शुक्रवार, 26 नवंबर 2021

वृद्धावस्था


Oldman hand with stick
वृद्धावस्था
                  चित्र, साभार pixabay से...


सोच में है थकन थोड़ी,

अक्ल भी कुछ मन्द सी।

अनुभव पुराने जीर्ण से,

 बुद्धि भी कुछ बन्द सी।


है कमर झुकी - झुकी ,

बुझे - बुझे से हैं नयन।

हस्त कम्पित कर रहे,

आज लाठी का चयन।


है जुबां खामोश अब,

मन कहीं छूटा सा है।

रुग्ण और क्षीण तन,

विश्वास भी टूटा सा है।


पूछने वाले भी अब,

सीख देने आ रहे।

जिंदगी ये गोप्य तेरे,

मन बहुत दुखा रहे।


जन्म से ले ज्ञान पर,

अंत सब बिसराव है।

शून्य से  हुआ शुरू,

शून्य ही ठहराव है।।


रविवार, 21 नवंबर 2021

छूटे छूटता नहीं और टूटे जो तो जुड़ता भी नहीं पहले सा फिर से..

 




Memories dairy
चित्र, साभार pixabay से

फिर से कहाँ शुरू होता है न,

जो छोड़ दिया जाता है उस समय 

कि बाद में करेंगे 

पहले सा फिर से.......

कितना कुछ छूटा सा है न पीछे 

इंतजार में कि कुछ समय 

बाद सब ठीक होने पर

शुरू करेंगे इसे

पहले सा फिर से....


याद है वो नन्हीं प्यारी गुड़िया

घंटो खेले जिससे,

बतियाये और 

खेल - खेल में 

जिसका ब्याह रचाये

फिर एक दिन माँ ने कहा,

"बोर्ड परीक्षा में अच्छे नम्बर 

लाने पर मिलेगी 

एक और गुड़िया" !

इस लालच में बन्द किया उसे,

अलमारी में बनाये उस नन्हें से 

डॉलहाउस में ये कहके कि 

"जल्द ही लौटेंगे आपसे खेलने 

आपके लिए एक और प्यारी सी

 सहेली लेकर

पहले सा फिर से".......


ऐसे ही तो धरे के धरे रह गये न 

बाकियों के भी कंचे, कार्ड 

और भी ना जाने क्या -क्या

जो न खेल पाये कभी उन्हें

पहले सा फिर से ....

और इनकी जगह माँग बैठे 

लैपटॉप या मोबाइल

और भी अच्छी पढ़ाई के नाम से

बहुत समझदार बनके...

 फिर पढ़ते - लिखते ही 

मिले दोस्तों से,...और

कुछ दिन कैसे चढ़ा न

 खुमार दोस्ती का  !

घूमना, फिरना, हँसना, बोलना...

पर ये क्या!

कब एकाकी दौड़ने लगे

हायर एजुकेशन के लिए कि 

समय ही न मिला वैसी दोस्ती का

पहले सा फिर से.....

फिर तो जॉब, शादी,  घर-गृहस्थी 

और ना जाने क्या-क्या जिम्मेवारियाँ

फँसे  ऐसे कि देख तक 

न पाये पीछे मुड़के

पहले सा फिर से....

इतनी लम्बी दौड़ दौड़ते-भागते

एक के बाद एक 

कुछ छोड़ते तो कुछ पाते 

जाने कितनी दूर शायद बहुत दूर 

निकल आये  कि अब

सम्भव ही नहीं 

देखना पीछे मुड़के

उस छूटे हुए को

पहले सा फिर से......


सोचिए कि लौट पड़ें अगर

पीछे बहुत पीछे..... 

जहाँ से शुरू किया था छोड़ना

दौड़ना फिर नया पाना....

क्या शुरू कर पायेंगे

उस छूटे हुए को 

उतनी ही खुशी से

उन्हीं भावों के साथ

पहले सा फिर से....?

शायद नहीं ! कभी नहीं !

खेल-खिलोने तो क्या कोई 

छूटे टूटे रूठे रिश्ते को ही लो

दूरियाँ कब खाइयाँ बनती हैं

कि पटाये नहीं पटती

जोड़े नहीं जुड़ती 

पहले सी फिर से......

कैसा तारतम्य है न

छूटे छूटता नहीं और टूटे जो 

तो जुड़ता भी नहीं 

पहले सा फिर से.....


कहाँ शुरू होता है न 

कुछ भी छोड़ा हुआ

पहले सा फिर से....


गुरुवार, 11 नवंबर 2021

पटाखे से जला हाथ

 


Crackers in hand
                चित्र साभार pixabay.com से


इतने सालों बाद भी दीपावली बीतने पर उस छात्र की याद मन को उदास कर देती है ...हर बार मन में ख्याल आता है कि अब वो कैसा होगा....उसके सपने उसे कैसे सालते होंगे... कितना पछताता होगा न वो।

हाँ बात 2003 की है ,विनीत आठवीं कक्षा में नया आया था । उसका परिचय पूछते समय जब मैंने उसे पूछा तुम बड़े होकर पढ़-लिखकर क्या बनोगे...?

तो वह बोला "मैम ! मैं बड़ा होकर आर्मी ज्वाइन करना चाहता हूँ  और देश की सेवा करना चाहता हूँ।

बाकी सारे डॉक्टर्स और इंजीनियर्स बनने वाले बच्चों की कक्षा में ये अकेला 'जवान' मुझे ही क्या  अन्य  सभी टीचर्स को भी बहुत अच्छा लगता था... क्योंकि वह पढ़ने में होशियार और बुद्धिमान तो था ही साथ ही बहुत जिम्मेदार भी था।

लेकिन उसी साल दीपावली की छुट्टियों के बाद जब वह स्कूल आया तो हम सभी उसे देखकर स्तब्ध रह गये।उसकी दायीं आँख और हाथ दीवाली के पटाखों की भेंट चढ़ चुके थे ....

