बुधवार, 9 जून 2021

पिज्जा का भोग

 

Pizza

"अभी कोई नहीं खायेगा, पहले मुझे भगवान जी को़ भोग लगाने दो" विक्की डाइनिंग टेबल में रखे पिज्जा से एक पीस उठाते हुए बोला, तो माँ  उसे समझाते हुए बोली ;...

"बेटा! ये प्रसाद नहीं जो भोग लगाएं, और किस खुशी में भोग लगाना है तुम्हें....?     बता दिया होता हम थोड़े पेड़े ले आते। पर तुमने तो पिज्जा मंगवाया था न"।

"हाँ मम्मी ! पिज्जा ही चाहिए था भगवान जी के लिए। उन्होंने मेरी इतनी बड़ी विश पूरी की, तो पिज्जा तो बनता है न, उनके लिए"....।

"अरे ! पिज्जा का भोग कौन लगाता है भला " ?...

"वही तो मम्मी ! कोई नहीं लगाता पिज्जा का भोग.....   बेचारे भगवान जी भी तो हमेशा से पेड़े और मिठाई खा- खा के बोर हो गये होंगे ,   हैं न.......।

और जब मुझे सेलिब्रेशन के लिए पिज्जा चाहिए तो भगवान जी को वही पुराने पेड़े क्यों "?...

"पर बेटा पिज्जा का भोग नहीं लगाते !

वैसे तुम्हारी कौन सी विश पूरी हुई"? माँ ने कोतुहलवश पूछा ;....

"मम्मी ! वो हमारी इंग्लिश टीचर हैं न ...वो चेंज हो गयी हैं, अब वे हमें इंग्लिश नहीं पढायेंगी, इंग्लिश तो क्या वे हमें अब कुछ भी नहीं पढ़ायेंगी....हमारी क्लास में आयेंगी ही नहीं....ये....ए....( खुशी से शोर मचाते हुए उछलता है)।

तो ये विश थी तुम्हारी....? पर क्यों ?  उसकी बाँह पकड़कर रोकते हुये मम्मी ने पूछा,

रहने दीजिए मम्मी!आप नहीं समझेंगे।

बाँह छुड़ाते हुए विक्की बोला और पिज्जा लेकर घर में बने मंदिर में घुस गया।

        चित्र साभार,pixabay  से..


शुक्रवार, 4 जून 2021

सीख दुनियादारी की


baby pic


छि! क्या दुनिया है ?...कैसी दुनिया है?...बड़ी अजीब दुनिया है....ऐसी ही है ये दुनियादारी...!!!

लोगों से बार-बार ऐसे शब्द सुन तंग आ गयी दुनिया की रूह!

फिर लिया फैसला और चली  हर एक नवजात शिशु को दुनिया में आते ही दुनिया का हाल बताने.......   ताकि उसे न लगे अजीब ये दुनिया....  न हो दुनिया से शिकायत...और न सुनाये वह भी दुनिया को दुनियादारी के ताने...... ।

वह मिली हर उस नवजातक से....

जो दुनिया और दुनियादारी से बेखबर आँखे मूँदे मन्द-मन्द मुस्करा रहा....बन्द मुट्ठी में लायी अपनी तकदीर को होले होले से घुमा रहा..... नहीं जानता वो दुनिया के दुख-सुख, रिश्ते -नाते.....  और नहीं पता उसे अच्छाई क्या और बुराई क्या....अभी तो मानो विधाता से ही चलती है उसकी गुप्तगू .......  विधाता के सिवा उसके लिए कहीं भी कुछ है ही क्या....

उसके पास जाकर धीरे से बोली ;.....                               "हे नन्हें नाजुक प्यारे से नवजातक ! मुझे सुनो! बड़े ध्यान से सुनो !                                                       

जिस दुनिया में आज तुम्हारा अवतरण हुआ है न,      

 मैं रूह हूँ उसी दुनिया की । और अपनी यानी दुनिया की कड़वी परन्तु सच्ची सच्चाई तुम्हें बताने आई हूँ, ताकि तुम भी औरों की तरह ये न कहो कि "छि ! ये क्या दुनियादारी है....कैसी दुनिया है ये" ....

हाँ !तुम अभी जान लो इस दुनियादारी को....

इसकी कठोरता से कुछ कठोरता लेकर अपने नन्हें कोमल मन के बाहर एक आवरण बनाना शुरू करो आज से नहीं अभी से ही....

हाँ ! एक मजबूत कठोर आवरण !...  

जिसके भीतर सम्भाल सको तुम इस कोमल मन की संवेदनाओं को ....छिपाकर रखना उन्हें दुनियादारी की नजर से,

क्योंकि यहाँ कोमल नाजुक पंखुड़ियों को रौंदना बहुतों का शौक है।

हे नाजुक नवजातक ! अभी तुम्हें अपने जन्मदाता का स्नेह और सानिध्य भरपूर मिलेगा.....।    

तुम उनके कन्धों से जब उतरो तो झट से सीख लेना खड़ा होना अपने पैरों पर पूरी मजबूती से।

और जैसे ही ये कन्धे झुकने लगें, उठा लेना तुम भी इन्हें अपने कन्धों पर । कर लेना हिसाब बराबर......

