तूफानी जज़्बात | सम्भाले ना सम्भल रहे अब – भावुक हिंदी नवगीत
तूफानी जज़्बात : आत्मसम्मान और भीतर के संघर्ष की भावुक हिंदी नवगीत (कविता) - परिचय - क्या आप भी अपने जज़्बातों को दबाकर जी रहे हैं? "तूफानी जज़्बात" एक ऐसी कविता है जो आत्मसम्मान, मजबूरी और भीतर के दर्द को बहुत गहराई से व्यक्त करती है । किसको कैसे बोलें बोलों, क्या अपने हालात सम्भाले ना सम्भल रहे अब,तूफानी जज़्बात मजबूरी वश या भलपन में, सहे जो अत्याचार जख्म हरे हो कहते मन से , करो तो पुनर्विचार तन मन ताने देकर करते साफ-साफ इनकार, बोले अब न उठायेंगे, तेरे पुण्यों का भार तन्हाई भी ताना मारे, कहती छोड़ो साथ सम्भाले ना सम्भल रहे, अब तूफानी जज़्बात सबकी सुन सुन थक कानों ने भी , सुनना है छोड़ा खुद की अनदेखी पे आँखें भी , रूठ गई हैं थोड़ा ज़ुबां लड़खड़ा के बोली , अब मेरा भी क्या काम चुप्पी साधे सब सह के तुम, कर लो जग में नाम चिपके बैठे पैर हैं देखो, जुड़ के ऐंठे हाथ सम्भाले ना सम्भल रहे अब तूफानी जज़्बात रूह भी रहम की भीख माँगती, दबी पुण्य के बोझ पुण्य भला क्यों बोझ हुआ, गर खोज सको तो खोज खुद की अनदेखी है यारों, पापों का भी पाप तन उपहार मिला है प्रभु से, इसे सहेजो आप...