परित्यक्ता नहीं..परित्यक्त | पति की बेवफाई और सास ससुर का साथ - हिन्दी कहानी

चित्र
परिचय क्या एक पत्नी सिर्फ इसलिए सब कुछ सहती रहे क्योंकि उसके पास मायके से विदा लेने बाद जाने के लिए कोई और ठिकाना नहीं है ? क्या प्रेम विवाह करने वाली स्त्री अपने ही रिश्तों में सबसे अधिक अकेली हो जाती है ? यह कहानी है सना की जिसे पति की बेवफाई ने तोड़ने की कोशिश की लेकिन उसके सास ससुर ने उसे परित्यक्ता नहीं बल्कि सम्मानित बेटी बनाकर दुनिया के सामने एक मिसाल कायम कर दी पढ़िए रिश्तों विश्वासघात और स्वाभिमान की हृदयस्पर्शी हिंदी कहानी दिल्ली की हल्की ठंडी सुबह थी। खिड़की से छनकर आती धूप ड्रॉइंग रूम के फर्श पर सुनहरी चादर बिछा रही थी, लेकिन सना के मन में जैसे धूप का एक कतरा भी नहीं बचा था। पिछले कुछ महीनों से वह प्रतीक के व्यवहार में बदलाव साफ महसूस कर रही थी। देर रात तक मोबाइल पर मुस्कुराकर बातें करना, उसके आते ही स्क्रीन लॉक कर देना, छोटी-छोटी बातों पर झल्ला उठना—सब कुछ बदलता जा रहा था। "प्रतीक! आज बच्चों के स्कूल में पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग है... तुम भी चलोगे?" सना ने धीमे स्वर में पूछा। प्रतीक ने मोबाइल से नजर उठाए बिना कहा— "मुझसे क्यों पूछ रही हो? अपने काम खुद नहीं कर ...

तूफानी जज़्बात | सम्भाले ना सम्भल रहे अब – भावुक हिंदी नवगीत

 तूफानी जज़्बात :आत्मसम्मान और भीतर के संघर्ष की भावुक हिंदी नवगीत (कविता) -


परिचय -
क्या आप भी अपने जज़्बातों को दबाकर जी रहे हैं?
 "तूफानी जज़्बात" एक ऐसी कविता है जो आत्मसम्मान, मजबूरी और भीतर के दर्द को बहुत गहराई से व्यक्त करती है ।


तूफानी जज़्बात पर आधारित भावुक हिंदी नवगीत


किसको कैसे बोलें बोलों, क्या अपने हालात 

सम्भाले ना सम्भल रहे अब,तूफानी जज़्बात


मजबूरी वश या भलपन में, सहे जो अत्याचार

जख्म हरे हो कहते मन से , करो तो पुनर्विचार


तन मन ताने देकर करते साफ-साफ इनकार,

बोले अब न उठायेंगे,  तेरे पुण्यों का भार 


तन्हाई भी ताना मारे, कहती छोड़ो साथ

सम्भाले ना सम्भल रहे अब तूफानी जज़्बात


सबकी सुन सुन थक कानों ने भी , सुनना है छोड़ा

खुद की अनदेखी पे आँखें भी , रूठ गई हैं थोड़ा


ज़ुबां लड़खड़ा के बोली , अब मेरा भी क्या काम

चुप्पी साधे सब सह के तुम, कर लो जग में नाम


चिपके बैठे पैर हैं देखो, जुड़ के ऐंठे हाथ

सम्भाले ना सम्भल रहे अब तूफानी जज़्बात


रूह भी रहम की भीख माँगती, दबी पुण्य के बोझ

पुण्य भला क्यों बोझ हुआ, गर खोज सको तो खोज


खुद की अनदेखी है यारों, पापों का भी पाप 

तन उपहार मिला है प्रभु से, इसे सहेजो आप 


खुद के लिए खड़े हों पहले, मन मंदिर साक्षात

सम्भाले ना सम्भल रहे अब तूफानी जज़्बात ।।


🔷 भावार्थ

इस रचना में मैंने मन के उन अनकहे कंपन को स्वर देने का प्रयास किया है, जो अक्सर खामोशी की परतों में दबे रह जाते हैं ।

जब इंसान अपने हिस्से की पीड़ा को भी मुस्कान में छुपाकर,
सिर्फ दूसरों के लिए जीता है, तब भीतर एक अदृश्य तूफान जन्म लेता है । 
वही तूफान यहाँ “तूफानी जज़्बात” बनकर उभरता है ।
पुण्य का बोझ” मेरे लिए केवल शब्द नहीं, बल्कि एक अनुभूति है —
जहाँ अपनी ही उपेक्षा के साथ किया गया हर त्याग, अंततः मन पर भार बन जाता है ।

इस रचना के माध्यम से मेरा बस इतना कहना है कि
अपने अस्तित्व को अनदेखा कर देना भी एक तरह का अन्याय है।

खुद के लिए खड़ा होना ही मन की सच्ची साधना है ।


क्या आपने भी कभी ऐसे तूफानी जज़्बात महसूस किए हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें।


🙏सादर अभिनंदन एवं हार्दिक धन्यवाद🙏

पढ़िए मेरी एक और रचना निम्न लिंक पर ..

● तुम उसके जज्बातों की भी कद्र कभी करोगे


#हिंदीकविता #आत्मसम्मान #तूफानीजज़्बात #EmotionalPoetry #SelfRespect


टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

फ़ॉलोअर

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

करते रहो प्रयास (दोहे)

विश्वविदित हो भाषा

मंगलमय नववर्ष हो