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माता-पिता और गुरु की महिमा | प्रेरणादायक हिंदी दोहा - मुक्तक

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परिचय भारतीय संस्कृति में माता-पिता प्रथम गुरु और सद्गुरु जीवन के सच्चे पथप्रदर्शक माने गए हैं। माता-पिता जहाँ संस्कारों की नींव रखते हैं, वहीं गुरु ज्ञान का प्रकाश फैलाकर जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं। प्रस्तुत दोहा-मुक्तकों में गुरु, माता-पिता और सद्गुरु के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता तथा उनके अमूल्य योगदान का विनम्र भाव से वर्णन किया गया है।               माता-पिता और गुरु महिमा पर दोहा-मुक्तक  प्रथम गुरु माता-पिता, अपने पालन हार । जीवन की शिक्षा सहित, देते हैं संस्कार ।। चरणों में इनके सदा, नतमस्तक हो शीष, मातु-पिता की सीख बिन, जीवन हो दुस्वार ।। गुरु दिखलाते हैं दिशा, गुरु ही देते ज्ञान । गुरुवर के आशीष से, मिलता जग में मान।। जगती अंतःचेतना, मिटे सभी भ्रमजाल, पग रज मस्तक पे लगा, गुरु का कर सम्मान ।। ध्यान लगा कर सीख लें, गुरु से सम्यक ज्ञान । उनके ही आशीष से, मिलता है सम्मान । ज्योति जगाते चित्त में, करें तिमिर का नाश, चरण कमल वंदन करें, गुरु हैं ईश समान ।। सद्रुरु के आशीष से, मिलती सम्यक दृष्टि । खुलते चक्षु विवेक के,  प्रभुमय लगती ...

मोबाइल फोन: सुविधा या लत? | मोबाइल के फायदे और नुकसान | हिंदी लेख

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 परिचय आधुनिक युग में विज्ञान का एक अद्भुत और महत्त्वपूर्ण उपहार मोबाइल फोन है। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को विश्राम करने तक यह हमारे जीवन का लगभग अभिन्न साथी बन चुका है। जहाँ एक ओर इसने हमारे अनेक कार्यों को सरल बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसका अत्यधिक उपयोग कई नई समस्याओं का कारण भी बन रहा है। प्रस्तुत लेख में मोबाइल फोन की उपयोगिता के साथ-साथ इसकी लत से होने वाले दुष्प्रभावों पर चर्चा की गई है।                                आज मोबाइल फोन ने पूरी दुनिया को मानो हमारी मुट्ठी में समेट दिया है। कुछ दशक पहले जिन कार्यों के लिए घंटों या कई दिनों का समय लगता था, वे आज कुछ ही क्षणों में पूरे हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीकी सुविधा है जिसने मनुष्य के जीवन को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल और सुविधाजनक बना दिया है। किसी से तुरंत संपर्क करना हो, पढ़ाई करनी हो, बैंकिंग का कार्य हो या मनोरंजन—अनेक कार्य अब एक ही मोबाइल फोन से सहजता से पूरे हो जाते हैं। यही कारण है कि आज यह बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर आयु वर...

