शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

गलतफ़हमी

 

Nayisoch - short story

मम्मी ! क्यों इतना गलत बोल रही हो आप भाभी के बारे में ?  आंटी ने सही ही तो कहा कि दिखने में तो बड़ी मासूम और सीधी सादी है वो ।

हाँ आंटी ! बहुत मासूम, सीधी-सादी और सुंदर दिखती हैं मेरी भाभी और जैसी दिखती हैं न, हैं भी बिल्कुल वैसी ही । निधि ने अपनी माँ और उनकी सहेली की बातचीत के बीच हस्तक्षेप किया तो माँ गुस्से से तिलमिलाकर अपनी सहेली से बोली , "देखा ! देखा तूने ! इसने मेरा बेटा ही नहीं अब मेरी बेटी भी अपनी तरफ कर ली है। ऐसी है ये, दिखने में सीधी- सादी पर मन से कपटी और झूठी" ।

फिर आँखें तरेरकर निधि से बोली, जब पूरी बात पता न हो, तो चुप रह लिया कर ! अब जाती है या लगाऊँ एक दो...

"नहीं मम्मी ! नहीं जाउँगी मैं, चाहे आप मार भी लो। और कौन सी बात नहीं पता मुझे ? बता भी दो ? देख रही हूँ मैं भी आपको ।  कैसी उखड़ी-उखड़ी हो आप भाभी के साथ !  बेचारी भाभी कित्ती कोशिश कर रही हैं आपको खुश करने की,  पर आप हो कि... हद हो गयी अब तो" !   निधि भी नाराजगी से बोली तो माँ ने आलमारी से एक सूट पीस निकाल कर झटके से उसकी तरफ फेंककर कहा, "ले ! जान ले तू भी अपनी प्यारी भाभी की करतूत" ! 

सूट को इधर उधर टटोलते हुए निधि बोली,  "करतूत ! कैसी करतूत मम्मी ? ये तो वही सूट है न, जो भाभी लायी आपके लिए ! कित्ता सुन्दर तो है ! है ना आंटी" ? (सूट दिखाते हुए )

"अरे ! अकल की दुश्मन ! सूट नहीं सूट के दाम देख पूरे इक्कीस सौ ! कहती है उसी दुकान से लाये जहाँ आपने भेजा था ।  अब बता ? वहाँ से तो तेरे पापाजी हमेशा लाते थे। कभी इत्ता मँहगा लाये वे ? मैंने कहा मैं वापस करके आउँगी इसे ! तो नीरज मना कर रहा । करेगा ही बीबी ने पट्टी पढ़ा दी होगी"। 

 "क्या पट्टी पढ़ाई होगी मम्मी ? ठीक ही तो कह रहा है भाई ! अच्छा थोड़े ना लगता है ऐसे वापस करना , जब सूट पसंद है । तो रख क्यों नहीं लेती आप" ?

"अरे ! इत्ता मँहगा ? इसी कपड़े में ऐसा ही सूट तेरे पापाजी तो साढ़े चार सौ या पाँच सौ तक ही लाते थे , अब या तो उस दुकानदार ने इन्हें ठग लिया या फिर ये मुझे बेवकूफ बना रही है। (सहेली की तरफ देखकर) हैं न " ।

"अरे मम्मी रुको ! ऐसा मत सोचो (कहकर निधि हाथ जोड़कर बोली "सॉरी पापाजी ! आज आपसे किया प्रॉमिस तोड़ रही हूँ,बहुत बहुत सॉरी ! पर आज ये प्रॉमिस नहीं तोड़ा न, तो यहाँ सास-बहू के रिश्ते में मनमुटाव बढ़ता ही जायेगा , मुझे माफ करना पापाजी" ! )  फिर बोली  "मम्मी ! ना तो दुकानदार ने उन्हें ठगा है और ना ही भाभी  झूठ बोल रही,  झूठ तो आपसे पापाजी कहा करते थे" ।

"चुप !  एकदम चुप  ! , नहीं तो लगाउँगी कसके ! दिमाग ठीक है तेरा ! अरे तेरे पापाजी क्यों झूठ बोलते मुझसे, वह भी मेरे ही सूट के लिए" ! गुस्से से तमतमाकर माँ बोली तो निधि ने कहा ,  "हाँ मम्मी ! यही सच है पापाजी हमेशा आपके सूट मँहगे लाकर आपको सस्ते दाम बताते थे । और हमसे भी प्रॉमिस लिया था कि आपको कभी ना बतायें आपके सूट के सही दाम"।

"पर क्यों  ? ऐसा क्यों करते थे तेरे पापाजी "? अब माँ कुछ शान्त एवं विस्मित सी थी,  तब निधि बोली, "मम्मी ! पापाजी कहते थे कि तुम्हारी मम्मी मँहगे सूट जल्दी से पहनती नहीं, बस आलमारी में सजाकर रखती है और पुराने घिसे-पिटे सूट ही पहनती रहती है  । इसलिए सस्ता बताते थे आपको, ताकि आप उन्हें जल्दी से पहन लो। और भाभी को इस बात की जानकारी नहीं थी , नहीं तो वो भी"...

