मिलके
दर-दर की भटकन, 
बनजारों सा जीवन
चाहिए था तुम्हें बस अपना आशियाना
लगता बुरा था तब किरायेदार कहलाना....
पाई-पाई बचा-बचाके
जोड़-जुगाड़ सभी लगाके
उम्र भर करते-कमाते
आज बुढ़ापे की देहलीज पे आके
अब जब बना पाये  ये आशियाना
तब तक खो चुकी तुम
अपनी अनमोल सेहत का खजाना
रूग्ण देह कराहते हुए भी
कहती मुझे तुम ये घर सजाना
चलो बन गया अपना भी आशियाना !

पर मैं करूं क्या तुम्हारे बिना
कराहती हो तुम तड़पता है ये दिल 
दुख में हो तुम तो दर्द में हूँ मैं भी
नहीं भा रहा अपना ये आशियाना
अकेले क्या इसको मैंने सजाना
तुम बिन नहीं कुछ भी ये आशियाना

काश मै तब और सक्षम होता
जीवन तुम्हारा कुछ और  होता
आज भी तुम सुखी मुस्कुराती
ये आशियाना खुद से सजाती
हम फिर उसी प्रेम को आज जीते !
बिखरे से सपनों को फिर से संजोते !!
                                       
                       चित्र; साभार गूगल से



            













Friday, December 14, 2018

इधर कुआँ तो उधर खायी है.....


 

अपने देश में तो आजकल चुनाव की
लहर सी आयी है............
पर ये क्या!मतादाताओं के चेहरे पर तो
गहरी उदासीनता ही छायी है..........
करें भी क्या, हमेशा से मतदान के बाद
जनता देश की बहुत पछतायी है.......
इस बार जायेंं तो जायें भी कहाँँ
इधर कुआँ तो उधर खायी है.........

चन्द सफलताओं के बाद ही भा.ज.पा में तो
जाने कैसी अकड़ सी आयी है.......
अपने "पी.एम" जी तो बस बाहर ही छपलाये
देश को भीतर से तो दीमक खायी है.....
बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी और मंहगाई में
रत्ती भर भी कमी नहीं आयी है......
शिशिर की ठण्ड से ठिठुरकर मरते गरीब
जाने कहाँ सरकार ने कम्बल बँटवायी हैं ?.......
इस बार जायें तो जायें भी कहाँ
इधर कुआँँ तो उधर खायी है..........

कॉंग्रेस की जी-तोड़, कमर-कस मेहनत
शायद रंग ले भी आयेगी.....
मुफ्त ये,मुफ्त वो, मुफ्त सो,का लालच देकर
शायद बहुमत पा भी जायेगी.........
जरूरत, लालच,या मजबूरी (जो भी कहो)
बेचकर अपने बेसकीमती मत को.........
फिर नये नेता के बचकानेपन पर
सारी जनता सिर धुन-धुनकर पछतायेगी........

रुको ! देखो !समझो ! परखो ! फिर सही चुनो !
लिखने में मेरी तो लेखनी भी कसमसाई है.....
हमेशा से यहाँ यूँ ही ठगी गयी जनता
राजनीति ने अपनी इतिहास दोहराई है..........
अब जायें तो जायें भी कहाँ
इधर कुआँ तो उधर खायी है.........




                               चित्र;साभार गूगल से...

Wednesday, November 21, 2018

सपने जो आधे-अधूरे




कुछ सपने जो आधे -अधूरे
यत्र-तत्र बिखरे मन में यूँ
जाने कब होंगे पूरे .....?
मेरे सपने जो आधे -अधूरे
   
       दिन ढ़लने को आया देखो
       सांझ सामने आयी.....
       सुबह के सपने ने जाने क्यूँ
       ली मन में अंगड़ाई......

बोला; भरोसा था तुम पे
तुम मुझे करोगे पूरा.....
देख हौसला लगा था ऐसा
कि छोड़ न दोगे अधूरा....

          डूबती आँखें हताशा लिए
          फिर वही झूठी दिलाशा लिए
          चंद साँसों की आशाओं संग
          वह चुप फिर से सोया......
          देख दुखी अपने सपने को
          मन मेरा फिर-फिर रोया.....

सहलाने को प्यार से उसको
जो अपना हाथ बढ़ाया....
ढ़ेरों अधूरे सपनों की फिर
गर्त में खुद को पाया......

         हर पल नित नव मौसम में
         सपने जो मन में सजाये.....
        अधूरेपन के दुःख से दुखी वे
        कराहते ही पाये.....
   
गुनाहगार हूँ इन सपनों के
जिनको है छोड़ा अधूरा....
वक्त हाथों से निकला है जाता
करूँ कैसे अब इनको पूरा.........?
 
        लोगों की नजर में सफल हुए हम
        कि मंजिल भी हमने है पायी.......
        बड़े भागवाले हो कहती है दुनिया
        कि मेहनत जो यूँ रंग लायी.......