 क्योंकि ऋणी रहे इनके और न सम्भाल पाये स्वयं को तो स्नेह की जगह एहसान देख आहत होगा तुम्हारा ये नाजुक मन कितने ही कठोर आवरण के भीतर भी।

हे नवजातक ! अगर तुम कन्या हो तो और भी सम्भलकर रहना होगा ।

जन्मदाता के संरक्षण में रहकर जल्द ही तन मन से मजबूत बनना होगा तुम्हें।  

नहीं तो बड़ी होकर कोई वस्तु या जागीर सी बनकर रह जाओगी पिता और पति के अधिकार क्षेत्र की ।  

तुम पति में पिता सा स्नेह न पाकर जब  साधिकार वापस पितृगृह लौटोगी तो आहत होगा तुम्हारा नाजुक मन ये जानकर कि अब तुम पिता की लाडली नहीं उन पर बोझ हो।

इसीलिए आज के स्नेह और सानिध्य से अपने मन को इतना मजबूत बनाना कि कल औरों को अपना स्नेह और सानिध्य दे सको ।

 स्नेह की आकांक्षी न रहकर सच्ची सहचरी बन जीवनसफर में कन्धे से कन्धा मिला गृहस्थी की गाड़ी को पूरी सक्षमता से खींच सको।

हे नवजातक ! दुनिया अच्छी है या बुरी है जैसी भी है तुम्हारी है तुम सब ही निर्मित हो इसके।

ये बहुत अच्छी थी जब तुम अच्छे थे और अब भी अच्छी होगी जब तुम अच्छाई की नींव पुनः रखोगे .....।

अपनी, अपनों की,  हमारी और हम सबकी खुशियों के खातिर दुनिया को पहले सा अच्छा बनाने की दिशा में प्रयास करना मेरे नन्हे नवजातक !

क्योंकि तुम सही दिशा अपनाओगे तो दुनिया की दशा स्वतः बदल जायेगी।

    

           चित्र साभार pixabay.com से

रविवार, 30 मई 2021

उदास पाम

 

Palm tree


जब से मेरा ये पाम इस कदर उदास है

लगता नही है मन कहीं उसी के पास है


वह तो मुझे बता रहा

मुझे  समझ न आ रहा

कल तक था सहलाता मुझे

अब नहीं लहरा रहा

क्या करूँ अबुलन है ये पर मेरा खास है

लगता नहीं है मन कहीं इसी के पास है

जब से मेरा ये पाम इस कदर उदास है


पहली नजर में भा गया

फिर घर मेरे ये आ गया

रौनक बढ़ा घर की मेरी 

सबका ही मन चुरा गया

माना ये भी सबने कि इससे शुद्ध श्वास है

लगता नहीं है मन कहीं इसी के पास है

जब से मेरा ये पाम इस कदर उदास है



खाद पानी भी दिया

नीम स्प्रे भी किया

झुलसी सी पत्तियों ने सब

अनमना होके लिया

दुखी सा है वो पॉट जिसमें इसका वास है

लगता नहीं है मन कहीं इसी के पास है

जब से मेरा ये पाम इस कदर उदास है।


यदि जानते हैं आप तो

कृपया सलाह दें

मरते से मेरे पाम के 

इस दुख की थाह लें

बस आपकी सलाह ही इकमात्र आस है

लगता नहीं है मन कहीं इसी के पास है

जब से मेरा ये पाम इस कदर उदास है।।


रविवार, 23 मई 2021

अब दया करो प्रभु सृष्टि पर

To plead


भगवान तेरी इस धरती में 

इंसान तो अब घबराता है

इक कोविड राक्षस आकर

मानव को निगला जाता है


तेरे रूप सदृश चिकित्सक भी

अब हाथ मले पछताते हैं

वरदान से इस विज्ञान को छान

संजीवनी पा नहीं पाते हैं


अचल हुआ इंसान कैद

जीवनगति रुकती जाती है

तेरी कृपादृष्टि से वंचित प्रभु

ये सृष्टि बहुत पछताती है


जब त्राहि-त्राहि  साँसे करती

दमघोटू तब अट्हास करे !

अस्पृश्य तड़पती रूहें जब

अरि एकछत्र परिहास करे !


तन तो निगला मन भी बदला

मानवता छोड़ रहा मानव

साँसों की कालाबाजारी में

कफन बेच बनता दानव


अब दया करो प्रभु सृष्टि पर 

भूलों को अबकी क्षमा कर दो!