"हाँ ! वो भी झूठ बोल देती मुझसे ! पर मैं तब भी उसे दोषी ही मानती , पैसों का हिसाब भी तो गोल-मोल ही करना पड़ता न उसे"। रुँधे गले से माँ बोली  तो सहेली भी अपनी नम आँखें पौंछकर माँ का कंधा सहलाती हुई बोली "ग़लतफ़हमी की वजह से बिना बात का मनमुटाव था, जा जाकर लाड दे दे उसे । बेचारी परेशान होगी"।

माँ ने उठकर डबडबाई आँखों से सामने टँगी पति की तस्वीर पर हाथ फेरा फिर दुपट्टे से आँसू पौंछकर बहू को आवाज देते हुए चली गयी उसके पास, अनबन भुलाकर सारे गिले शिकवे मिटाने ।



रविवार, 13 नवंबर 2022

गई शरद आया हेमंत


Winter morning

गई शरद आया हेमंत ,

हुआ गुलाबी दिग दिगंत ।

अलसाई सी लोहित भोर,

नीरवता पसरी चहुँ ओर ।


व्योम उतरता कोहरा बन,

धरा संग जैसे आलिंगन ।

तुहिन कण मोती से बिखरे,

पल्लव पुष्प धुले निखरे ।


उजली छिटकी गुनगुनी धूप,

प्रकृति रचती नित नवल रूप ।

हरियाये सुन्दर सब्ज बाग,

पालक बथुआ सरसों के साग ।


कार्तिक,अगहन व पूस मास,

पंछी असंख्य उतरे प्रवास ।

 हुलसित सुरभित यह ऋतु हेमंत

आगत शिशिर, स्वागत वसंत ।।


मंगलवार, 18 अक्तूबर 2022

शरद भोर

 मनहरण घनाक्षरी 

Sun rise

मोहक निरभ्र नभ

भास्कर विनम्र अब

अति मनभावनी ये

शरद की भोर है


पूरब मे रवि रथ

शशि भी गगन पथ 

स्वर्णिम से अंबरांत

छटा हर छोर हैं


सेम फली झूम रही

पवन हिलोर बही

मालती सुगंध भीनी

फैली चहुँ ओर है


महकी कुसुम कली

विहग विराव भली

टपकन तुहिन बिंदु

खुशी की ज्यों लोर है


लोर - अश्रु 





सोमवार, 10 अक्तूबर 2022

अक्टूबर के अनाहूत अभ्र

 

Cloudy sky

हे अक्टूबर के अनाहूत अभ्र !

 ये अल्हड़ आवारगी क्यों ?

प्रौढ़ पावस की छोड़ वयस्कता 

चिंघाड़ों सी गरजन क्यों ?


गरिमा भूल रहे क्यों अपनी,

डाले आसमान में डेरा ।

राह शरद की रोके बैठे,

जैसे सिंहासन बस तेरा ।


शरद प्रतीक्षारत देहलीज पे

धरणी लज्जित हो बोली,

झटपट बरसों बचा-खुचा सब

अब खाली कर दो झोली !


शरदचन्द्र पे लगे खोट से

चन्द्रप्रभा का कर विलोप

अति करते क्यों ऐसे जलधर !

झेल सकोगे शरद प्रकोप ?


जाओ अब आसमां छोड़ो !

निरभ्र शरद आने दो!

शरदचंद्र की धवल ज्योत्सना

 धरती को अब पाने दो !



गुरुवार, 29 सितंबर 2022

विश्वविदित हो भाषा

Nayi soch blog pic

 मनहरण घनाक्षरी

(घनाक्षरी छन्द पर मेरा एक प्रयास)


 हिंदी अपनी शान है

भारत का सम्मान है

प्रगति की बाट अब

इसको दिखाइये


मान दें हिन्दी को खास

करें हिंदी का विकास

सभी कार्य में इसे ही

अग्रणी बनाइये


संस्कृत की बेटी हिंदी

सोहती ज्यों भाल बिंदी

मातृभाषा से ही निज

साहित्य सजाइये


हिंदी के विविध रंग

रस अलंकार छन्द

इसकी विशेषताएं

सबको बताइये


समानार्थी मुहावरे

शब्द-शब्द मनहरे

तत्सम,तत्भव सभी

उर में बसाइये


संस्कृति की परिभाषा

उन्नति की यही आशा

राष्ट्रभाषा बने हिन्दी

मुहिम चलाइये


डिजिटल युग आज

अंतर्जाल पे हैं काज

हिंदी का भी सुगम सा

पोर्टल बनाइए


विश्वविदित हो भाषा

सबकी ये अभिलाषा

जयकारे हिन्दी के

जग में फैलाइए ।



गलतफ़हमी

  मम्मी ! क्यों इतना गलत बोल रही हो आप भाभी के बारे में ?  आंटी ने सही ही तो कहा कि दिखने में तो बड़ी मासूम और सीधी सादी है वो । हाँ आंटी ! ब...