मंगलवार, 4 जनवरी 2022

पीनी है चाय तो धैर्य जरूरी है भाई !

A cup of tea
चित्र साभार,shutterstock से


शिशिर के कुहासे में ठिठुरता दिन देख मन चाय पीने का कर गया अब मन कर गया तो तन का क्या ! वो तो ठहरा मन के हाथ की कठपुतली ! मसालेदार चाय का कप लेकर हाजिर। 

मन को भी कहाँ सब्र था , सुड़कने को आतुर! आदेश पाते ही हाथ ने कप उठाया और होंठों तक ले ही गया कि जुबान कैंसी सी कटकटाते हुए बोली  ;   

"हे !  खबरदार !  खबरदार जो चाय का एक घूँट भी मुझ तक पहुँचाया ! चाय ! वह भी इतनी गरम ! ना बाबा ना ! अब ये अत्याचार सहन नहीं कर सकती।
ठहर जा हाथ ! मैं इस तरह जल कर नहीं मर सकती !

हाथ बेचारा ठिठककर रह गया, फिर थोड़ी हिम्मत कर धीरे से बोला, 
"ठंडी का मौसम है यार ! मन है थोड़ा डोला"। 

जुबान फिर किटकिटाती हुई बोली, "सिर में डाल न, पता चल जायेगा, बड़ा आया तन मन का हमजोली ! समझ क्या रखा है तुमने मुझे ? जो चाहे ठूँसते जाते हो। अब ऐसा ना करने दूँगी किसी भी हाल में मैं तुझे!

बताये देती हूँ , ये चाय-वाय नहीं पीनी मुझे। देख कितनी कोमल हूँ मैं ? क्या दिखता नहीं तुझे ?

चाय पीने के लिए सबसे पहले धैर्य की जरूरत पड़ती है, और धैर्य/ सब्र तो तुम्हारे उस मुएँ मन में जरा भी नहीं।
 हर बार हड़बड़ी में गटकता है गरम गरम चाय ! और जलकर छाले पड़ जाते हैं मुझ में तो हाय ! 

इत्मिनान से सुड़कना तो उसके बस का है नहीं भाई!  बस हड़बड़ी मची रहती है इसे...।
बिना दिमाग जो ठहरा !  कभी गर्म तो कभी ठंडा !
तंग करके रखा है इसने तो"  जुबान बड़बड़ाई।

ये सब सुनकर मन को तो लग गयी अंदर तक... 
गुस्से से गरमाकर बोला, जुबान! सम्भाल कर बात कर!   इतने में ही क्यों है तू मरती ?
देखा नहीं लोगों को तूने सर्दियों में एक नहीं पाँच- पाँच कप चाय पीते हैं, उनकी जुबान को देख वो तो कभी मना नहीं करती ।

जुबान बोली, देखना मेरा काम नहीं , अब दूसरों का काम भी मुझ पर मत थोप! 
और ये अपनी खाली-पीली अकड़ न मुझको नहीं इस तन दिखा जिसने तुझे सर चढ़ाया है।
गुलाम था तू दिमाग का पर दिमाग को तेरा गुलाम बनाया है !

अपना नाम सुनते ही कोने में पड़ा दिमाग कुलबुलाया ! भींचकर आँखें खोली,तो कुछ होश आया।
दुखी हुआ देखकर कि तन पर मन का राज है
अंकुश से छूटा मन मर्जी चलाता है और 
सहमा- सहमा सारा पंच-इन्द्रीय समाज है।

झट पैंतरा बदल खड़ा हुआ दिमाग ! आखिर दिमाग जो ठहरा !  पल में फैंका अंकुश और मन पर डाला पहरा।

उई.......!   करके मन दिमाग का दास हो गया, 
तन भी खुश हुआ कि दिल दिमाग के पास हो गया।

अब दिल -दिमाग का अनुशासन देख जुबान इतराई 
बोली चाय क्या अब तो कॉफी भी पी लो भाई!

तुम दोनों हो साथ तो धैर्य भी तुम्हारे पास होता है ।
हर बुरी बला या बीमारी का सहज ही नाश होता है।

पीनी है चाय तो धैर्य जरूरी है भाई!
धीरे -धीरे सुड़क लो गर्म चाय
अब ठिठुरन है जब आई !!

23 टिप्‍पणियां:

मन की वीणा ने कहा…

वाह गजब गाथा! तन मन जुबान और मस्तिष्क का संतुलन जरूरी है गर्म चाय के माध्यम से सटीक संदेश और ठंड को भगाने के लिए चाय भी हाजिर।
सुंदर सार्थक सृजन।

Sudha Devrani ने कहा…

तहेदिल से धन्यवाद कुसुम जी!आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से प्रोत्साहित हूँ
सादर आभार।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वाह .....
मन तन दिमाग और ज़ुबान की अच्छी रस्साकशी दिखाई ।
सर्दी में चाय पीते किसके पास धैर्य होता है भाई ।
सुड़क सुड़क कर जल्दी जल्दी इसी लिए पीते हैं सब
जीभ भी न जले और मिल जाये थोड़ी सी गरमाई ।।
लिखने का ये अंदाज पसंद आया ।

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद आ.संगीता जी!
आपके अंदाज को भी क्या ही कहने...👌👌🙏🙏
सादर आभार।

आलोक सिन्हा ने कहा…

बहुत सुन्दर

Jyoti Dehliwal ने कहा…

चाय की तन, मन और जुबान के साथ हंसी ठिठौली, मजेदार संवाद वा व्व मजा आ गया।

Bharti Das ने कहा…

बहुत सुंदर,संयम धैर्य तो जरूरी है

MANOJ KAYAL ने कहा…

उत्कृष्ट रचना

विश्वमोहन ने कहा…

बहुत मजेदार रचना।

Unknown ने कहा…

बहुत बढ़िया... अब चाय के गर्म प्याले का समय है।

Jigyasa Singh ने कहा…


अब दिल -दिमाग का अनुशासन देख जुबान इतराई
बोली चाय क्या अब तो कॉफी भी पी लो भाई!

तुम दोनों हो साथ तो धैर्य भी तुम्हारे पास होता है ।
हर बुरी बला या बीमारी का सहज ही नाश होता है।

पीनी है चाय तो धैर्य जरूरी है भाई!
धीरे -धीरे सुड़क लो गर्म चाय
अब ठिठुरन है जब आई !!...आनंदम अति आनंदम ।
ये गोष्ठियों का प्रतिबिंब दिखाती सुंदर रचना ।सर्दी में गर्म चाय की तरह मन में धीरे धीरे उतर गई । साधुवाद ।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद आ.आलोक जी!

Sudha Devrani ने कहा…

तहेदिल से धन्यवाद ज्योति जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार भारती जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद मनोज जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद आ.विश्वमोहन जी!

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार आपका।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार जिज्ञासा जी!

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

वाह चाय की प्याली के साथ तन, मन, दिमाग सभी को आपने पिरो दिया... और ये भी एक संयोग ही है कि आपकी इस रचना को मैंने चाय पीते पीते ही पढ़ा...

Sudha Devrani ने कहा…

तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार नैनवाल जी !

Sarita sail ने कहा…

अरे वाह

Meena Bhardwaj ने कहा…

बहुत खूब ! अत्यन्त सुन्दर सृजन ।

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