अब जागी है तो भोर तेरी | नारी के आत्मसम्मान पर हिंदी कविता
विवरण (परिचय) नारी केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि समाज की सबसे मजबूत नींव है। फिर भी कई बार उसके त्याग, भावनाओं और सामर्थ्य को वह सम्मान नहीं मिलता जिसकी वह हकदार है। यह कविता एक स्त्री की उसी अनकही पीड़ा, आत्मसम्मान और जागरण की कहानी कहती है। पोषी जो संतति तूने, उसमें भी क्यों जज्बात नहीं । अंतरिक्ष तक परचम तेरा, पर घर में औकात नहीं। मान सभी को इतना देती ,तुझको माने ना कोई । पूरे घर की धुरी है तू, फिर भी कुछ अपने हाथ नहीं । एक भिखारी दर पे आ, पल में मजबूरी भाँप गया । खाली लौट गया बोला, " माता कोई बात नहीं"। पंख दिये जिनको तूने, उड़ने की नसीहत देते वे । ममता की घनेरी छाँव दिखी, क्षमता तेरी ज्ञात नहीं । पर तू अपनी कोशिश से, अपना लोहा मनवायेगी । अब जागी है तो भोर तेरी, दिन बाकी है अब रात नहीं। जनमों की उलझन है ये , धर धीरज ही सुलझाना तू । अपना मूल्यांकन हक तेरा, नैतिकता पर आघात नहीं । कविता का भाव यह कविता हर उस स्त्री को समर्पित है जिसने अपने परिवार, बच्चों और समाज ...