विचारों का बवंडर और सृजन-संघर्ष : छंदमुक्त कविता
परिचय मन में विचारों का निरंतर उमड़ना ही सृजन नहीं है। कभी विचारों की अधिकता ही शब्दों को आकार नहीं लेने देती और मन एक अजीब-सी उथल-पुथल में घिर जाता है। सकारात्मक मन-मंथन जहाँ नव-सृजन की राह खोलता है, वहीं अनियंत्रित विचार सृजन की प्रक्रिया में बाधा बन सकते हैं। प्रस्तुत छंदमुक्त कविता इसी मनःस्थिति को अभिव्यक्त करती है। विचारों का बवंडर विचारों का बवंडर भी थमने नहीं देता है किसी भी विचार को। अंधाधुंध विचारों के बवंडर में उमड़ते-घुमड़ते रह जाते हैं शब्द। तब मन मौन साध लेता है और पसर जाती है अजीब-सी खामोशी। मन के आँगन में। मन के मौन और शब्दों की खामोशी से भी भला कहाँ रुकता है विचारों का बवंडर? जब एक के बाद एक अनेकानेक विचार विचरने लगते हैं मानस-पटल पर। तब आतुर लेखनी आस बाँधे ताकती रहती है मंथनरत मन को। ज्यों तृषित धरणी ताकती है अंबर में उमड़ते-घुमड़ते कजरारे घन को। घन-घुमड़न यदि सकारात्मक हो तो बढ़ जाती है धरा की उर्वरता! ऐसे ही मन-मंथन भी सकारात्मक हो तो बढ़ती है नव-सृजन की क्षमता। वरना ऐसे बवंडर भयंकर तूफान बनकर अस्त-व्यस्त कर देते हैं घर-आँगन और मन-आँग...