Monday, October 14, 2019

शरद पुनम के चाँद



अब जब सब प्रदूषित है
तुम प्रदूषण मुक्त रहोगे न
शरद पुनम के चाँद हमेशा
धवल चाँदनी दोगे न.....

खीर का दोना रखा जो छत पे
अमृत उसमें भर दोगे न....
सोलह कलाओं से युक्त चन्द्र तुम
पवित्र सदा ही रहोगे न........

चाँदी से बने,सोने से सजे
तुम आज धरा के कितने करीब !
फिर भी उदास से दिखते मुझे
क्या दिखती तुम्हें भी धरा गरीब...?

चौमासे की अति से दुखी धरा का
कुछ तो दर्द हरोगे न....
कौजागरी पुनम के चन्द्र हमेशा
सबको रोग मुक्त कर दोगे न .......

सूरज ने ताप बढ़ाया अपना 
सावन बिसरा रिमझिम सा बरसना
ऐसे ही तुम भी "ओ चँदा " !
शीतलता तो नहीं बिसरोगे न...

रास पुनम के चन्द्र हमेशा
रासमय यूँ ही रहोगे न....
शरद पुनम के चाँद हमेशा 
धवल चाँदनी दोगे न........
                   
                चित्र साभार गूगल से..

Tuesday, August 20, 2019

गृहस्थ प्रेम




तुम साथ होते हो तो
न जाने कितनी कपोल-कल्पनाएं 
उमड़ती-घुमड़ती हैं अंतस में...
और मैं तड़पती हूँ एकान्त के लिए
कि झाँँक सकूँ एक नजर
अपनी कल्पनाओं के खूबसूरत संसार में।

तुम्हारी नजरों से बचते-बचाते
छुप-छुपके झाँक ही लेती हूँ और
देखने लगती हूँ कोई खूबसूरत सपना
पर तभी तुम टोक देते हो.......
कि "कहाँ खो गई" !!!

फिर क्या.....तुमसे छुपाये नहीं छुपा पाती
अपनी खूबसूरत कल्पनाओं के 
अधूरे से सपने को........
और फिर सुनते ही तुम निकल पड़ते हो 
बिना कुछ कहे ,   जैसे रूठे से.....
मैं असमंजस में सोचती रह जाती हूँ 
कि मैंने किया क्या?......
बस सपना ही तो देखा था अधूरा सा.....

तुम्हारे जाने के बाद समय है एकांत भी !
पर न जाने क्यों कोई सपना नजर नहीं आता
नहीं उमड़ती अंतस में वैसी कल्पनाएं
सब सूना सा हो जाता है.......
तब वर्तमान में हकीकत के साथ जीती हूँ मैं
ठीक तुम्हारी तरह
हमारे हकीकत के घर-संसार की
पहरेदार बनकर.....
तुम्हारे इंतजार में तुम्हारी यादों के साथ !

और फिर एक दिन खत्म होता है
ये यादों का सिलसिला और
पल-पल का इंतजार......
...........तुम्हारे आने साथ !................

हाँ ! आते हो तुम ढ़ेर सारी खुशियाँ लेकर
मेरे अधूरे सपने की पूर्णता के साथ....
मेरी कल्पनाओं को हकीकत बनाकर 
बिखेर देते हो मेरे सपने की खुशबू मेरे इर्द-गिर्द....
कि मैं अपने सपने की हकीकत को महसूस करूँ
कल्पनाओं के संसार में खोकर नहीं .......
हकीकत में रहकर
..............तुम्हारे साथ !..........

पर मैं भला ऐसा कहाँ कर पाती हूँ, आदतन.... 
अपने सच हुए सपने से हमारी गृहस्थी सजाकर
तुम्हारे साथ ही फिर से छुप-छुपाकर
झाँक आती हूँ अंतस में बसे कल्पनाओं के संसार में
और ले आती हूँ फिर से एक नया अधूरा सपना !
फिर वही.....तुम चल पड़ते हो उसे पूरा करने
नया आयाम रचने........

