मंगलवार, 20 अगस्त 2019

गृहस्थ प्रेम


beautiful pink flower


तुम साथ होते हो तो
न जाने कितनी कपोल-कल्पनाएं 
उमड़ती-घुमड़ती हैं अंतस में...
और मैं तड़पती हूँ एकान्त के लिए
कि झाँँक सकूँ एक नजर
अपनी कल्पनाओं के खूबसूरत संसार में।

तुम्हारी नजरों से बचते-बचाते
छुप-छुपके झाँक ही लेती हूँ और
देखने लगती हूँ कोई खूबसूरत सपना
पर तभी तुम टोक देते हो.......
कि "कहाँ खो गई" !!!

फिर क्या.....तुमसे छुपाये नहीं छुपा पाती
अपनी खूबसूरत कल्पनाओं के 
अधूरे से सपने को........
और फिर सुनते ही तुम निकल पड़ते हो 
बिना कुछ कहे ,   जैसे रूठे से.....
मैं असमंजस में सोचती रह जाती हूँ 
कि मैंने किया क्या?......
बस सपना ही तो देखा था अधूरा सा.....

तुम्हारे जाने के बाद समय है एकांत भी !
पर न जाने क्यों कोई सपना नजर नहीं आता
नहीं उमड़ती अंतस में वैसी कल्पनाएं
सब सूना सा हो जाता है.......
तब वर्तमान में हकीकत के साथ जीती हूँ मैं
ठीक तुम्हारी तरह
हमारे हकीकत के घर-संसार की
पहरेदार बनकर.....
तुम्हारे इंतजार में तुम्हारी यादों के साथ !

और फिर एक दिन खत्म होता है
ये यादों का सिलसिला और
पल-पल का इंतजार......
...........तुम्हारे आने साथ !................

हाँ ! आते हो तुम ढ़ेर सारी खुशियाँ लेकर
मेरे अधूरे सपने की पूर्णता के साथ....
मेरी कल्पनाओं को हकीकत बनाकर 
बिखेर देते हो मेरे सपने की खुशबू मेरे इर्द-गिर्द....
कि मैं अपने सपने की हकीकत को महसूस करूँ
कल्पनाओं के संसार में खोकर नहीं .......
हकीकत में रहकर
..............तुम्हारे साथ !..........

पर मैं भला ऐसा कहाँ कर पाती हूँ, आदतन.... 
अपने सच हुए सपने से हमारी गृहस्थी सजाकर
तुम्हारे साथ ही फिर से छुप-छुपाकर
झाँक आती हूँ अंतस में बसे कल्पनाओं के संसार में
और ले आती हूँ फिर से एक नया अधूरा सपना !
फिर वही.....तुम चल पड़ते हो उसे पूरा करने
नया आयाम रचने........

..........यही तो है "गृहस्थ प्रेम"..............
किसी भी गृहस्थी की सम्पन्नता का द्योतक
...................है ना...............
     








गुरुवार, 8 अगस्त 2019

भावनाओं के प्रसव की उपज है कविता....



dairy : full of emotions


आज मन में ख्याल आया
रचूँ मैं भी इक कविता
मन को बहुत अटकाया
इधर-उधर दौड़ाया
कुछ पल की सैर करके
ये खाली ही लौट आया
डायरी रह गयी यूँ कोरी
कल्पना रही अधूरी
मैने भी जिद्द थी ठानी
है कविता मुझे बनानी
जा ! उड़ मन परी लोक में
ला ! परियों की कोई कहानी
मैं उसमें से कुछ चुन लूँ
फिर कागज पे कलम से बुन लूँ
बन जाये कोई कविता
जो मन को लगे सुहानी
फुर उड़ चला ये नील गगन में
लौटा फिर इसी चमन में
पर ना साथ कुछ भी लाया
मैने फिर इसे भगाया
जा ! सागर बड़ा सुहाना
सुन्दर हो कोई मुहाना !
कहीं सीपी मचल रही हो...
बूँद मोती में ढल रही हो !
जा ! वहीं से कुछ ढूंढ लाना
रे ! मन खाली न आना !!
पर ये खाली ही आया....
इसे वहां भी कुछ न भाया
मैं तब भी ना हार मानी
मुझे कविता जो थी बनानी
इस मन को फिर समझाया
देख ! सावन कहीं हो आया
रिमझिम फुहारें बरस रहीं हो
धरा महकी बहकी सी हो
कोई नवेली सज रही हो
हाथ मेंहदी रच रही हो
हौले उसके पास जाना
प्रीत थोड़ी ले के आना
मैं उसी से प्रीत चुन लूँ
फिर कागज पे कलम से बुन लूँ
बने कविता या फिर कहानी
जो मन को लगे सुहानी
मेरी जिद्द पे मन उकताया
झट अन्तर में जा समाया
भाव समन्दर के मंथन से
कुछ काव्यरस बाहर आया
झट शब्दमोती चुन न पायी
हाय ! मैं कविता बुन न पायी
उथले में रही अनजानी
न कविता बनी ना कहानी
************************
ले लेती जो इक गहन गोते का सुख
मेरी कविता भी होती सबके सम्मुख
**************************
भावनाओं  के प्रसव की उपज है कविता....
यूँ बनाने से कहाँ कब बन सकी कविता !!!!