सपने अधूरे तो अरमां अधूरे
मन में है बस तन्हाई.....
मन खुश हो कैसे कुछ पाने पर
उन सपनोंं का जो शैदाई.....
   
         कुछ सपने जो आधे-अधूरे
         जाने कब होंगे पूरे.......?

       चित्र : साभार  गूगल से....

Thursday, October 18, 2018

....रवि शशि दोनों भाई-भाई.......

स्कूल की छुट्टियां और बच्चों का आपस में
लड़ना झगड़ना.....
फिर शिकायत.... बड़ों की डाँट - डपट......
पल में एक हो जाना....अगले ही पल रूठना...
माँ का उन्हें अलग-अलग करना...
तो एक-दूसरे के पास जाने के दसों बहाने ढूँढ़ना....
न मिल पाने पर एक दूसरे के लिए तड़पना....
     
तब माँ ने सोचा---
यही सजा है सही, इसी पर कुछ इनको मैं बताऊँ,
दोनोंं फिर न लड़ें आपस में,ऐसा कुछ समझाऊँ...

दोनोंं को पास बुलाकर बोली....
आओ बच्चों तुम्हें सुनाऊँ एक अजब कहानी,
ना कोई था राजा जिसमें ना थी कोई रानी...

बच्चे बोले--तो फिर घोड़े हाथी थे...?
                 या हम जैसे साथी थे....!!

माँ बोली---हाँ ! साथी थे वे तुम जैसे ही
                 रोज झगड़ते थे ऐसे ही......

अच्छा!!!... कौन थे वे ?..
  
  ...."रवि और शशि"...
रवि शशि दोनों भाई-भाई
खूब झगड़ते  थे लरिकाई
रोज रोज के शिकवे सुनकर
तंग आ गयी उनकी माई......

एक कर्मपथ ता पर विपरीत मत
झगड़ेंगे यूँ ही तो होगी जगहँसाई
     भाई भाई के झगड़ों से
   चिंताकुल थी उनकी माई!!!!

  बहुत सूझ-बूझ संग माँ ने,
  युक्ति अनोखी तब लगाई!!!
एक ही कर्मपथ, वक्त विलग कर
  माँ ने समता भी निभाई।

🌙शशि निशा संग चमके चन्द्र बन🌜
   🌞रवि दिवाकर कहलाये🌞
   सदैव के लिए बिछड़े तब दोनों
      दण्डित कर माँ ने समझाये।।

यूँ न लड़ो तुम कहा था तुमसे,
फिर भी तुम जो नहीं माने.....
भ्रातृ विरह का दुख है कैसा,
  विलग हुए तब तो जाने...

भ्रातृ विरह में दुखित हुए शशि
 गुमसुम कभी छुप जाते हैं....
रवि भी भ्रातृ मिलन को तरसे
 शीत में मलीन हो जाते हैं.....

      अच्छा ....!!!!
इसी वजह से चंदा मामा
कभी-कभी नहीं आते हैंं....
घुप्प अंधेरे नभ में कुछ दिन
बस तारे टिमटिमाते हैंं.......
और सूरज दादा दुखी, खिन्न,
कभी दीन, नरम हो जाते हैं,
ठिठुर-ठिठुर सर्दी में जब,
हम  धूप ढूँढने जाते हैं.......।

माँ ! हम ज्यादा न लडेंगे अब से
हमको यूँ न सजा देना....
साथ रहेंगे हम जीवन भर,
हमें  दूर नहीं कर देना.....

           




            चित्र ;साभार गूगल से...

Friday, September 28, 2018

वृद्ध होती माँ........




सलवटें चेहरे पे बढती ,मन मेरा सिकुड़ा रही है
वृद्ध होती माँ अब मन से बचपने में जा रही हैं।

देर रातों जागकर जो घर-बार सब सँवारती थी,
*बीणा*आते जाग जाती , नींद को दुत्कारती थी ।
शिथिल तन बिसरा सा मन है,नींद उनको भा रही है,
वृद्ध होती माँ अब मन से बचपने में जा रही हैंं ।

हौसला रखकर जिन्होंने हर मुसीबत पार कर ली ,
अपने ही दम पर हमेशा, हम सब की नैया पार कर दी ।
अब तो छोटी मुश्किलों से वे बहुत घबरा रही हैं,
वृद्ध होती माँ अब मन से बचपने में जा रही हैं ।

सुनहरे भविष्य के सपने सदा हमको दिखाती ,
टूटे -रूठे, हारे जब हम, प्यार से उत्साह जगाती ।
अतीती यादों में खोकर,आज कुछ भरमा रही हैं ,
वृद्ध होती माँ अब मन से बचपने में जा रही हैंं ।

                                 
                              चित्र : साभार गूगल से..



(*बीणा* -- भोर का तारा)