कोविड व काले फंगस को

दुनिया से दूर फ़ना कर दो



चित्र साभार;photopin.com से।


शनिवार, 15 मई 2021

अभी भी हाथ छोटे हैं



Coronavirus


 सिसकती है धरा देखो

गगन आँसू बहाता है

ग्रीष्म पिघली बरफ जैसी

मई भी थरथराता है


रुकी सी जिन्दगानी है

अधूरी हर कहानी है

शवों से पट रही धरती

प्रलय जैसी निशानी है


ये क्या से क्या हुआ जीवन

थमी साँसें बिलखती हैं

दवा तो क्या, दुआ भी ना

रूहें तन्हा तड़पती हैं


नजर किसकी जमाने को

आज इतना सताती है

अद्यतन मास्क में छुपता

तरक्की भी लजाती है


सदी बढ़ते जमाने से

सदी भर पीछे लौटे हैं

समझ विज्ञान को आया

अभी भी हाथ छोटे हैं


       चित्र साभार, photopin.com  से




शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

वहम

 

superstition of covid


"प्रिया !तुम्हारी मम्मी दिखाई नहीं दे रही कल से...क्या बात है तबियत तो ठीक है न उनकी"? 

सामने वाली बालकनी से सीमा ने पूछा तो प्रिया  रूआँसी आवाज में बोली,  "नहीं आन्टी !  मम्मी ठीक नहीं हैं उन्हें कोरोना हो गया है.............कल जो कोरोना टेस्ट करने वाले आये थे न सोसाइटी में, उनके टेस्ट में मम्मी की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव है,तब से मम्मी ने अपने को कमरे में बन्द कर दिया है, और उनकी तबीयत भी ठीक नहीं है....सिर दर्द से परेशान है मम्मी.... हम कुछ भी नहीं कर पा रहे"।

"अरे बेटा! पॉजिटिव रिपोर्ट तो मेरी भी आयी कल,  मुझे भी बहुत टेंशन हुई और साथ में शक भी ........ ।   तो मैंने जाकर प्राइवेट अस्पताल में दुबारा टेस्ट करवाया वहाँ मेरी रिपोर्ट नेगेटिव आयी......। 

और तुम्हारी मम्मी तो घर पर ही रहती हैं और उन्हें कल तक तो कोरोना के कोई भी लक्षण नहीं थे ,फिर पॉजिटिव रिपोर्ट मिलते ही तबियत कैसे खराब हो गयी...?

बेटा ! अपनी मम्मी का एक बार और टेस्ट करवाइए, कहीं उनकी तबियत बिगड़ने का कारण उनका वहम तो नहीं"।

"जी आन्टी ! आप सही कह रही हैं, मैं पापा को बताती हूँ"...।    कहकर प्रिया झट से अन्दर चली गयी।

अगली सुबह कमला बालकनी में पौधों को पानी देती दिखी तो सीमा ने पूछा, कैसी हो कमला बहन ?

"बिल्कुल ठीक हूँ दीदी! कोई कोरोना - वोरोना नहीं है मुझे, डॉक्टर ने बताया कि टेन्शन के कारण वीपी और सिर दर्द है........।  इनकी झूठी रिपोर्ट ने तो........!!   अब क्या ही कहें.........?     वो तो कल आपने बताया न प्रिया को.....तब दोबारा टेस्ट करवाया, धन्यवाद आपका !    पर देखो न... ये वहम भी अपनेआप में एक बड़ी बीमारी है" ,   है न  दीदी !....।


                चित्र साभार, photopin.com से


शनिवार, 24 अप्रैल 2021

खून के हैं जो रिश्ते , मिटेंगे नहीं

 

Flower


तुम कहते रहोगे वो सुनेंगे नहीं

अब तुम्हारे ही तुमसे मनेंगे नहीं


इक कदम जो उठाया सबक देने को

चाहकर भी कदम अब रुकेंगे नहीं


जा चुका जो समय हाथ से अब तेरे

जिन्दगी भर वो पल अब मिलेंगे नहीं


जोड़ते -जोड़ते वक्त लगता बहुत

टूटे  रिश्ते सहज तो जुड़ेंगे नहीं


तेरे 'मैं' के इस फैलाव की छाँव में

तेरे नन्हे भी खुलके बढेंगे नहीं


छोटी राई का पर्वत बना देख ले

खाइयां पाटकर भी पटेंगे नहीं


चढ़ ले चढ़ ले कहा तो चढ़े पेड़ पर

अब उतरने को कोई कहेंगे नहीं


निज का अभिमान इतना बड़ा क्या करें 

घर की देहरी पे जो झुक सकेंगे नहीं


जो दलीलें हों झूठी, और इल्ज़ाम भी

सच के साहस के आगे टिकेंगे नहीं


दिल के रिश्तों को जोड़ा फिर तोड़ा, मगर

 खून के हैं जो रिश्ते , मिटेंगे नहीं


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