मंगलवार, 22 मार्च 2022

सच बड़ा तन्हा उपेक्षित राह एकाकी चला

 

True


सच बड़ा तन्हा उपेक्षित, राह एकाकी चला,

टेरती शक्की निगाहें, मन में निज संशय पला ।


झूठ से लड़ता अभी तक, खुद को साबित कर रहा,

खुद ही दो हिस्से बँटा अब, मन से अपने लड़ रहा।


मन ये पूछे तू भला तो, क्यों न तेरे यार हैं  ?

पैरवी तेरी करें जो, कौन कब तैयार हैं  ?


क्या मिला सच बनके तुझको, साजिशों में दब रहा,

घोर कलयुग में समझ अब, तू कहीं ना फब रहा ।


क्यों कसैला और कड़वा, चाशनी कुछ घोल ले !

चापलूसी सीख थोड़ी, शब्द मीठे बोल ले !


ना कोई दुनिया में तेरा, अपने बेगाने हुए,

खून के रिश्ते भी देखो, ऐसे अनजाने हुए ।


सच तू सच में सच का अब तो, इतना आदी हो गया

देख तो सबकी नजर में, तू फसादी हो गया ।


हाँ फसादी ही सही पर सच कभी टलता नहीं,

जान ले मन ! मेरे आगे झूठ ये  फलता नहीं ।


मेरे मन ! तेरे सवालों का बड़ा अचरज मुझे !

क्या करूँ इस चापलूसी से बड़ी नफरत मुझे !


पर मेरे मन !  तू ही मुझसे यूँ खफा हो जायेगा ।

फिर तेरा सच बोल किससे कैसे संबल पायेगा ?


वैसे झूठों और फरेबों ने  मुझे मारा नहीं 

हूँ परेशां और तन्हा, पर कभी हारा नहीं  ।


हाँ  मैं सच हूँ सच रहूँगा,  चाहे एकाकी रहूँ ।

कटु हो चाहे हो कसैला, सच को बेबाकी कहूँ।


मंगलवार, 8 मार्च 2022

अपने हिस्से का दर्द

Gloomy woman
चित्र साभार pixabay  से...


अपनों की महफिल में

हँसते -मुस्कराते 

हिल - मिल कर 

खुशियाँ मनाते सभी अपने


खुशियों से चमकती - दमकती 

इन खूबसूरत आँखों के बीच 

 नजर आती हैं,  कहीं कोई 

एक जोड़ी आँखें 

सूनी - सूनी पथराई सी ।


ये सूनी पथराई सी आँखें

 कोरों का बाँध बना 

आँसुओं का सैलाब थामें

जबरन मुस्कराती हुई

 ढूँढ़ती हैं कोई 

एकांत अंधेरा कोना

जहाँ कुछ हल्का कर सके

पलकों का बोझ।


बोझिल पलकों संग 

ये जोड़ी भर आँखें

झुकी - झुकी और 

सहमी सी

बामुश्किल छुपाती हैं 

कोरों  के छलकाव से

आँसुओं संग बहता दर्द  ।


हाँ दर्द जिसे नहीं दिखाना चाहती

उसके उन अपनों को

जिन्हें अपना बनाने और 

उनका अपनापन पाने में 

लगी हैं उसकी 

वर्षों की मेहनत।


जानती है अपनों को 

अपना दर्द बता कर

मिलेगी उसे संवेदना 

पर साथ में उठेंगे सवाल भी।

और जबाब में उधड़ पड़ेंगी

वे सारी गाँठे जिनमें 

तुलप-तुलप कर 

बाँधे हैं उसने दर्द

अपने हिस्से के...


हर एक दर्द की 

अपनी अलग कहानी

किसी की बेरुखी, बेदर्दी तो 

किसी की अनदेखी से 

पलती बढ़ती 

कोई लाईलाज बीमारी ।


नहीं चाहती वह कि उसके

अपने उठायें कभी 

अपनी कथनी एवं करनी के

पछतावे का दर्द ।


पेडू को पट्टे से बाँध 

कमर कस के होंठ भींचकर 

पिघले बहते

दर्द को आँखों में समेट

शामिल होती हैं 

घर की खुशियों में

गृहलक्ष्मी बन।

और झेलती है अकेले 

अपने हिस्से का दर्द ।


इन रुँआसी आँखों 

और नकली मुस्कान

के बीच का फर्क

कोई समझ ही नहीं पाता

या समझना ही नहीं चाहता।


और फिर "रोनी सूरत वाली"

बहु,भाभी,ताई ,चाची

का उपनाम लिए

और भी आसान होता है सहना

उसके लिए 

अपने हिस्से का दर्द ।


क्योंकि तब नहीं पूछता कोई

आँसुओं का कारण या

दर्द की वजह 

सबको लगता है

शक्ल ही रोनी  है।


फिर ये भी मान लेती हैं कि 

खुद ही सहना होता है 

अपने हिस्से का दर्द ।

लघु कविताएं - सैनर्यु

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