जरा अलग सा अबकी मैंने राखी पर्व मनाया |रक्षाबंधन पर आत्मचिंतन की कविता
परिचय रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का पावन पर्व है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधती है और भाई उसकी रक्षा का संकल्प लेता है। लेकिन क्या अपनी रक्षा केवल बाहरी परिस्थितियों से ही करनी होती है? कभी-कभी मन के भीतर छिपे राग-द्वेष, ईर्ष्या, भय, चिंता और नकारात्मक विचार भी हमारे लिए चुनौती बन जाते हैं। ‘जरा अलग-सा अबकी मैंने राखी पर्व मनाया’ एक अलग भावभूमि की कविता है, जिसमें स्वयं को रक्षा सूत्र बाँधने के माध्यम से अपने ही अंतर्मन को पहचानने और नकारात्मक भावों से अपनी रक्षा करने का संकल्प व्यक्त किया गया है। 🌺 रक्षाबंधन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं 🌺 जरा अलग सा अबकी मैने राखी पर्व मनाया । रोली अक्षत लेकर अपने माथे तिलक लगाया ।। एक हाथ से राखी लेकर दूजे पर जब बाँधी ! लगी पूछने खुद ही खुद से क्यों सीमाएं लाँघी ? भाई बहन का पर्व है राखी, क्यों अब इसे भुलाया ? रक्षा सूत्र को ऐसे खुद से खुद को क्यों पहनाया ? दो मत दो रूपों में मैं थी अपने पर ही भारी ! मतभेदों की झड़ी लगी मुझ पे ही बारी-बारी। तिरछी...