गुरुवार, 14 अक्तूबर 2021

कबूतर की दादागिरी


Pigeon'sdadagiri
                    चित्र साभार pixabay से


एक कबूतर जमा रहा है,

 बिखरे दानों पर अधिकार ।

शेष कबूतर दूर हो रहे,

उसकी दादागिरी से हार ।


गोल घूमता गुटर-गुटर कर ,

गुस्से से फूला जाता ।

एक-एक के पीछे पड़कर,

उड़ा सभी को दम पाता ।


श्वेत कबूतर तो कुष्ठी से,

हैं अछूत इसके आगे ।

देख दूर से इसके तेवर,

बेचारे डरकर भागे ।


बैठ मुंडेरी तिरछी नजर से,

सबकी बैंड बजाता वो ।

सुबह से पड़ा दाना छत पर,

पूरे दिन फिर खाता वो ।


समझ ना आता डर क्यों उसका,

इतना माने पूरा दल ?

मिलकर सब ही उसे भगाने,

क्यों न लगाते अपना बल ?


किस्सों में पढ़ते हैं हम जो,

क्या ये सच में है सरदार ?

या कोई बागी नेता ये,

बना रहा अपनी सरकार ?


नील गगन के पंछी भी क्या,

झेलते होंगे सियासी मार ?

इन उन्मुक्त उड़ानों का क्या,

भरते होंगे ये कर भार ?


शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

व्रती रह पूजन करते





Godprayer
चित्र : साभार pixabay से......



{1}

 बदली में छुपते फिरे, सावन मास मयंक।

दर्शन को मचले धरा, गगन समेटे अंक ।

गगन समेटे अंक , बहुत  ही लाड-लड़ाये।

भादो बरसे मेघ, कौन अब तुम्हें छुपाये।

कहे धरा मुस्काय, शरद में मत छुप जाना।

व्रती निहारे चाँद, प्रेमरस तुम बरसाना ।।


                         {2}

नवराते में गूँजते, माँ के भजन संगीत ।

जयकारे करते सभी,  माँ से जिनको प्रीत।

माँ से जिनको प्रीत, व्रती रह पूजन करते।

पा माँ का आशीष, कष्ट जीवन के हरते।

कहे सुधा करजोरि, करो माँ के जगराते।

हो जीवन भयमुक्त, सफल जिनके नवराते।


व्रती -- उपवासी

कबूतर की दादागिरी

                    चित्र साभार pixabay से एक कबूतर जमा रहा है,  बिखरे दानों पर अधिकार । शेष कबूतर दूर हो रहे, उसकी दादागिरी से हार । गोल घू...