संदेश

अप्रैल, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

चित्र
  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

बेटी----माटी सी

चित्र
कभी उसका भी वक्त आयेगा ? कभी वह भी कुछ कह पायेगी ? सहमत हो जो तुम चुप सुनते  मन हल्का वह कर पायेगी ? हरदम तुम ही क्यों रूठे रहते हर कमी उसी की होती क्यूँ ? घर आँगन के हर कोने की खामी उसकी ही होती क्यूँ ? गर कुछ अच्छा हो जाता है तो श्रेय तुम्ही को जाता है इज्ज़त है तुम्हारी परमत भी उससे कैसा ये नाता है ? दिन रात की ड्यूटी करके भी करती क्या हो सब कहते हैं वह लाख जतन कर ले कोशिश पग पग पर निंदक रहते हैं  । खुद को साबित करते करते उसकी तो उमर गुजरती है जब तक  विश्वास तुम्हें होता तब तक हर ख्वाहिश मरती है । सूनी पथराई आँखें तब भावशून्य हो जाती हैं फिर वह अपनी ही दुश्मन बन  इतिहास वही दुहराती है । बेटी को वर देती जल्दी दुख सहना ही तो सिखाती है बेटी माटी सी बनकर रहना यही सीख उसे भी देती है ।

फ़ॉलोअर