लड़कियों की सुरक्षा या सजा ? एक विचारणीय लघुकथा
आज भी समाज में लड़कियों की सुरक्षा के नाम पर कई नियम बनाए जाते हैं। लेकिन क्या ये नियम सच में सुरक्षा देते हैं या उन्हें और भी सीमित कर देते हैं? इसी सवाल को उठाती है यह छोटी सी लघुकथा । माँ-बेटी की बातचीत - हैलो ! मम्मा! कहाँ हो आप ? फोन क्यों नहीं उठा रहे थे सब ठीक है न ? निक्की ने चिंतित होकर पूछा । माँ ने जबाब दिया, "हाँ बेटा! सब ठीक है । भूल गयी क्या ? मैंने बताया तो था कि मैंने ज्यूलरी वापस लॉकअप में रखने जाना है । ओह! मैं तो भूल गयी, और खूब परेशान हुई । पर मैंने आपके मोबाइल पर भी तो कॉल किया था, आपने उठाया क्यों नहीं ? अरे ! साइलेंट था शायद। चल छोड़। तू बता ! क्या बात है ? और ये शोर कैसा है वहाँ ? कुछ नहीं मम्मा ! ये कुछ लड़कियों वार्डन से बहस कर रही हैं । दबी आवाज में निक्की ने बताया । हॉस्टल के नियम: सुरक्षा या भेदभाव ? वार्डन से ? पर क्यों ? ये बच्चे भी न ! माँ ने पूछा । नहीं मम्मा, यहाँ के रूल्स ही अनोखे हैं, और वार्डन भी स्ट्रिक्ट ! वार्डन तो अपनी ड्यूटी कर रही है बेटा ! ऐसे अपने से बड़ों के मुँह लगना अच्छी बात तो नहीं। वैसे बहस किस बारे में ...