..........यही तो है "गृहस्थ प्रेम"..............
किसी भी गृहस्थी की सम्पन्नता का द्योतक
...................है ना...............
     








Thursday, August 8, 2019

भावनाओं के प्रसव की उपज है कविता....





आज मन में ख्याल आया
रचूँ मैं भी इक कविता
मन को बहुत अटकाया
इधर-उधर दौड़ाया
कुछ पल की सैर करके
ये खाली ही लौट आया
डायरी रह गयी यूँ कोरी
कल्पना रही अधूरी
मैने भी जिद्द थी ठानी
है कविता मुझे बनानी
जा ! उड़ मन परी लोक में
ला ! परियों की कोई कहानी
मैं उसमें से कुछ चुन लूँ
फिर कागज पे कलम से बुन लूँ
बन जाये कोई कविता
जो मन को लगे सुहानी
फुर उड़ चला ये नील गगन में
लौटा फिर इसी चमन में
पर ना साथ कुछ भी लाया
मैने फिर इसे भगाया
जा ! सागर बड़ा सुहाना
सुन्दर हो कोई मुहाना !
कहीं सीपी मचल रही हो...
बूँद मोती में ढल रही हो !
जा ! वहीं से कुछ ढूंढ लाना
रे ! मन खाली न आना !!
पर ये खाली ही आया....
इसे वहां भी कुछ न भाया
मैं तब भी ना हार मानी
मुझे कविता जो थी बनानी
इस मन को फिर समझाया
देख ! सावन कहीं हो आया
रिमझिम फुहारें बरस रहीं हो
धरा महकी बहकी सी हो
कोई नवेली सज रही हो
हाथ मेंहदी रच रही हो
हौले उसके पास जाना
प्रीत थोड़ी ले के आना
मैं उसी से प्रीत चुन लूँ
फिर कागज पे कलम से बुन लूँ
बने कविता या फिर कहानी
जो मन को लगे सुहानी
मेरी जिद्द पे मन उकताया
झट अन्तर में जा समाया
भाव समन्दर के मंथन से
कुछ काव्यरस बाहर आया
झट शब्दमोती चुन न पायी
हाय ! मैं कविता बुन न पायी
उथले में रही अनजानी
न कविता बनी ना कहानी
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ले लेती जो इक गहन गोते का सुख
मेरी कविता भी होती सबके सम्मुख
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भावनाओं  के प्रसव की उपज है कविता....
यूँ बनाने से कहाँ कब बन सकी कविता !!!!














Saturday, May 4, 2019

बेटी----टुकड़ा है मेरे दिल का



 

मुद्दतों बाद उसका भी वक्त आया
जब वह भी कुछ कह पायी
सहमत हो पति ने आज सुना
वह भी दिल हल्का कर पायी

आँखों में नया विश्वास जगा
आवाज में क्रंदन था उभरा
कुचली सी भावना आज उठी
सोयी सी रुह ज्यों जाग उठी

हाँ!बेटी जनी थी बस मैंने
तुम तो बेटे ही पर मरते थे
बेटी बोझ, परायी थी तुमको
उससे नजरें यूँ फेरते थे...

तिरस्कार किया जिसका तुमने
उसने देवतुल्य सम्मान दिया
निज प्रेम समर्पण और निष्ठा से
दो-दो कुल का उत्थान किया

आज बुढापे में बेटे ने
अपने ही घर से किया बेघर
बेटी जो परायी थी तुमको
बिठाया उसने सर-आँखोंं पर

आज हमारी सेवा में
वह खुद को वारे जाती है
सीने से लगा लो अब तो उसे
ये प्रेम उसी की थाती है.......