एक बड़ा बम जो जमीन में फेंकने से पहले ही उसके हाथ में फट गया जिससे उसके दायें हाथ की उँगलियाँ जलकर पीछे की तरफ चिपक गयी और एक आँख जलकर ऐसी फूल गयी कि बगैर काले चश्मे के उसे देखकर डर लगने लगा।

मध्यमवर्गीय परिवार से था तो इसके माता-पिता इसकी कोई बड़ी सर्जरी भी नहीं करवा पाये थे।

इतना होशियार और बुद्धिमान बच्चा फिर बायें हाथ से लिखने की प्रेक्टिस में पिछड़ने लगा था।

एक दिन जब मैंने उसके दोस्तों को उसे कहते सुना कि "अरे विनीत ! तू बड़ा होकर विकलांग सर्टिफिकेट बना देना आजकल विकलांगों को नौकरी जल्दी मिल जाती है तो सुनकर मुझे कैसा लगा , कितना दुख हुआ ये बताने के लिए आज भी शब्द नहीं हैं मेरे पास।

मुझे आज भी हर दीपावली पर वह बच्चा याद आता है और साथ ही उसका आर्मी ज्वाइन करने का वह सपना  भी।

हर बार दीपावली पर फूटते पटाखों का शोर मुझे अन्दर से  भयभीत करता है कि ना जाने किस बच्चे के सपने किस पटाखे के साथ जल रहे हों।

 सोचती हूँ त्रेतायुग में जब 14 वर्षों का वनवास पूरा कर श्रीराम अयोध्या वापस लौटे  तब अयोध्यावासियों ने खुशी में घी के दिये जलाये थे तभी से दीपावली मनायी जाती है कदाचित तब उन्होने पटाखे तो नहीं फोड़े होंगे।तब कहाँ पटाखे का चलन रहा होगा... है न।

तो फिर ये दीपावली की खुशियों में दीप जलाने के साथ पटाखे छुड़ाने का चलन कब और कहाँ से आया होगा ?




मंगलवार, 9 नवंबर 2021

तमस राज अपना फैला रहा है

 

Dark night
                चित्र साभार pixabay.com से


दिवाली गयी अब दिये बुझ गये सब

वो देखो अंधेरा पुनः छा रहा है...

अभी चाँद रोशन हुआ जो नहीं है

तमस राज अपना फैला रहा है

अमा के तमस से सहमा सा जुगनू

टिम-टिम चमकने में कतरा रहा है

दिवाली गयी अब दिये बुझ गये सब

वो देखो अंधेरा पुनः छा रहा है....।


कितनी अयोध्या जगमग सजी हैं

पर ना कहीं कोई राम आ रहा है

कष्टों के बादल कहर ढ़ा रहे हैं 

पर्वत उठाने ना श्याम आ रहा है

दीवाली गयी अब दिये बुझ गये सब

वो देखो अंधेरा पुनः छा रहा है।

अभी चाँद रोशन हुआ जो नहीं है

तमस राज अपना फैला रहा है.....।


कहीं साँस लेना भी मुश्किल हुआ है

सियासत का कोहरा गहरा रहा है

करेंगे तो अपनी ही मन की सभी

पर ढ़ीला हुकूमत का पहरा रहा है

दीवाली गयी अब दिये बुझ गये सब

वो देखो अंधेरा पुनः छा रहा है

अभी चाँद रोशन हुआ जो नहीं है

तमस राज अपना फैला रहा है.....।


बने मुफ्तभोगी सत्ता के लोभी

हराकर मनुज को दनुज जी रहा है

निष्कर्म जीवन चुना स्वार्थी मन

पकड़ रोशनी के वो पंख सी रहा है

दीवाली गयी अब दिये बुझ गये सब 

वो देखो अंधेरा पुनः छा रहा है

अभी चाँद रोशन हुआ जो नहीं है

तमस राज अपना फैला रहा है......।




रविवार, 7 नवंबर 2021

कैनल में कैद अब झूठा नबाब

प्रदत्त चित्र पर हास्यव्यंग रचना


Pet dog
चित्र साभार Quora से

           

               आँखों में चश्मा मुँह में गुलाब, 

               हाथ मोबाइल करके आदाब

               गले में मोती जड़ा था पट्टा,

               चला जो शेरू बनके नबाब


                कदम कदम पर यार मिले, 

                चापलूस दो -चार मिले

                मचले मन औ बहके कदम के,

                 जी हुजूर सरकार मिले


                  आड़ी तिरछी पोज बनाई,

                  यो यो वाली फोटो खिंचाई

                  टेढी-मेढ़ी सी दुम हिलाकर,

                  उठाये पंजे सैल्फी बनाई


                 आवारगी की सनक जो थी,

                 मालिक बुलाये पर भनक न थी।

                 गुर्रा रहा था वो फुल जोश में, 

                 हंटर पड़ा तब आया होश में


                लोटा जमीं पे वो दुम हिलाकर,

                 सारी मस्ती मन से भुलाकर

                 चश्मा टूटा और छूटा गुलाब, 

                 कैनल में कैद अब झूठा नबाब।।

गुलदाउदी--"आशान्वित रहूँगी, अंतिम साँस तक"

  चित्र, साभार pixabay से यूँ ही ऊबड़-खाबड़ राह में पैरों तले कुचली मलिन सी गुलदाउदी को देखा ... इक्की-दुक्की पत्तियाँ और  कमजोर सी जड़ों के सह...