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आवश्यकता आविष्कार की जननी

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  कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है । क्योंकि अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए कोई भी प्राणी हाथ पैर तो पटकता ही है ।  तो हम यह भी कह सकते हैं कि आवश्यकता हमें उद्यमी बनाती है । ऐसा ही एक वाकया याद आया । कुछ दिनों पहले एक तरुणी से मिलना हुआ कुछ परेशान लग रही थी तो पूछने पर बोली,"क्या करूँ परेशान हूँ । यहाँ (ससुराल में) सबकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर ही पा रही । सब कह रहे हैं कि पूरे गाँव भर में बड़ी तारीफें थी तुम्हारी। बड़ी उद्यमी लड़की बता रहे थे तुम्हें सारे गाँव वाले। पर यहाँ तो ऐसा कुछ तुम कर नहीं रही ।  अब आप ही बताइये यहाँ मैं कौन सा पहाड़ उखाड़ूँ  ! घर गाँव में तो खेत-खलिहान के दसों काम करती थी यहाँ जो है वही तो करुँगी न ।  ग्रेजुएशन पूरी हुई नहीं अभी, नौकरी भी क्या खाक मिलेगी मुझे" !  और भी ना जाने क्या- क्या । जो कुछ था मन में सब एक साँस में कहती चली गयी वह । कभी रुँआसी होकर तो कभी आक्रोश में, बिना रुके बोले जा रही थी , बस बोले जा रही थी । और मैं चुपचाप उसे देख रही थी ,सुन रही थी और समझ रही थी, बस । और करती भी क्या, शायद वो चाहती भी तो यही थी मुझसे ।...

मुस्कराया जब वो पाटल खिलखिलाकर

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शर्द ठिठुरन, ओस, कोहरा सब भुलाकर मुस्कराया जब वो पाटल खिलखिलाकर । शर्म से रवि लाल, छोड़ी शुभ्र चादर, रश्मियां दौड़ी धरा , आलस भगाकर । छोड़ ओढ़न फिर धरावासी जो जागे, शीतवाहक भागते तब दुम-दबाके ।   क्रुद्ध हारे शिशिर ने पाटल को देखा, पूस पतझड़ी प्रवात, जम के फेंका । सिंहर कर भी संत सा वो मुस्कुराया, अंक ले मारुत को वासित भी बनाया। बिखरी पड़ी हर पंखुड़ी थी मुस्कराती, ओस कण में घुल मधुर आसव बनाती । सत्व इसका सृष्टि को था बहुत भाया,  हो प्रफुल्लित 'पुष्प का राजा' बनाया ।

गलतफ़हमी

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  मम्मी ! क्यों इतना गलत बोल रही हो आप भाभी के बारे में ?  आंटी ने सही ही तो कहा कि दिखने में तो बड़ी मासूम और सीधी सादी है वो । हाँ आंटी ! बहुत मासूम, सीधी-सादी और सुंदर दिखती हैं मेरी भाभी । और जैसी दिखती हैं न, हैं भी बिल्कुल वैसी ही । निधि ने अपनी माँ और उनकी सहेली की बातचीत के बीच हस्तक्षेप किया तो माँ गुस्से से तिलमिलाकर अपनी सहेली से बोली , "देखा ! देखा तूने ! इसने मेरा बेटा ही नहीं अब मेरी बेटी भी अपनी तरफ कर ली है। ऐसी है ये, दिखने में सीधी- सादी पर मन से कपटी और झूठी" । फिर आँखें तरेरकर निधि से बोली, "जब पूरी बात पता न हो, तो चुप रह लिया कर ! अब जाती है या लगाऊँ एक दो"! "नहीं मम्मी ! नहीं जाउँगी मैं, चाहे आप मार भी लो। और कौन सी बात नहीं पता मुझे ? बता भी दो ? देख रही हूँ मैं भी आपको ।  कैसी उखड़ी-उखड़ी हो आप भाभी के साथ !  बेचारी भाभी कित्ती कोशिश कर रही हैं आपको खुश करने की,  पर आप हो कि... हद हो गयी अब तो" !   निधि भी नाराजगी से बोली तो माँ ने आलमारी से एक सूट पीस निकाल कर झटके से उसकी तरफ फेंककर कहा, "ले ! जान ले तू भी अपनी प्यारी भाभी की क...

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