**********************

सच कहती हो,खूब कहो !
शर्मिंदा हूँ निज कर्मों से......
वंश वृद्धि और पुत्र मोह में 
उलझा था मिथ्या भ्रमोंं से


फिर भी धन्य हुआ जीवन मेरा
जो पिता हूँ मैं भी बेटी का
बेटी नहीं बोझ न पराया धन
वह तो टुकड़ा अपने दिल का !!!!!!
   

               चित्र- साभार गूगल से...

Friday, April 12, 2019

बेटी----माटी सी





कभी उसका भी वक्त आयेगा ?
कभी वह भी कुछ कह पायेगी ?
सहमत हो जो तुम चुप सुनते 
मन हल्का वह कर पायेगी ?

हरदम तुम ही क्यों रूठे रहते
हर कमी उसी की होती क्यूँ....?
घर आँगन के हर कोने की
खामी उसकी ही होती क्यूँ....?

गर कुछ अच्छा हो जाता है
तो श्रेय तुम्ही को जाता है
इज्ज़त है तुम्हारी परमत भी
उससे कैसा ये नाता है......?

दिन रात की ड्यूटी करके भी
करती क्या हो सब कहते हैं
वह लाख जतन कर ले कोशिश
पग पग पर निंदक रहते हैं......

खुद को साबित करते करते
उसकी तो उमर गुजरती है
जब तक  विश्वास तुम्हें होता
तब तक हर ख्वाहिश मरती है...

सूनी पथराई आँखें तब
भावशून्य हो जाती हैं
फिर वह अपनी ही दुश्मन बन 
इतिहास वही दुहराती है......

बेटी को वर देती जल्दी
दुख सहना ही तो सिखाती है
बेटी माटी सी बनकर रहना
यही सीख उसे भी देती है......

Sunday, March 24, 2019

पौधे---अपनों से




कुछ पौधे जो मन को थे भाये
घर लाकर मैंंने गमले सजाये
मन की तन्हाई को दूर कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.......

हवा जब चली तो ये सरसराये 
मीठी सी सरगम ज्यों गुनगनाये
सुवासित सुसज्जित सदन कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.......

इक रोज मुझको बहुत क्रोध आया
गुस्से में मैंंने इनको बहुत कुछ सुनाया।
न रूठे न टूटे मुझपे, स्वस्यचित्त रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये........

खुशी में मेरी ये भी खुशियाँँ मनाते
खिला फूल तितली भौंरे सभी को बुलाते
उदासीन मन उल्लासित कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.......

मुसीबतों में जब मैंने मन उलझाया
मेरे गुलाब ने प्यारा पुष्प तब खिलाया
आशान्वित मन मेरा कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये........

धूल भरी आँधी या तूफान आये
घर के बड़ों सा पहले ये ही टकरायेंं
घर-आँगन सुरक्षित कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.....

                  चित्र साभार गूगल से...











Saturday, March 2, 2019

अब भावों में नहीं बहना है....




जाने कैसा अभिशाप है ये
मन मेरा समझ नहीं पाता है
मेरी झोली में आकर तो
सोना भी लोहा बन जाता है

जिनको मन से अपना माना
उन्हीं ने ऐसे दगा दिया
यकींं भी गया अपनेपन से
तन्हा सा जीवन बिता दिया

एक सियासत देश में चलती
एक घरों में चलती है
भाषण में दम जिसका होता
सरकार उसी की बनती है

सच ही कहा है यहाँ किसी ने
"जिसकी लाठी उसकी भैंस"
बड़बोले ही करते देखे
हमने इस दुनिया में ऐश

नदी में बहने वाले को
साहिल शायद मिल भी जाये
भावों में बहने वाले को
 अब तक "प्रभु" भी ना बचा पाये

गन्ने सा मीठा क्या बनना
कोल्हू में निचोड़े जाओगे
इस रंग बदलती दुनिया में
गिरगिट पहचान न पाओगे

दुनियादारी सीखनी होगी
गर दुनिया में रहना है
"जैसे को तैसा" सीख सखी !
अब भावों में नहीं बहना है
                   
                   चित्र;साभार गूगल से....