क्रिकेट जैसे खेल अमीरों के चोंचले | मजदूर दिवस पर एक कड़वी सच्चाई”
परिचय: हर साल मजदूर दिवस (1 मई) पर हम मजदूरों की मेहनत को सलाम करते हैं, लेकिन क्या हम सच में उनके बच्चों के सपनों को भी समझ पाते हैं? यह कहानी एक ऐसे बच्चे की है, जिसके हाथों में क्रिकेट बैट होना चाहिए था, लेकिन किस्मत ने उसे ईंटें पकड़ने पर मजबूर कर दिया। कन्स्ट्रक्शन एरिया में अकरम को देख शर्मा जी ने आवाज लगाई , "अरे अकरम ! बेटा आज तुम ग्राउण्ड में नहीं गये ? वहाँ तुम्हारी टीम हार रही है"। "नमस्ते अंकल ! नहीं, मैं नहीं गया" । अकरम ने अनमने से जबाब दिया । तभी बीड़ी सुलगाते हुये कमर में लाल साफा बाँधे एक मजदूर के सामने आया --"जी सेठ जी ! क्या काम पड़े अकरम से ? मैं उसका अब्बू हूँ" । शर्मा जी मुस्कुराते हुए बोले -- "अरे नहीं भई, काम कुछ नहीं... मैं इसे क्रिकेट खेलते देखता हूँ । बहुत अच्छा खेलता है ये ! क्या कैच पकड़ता है... बहुत बढ़िया ! क्रिकेट में आगे बढ़ाओ इसे। खूब खेलने दो। नाम रोशन करेगा ये ! बड़ा सा कश भर बीड़ी को पत्थर पे बुझा वापस माचिस की डिबिया में रख, कमर का साफा खोलकर सिर में बाँधते हुए मजदूर मुस्कुराकर बोला, "हाँ सेठ जी ! कैच तो बढ़िया...