तकनीक के बढ़ते कदम और सिमटती मानवीय संवेदनाएँ
डिजिटल जुड़ाव के बीच बदलता जीवन आज की तकनीक-संचालित दुनिया में यदि कोई चीज़ सबसे तेज़ी से हमारे जीवन का हिस्सा बनी है, तो वह है डिजिटल जुड़ाव । सुबह की पहली किरण के साथ आँख खुलते ही हाथ स्मार्टफोन की ओर बढ़ता है और रात को सोने से पहले की आखिरी झलक भी अक्सर स्क्रीन पर ही ठहरती है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप ने दूरियों को कम किया है। अब किसी से बात करने के लिए दूरी कोई बाधा नहीं रही। आज हमारे पास संपर्कों की कमी नहीं है। मित्रों और फॉलोअर्स की संख्या बढ़ती जा रही है, संदेशों का आदान-प्रदान पहले से कहीं अधिक है, फिर भी मनुष्य के भीतर अकेलेपन का एहसास क्यों बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है? सुविधाएँ तो बहुत बढ़ी हैं, लेकिन इस आभासी जुड़ाव के बीच हमारी वास्तविक आत्मीयता और संवेदना कहीं पीछे तो नहीं छूट रही? संवेदना के बदलते अर्थ संवेदना, करुणा, सहानुभूति और आपसी समझ ही वे गुण हैं, जो मनुष्य को केवल बुद्धिमान प्राणी नहीं, बल्कि मनुष्य बनाते हैं। तकनीक हमारे काम को सरल कर सकती है, समय बचा सकती है और...