जल संरक्षण पर कविता | पानी का करो संचय | मनहरण घनाक्षरी

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परिचय जल ही जीवन का आधार है, फिर भी बढ़ती जनसंख्या, जल का अपव्यय, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट लगातार गहराता जा रहा है। ऐसे समय में जल संरक्षण केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हम सभी की जिम्मेदारी है। प्रस्तुत मनहरण घनाक्षरी "पानी का करो संचय" जल बचाने, वर्षा जल संचयन, नदियों की स्वच्छता, वृक्षारोपण और प्रकृति के संतुलन का प्रेरक संदेश देती है। आइए, इस कविता के माध्यम से जल की प्रत्येक बूंद का महत्व समझें और उसे सहेजने का संकल्प लें ।        पानी बचाने का संदेश देती कविता |मनहरण घनाक्षरी पानी का करो संचय मत करो अपव्यय जल से ही जीवन है जल को बचाइये । खेती - बाड़ी घर बार जल ही जीवन सार प्रभु का है वरदान सबको बताइये। बहता है अविरल नदियों में कल-कल नदियों को स्वच्छ कर मधुता बढ़ाइये जल है सभी की जान प्रकृति हितैषी मान  बूँद बूँद संचय की मुहिम चलाइये जल तो है अनमोल नल नहीं व्यर्थ खोल इसका महत्व जान व्यर्थ ना बहाइये सुनो जल की जुबानी  चुक रहा सब पानी कर लो जतन शीघ्र समय ना गंवाइये अतिवृष्टि अनावृष्टि बिगड़ी समस्त सृष्टि वन से है संतुलन वृक्ष भी लगाइये ग्रीष्...

तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित

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अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित  तीन कुण्डलिया कुण्डलिया हिन्दी साहित्य का एक लोकप्रिय छंद है जो अपनी लय, भाव और संदेश के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। प्रस्तुत हैं तीन कुण्डलिया— 'भारत महान', 'हार' और 'विचलित'। इन रचनाओं में देशप्रेम, संघर्ष में सकारात्मक सोच तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया गया है।  भारत महान सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान । शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान ।  है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली । सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली । कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे । भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।। हार हार करें स्वीकार जो, होते नहीं निराश । सतत परिश्रम कर सदा,मन में रखते आस ।। मन में रखते आस, नहीं बाधा से डरते । गिरकर उठते रोज, कभी ना मन से थकते ।। कहे सुधा निज बात, है यही जीत का सार । करते रहें प्रयास, सौपान बनेगी हार ।। बिचलित विचलित गर मन हो रहा, कर लें प्राणायाम । साधें श्वास - प्रश्वास निज, मिले सुखद आराम ।। मिले सुखद आराम, धैर्य मन में है आता । मिटे बिचार विकार, भाव निर्मल हो जाता ।। कहे सुधा सुन मीत,श्वास साधें जो नियमित...

भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक

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 परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक—                                  व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव,     दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर ।             क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान,  राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

परित्यक्ता नहीं..परित्यक्त | पति की बेवफाई और सास ससुर का साथ - पारिवारिक कहानी

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📖 कहानी का परिचय (Introduction) रिश्तों का विश्वासघात और स्वाभिमान की एक अनोखी दास्तान क्या एक पत्नी को सिर्फ इसलिए पति के अत्याचार और बेवफाई सहते रहना चाहिए क्योंकि मायके से विदा होने के बाद उसका कोई और ठिकाना नहीं होता? यह दिल को छू लेने वाली भावुक हिंदी कहानी (Emotional Hindi Story) है दिल्ली में रहने वाली 'सना' की। सना ने प्रतीक से प्रेम विवाह किया था, लेकिन शादी के कुछ ही समय बाद प्रतीक के व्यवहार में बेवफाई और अजनबीपन झलकने लगता है।लेकिन यह कहानी सिर्फ एक लाचार पत्नी के रोने की नहीं है, बल्कि समाज के सामने एक नई मिसाल पेश करने की है। जब प्रतीक अपनी पत्नी को धोखा देता है, तब समाज के नियमों के विपरीत जाकर सना के सास-ससुर अपनी बहू का साथ देते हैं। वे उसे 'परित्यक्ता' नहीं बनने देते, बल्कि अपनी बेटी बनाकर एक नया जीवन और स्वाभिमान देते हैं। यह पारिवारिक कहानी समाज को रिश्तों के बदलते स्वरूप का एक बहुत बड़ा संदेश देती है। दिल्ली की हल्की ठंडी सुबह थी। खिड़की से छनकर आती धूप ड्रॉइंग रूम के फर्श पर सुनहरी चादर बिछा रही थी, लेकिन सना के मन में जैसे धूप का एक कतरा भी नहीं ...

मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

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  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

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