हम फल नहीं — बालमन और माँ के प्रेम की भावपूर्ण लघुकथा
परिचय कभीकभी-कभी बच्चों के छोटे-से व्यवहार में भी मन को छू लेने वाली बड़ी संवेदनाएँ दिखाई देती हैं। परिवार में किसी अपने की तकलीफ बच्चों के मन को भी प्रभावित करती है और वे अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को पीछे रखकर अपनों की खुशी के बारे में सोचने लगते हैं। इसी भाव ने मुझे यह लघुकथा लिखने के लिए प्रेरित किया। ‘हम फल नहीं खायेंगे’ में बालमन की सहज संवेदना और परिवार के प्रति प्रेम को शब्द देने का प्रयास किया है। आज बाबा जब अपने लाए थोड़े से फलों को बार - बार देखकर बड़े जतन से टोकरी में रख रहे थे तब रीना ने अपने छोटे भाई रवि को बुलाकर धीमी आवाज में समझाया कि बाबा जब माँ को फल काटकर देंगे और माँ हमेशा की तरह हमें खिलायेगी तो हम फल नहीं खायेंगे ! सुनकर रवि बोला, "क्यों नहीं खायेंगे ? दीदी ! ऐसे तो माँ परेशान हो जायेगी न ! अगर परेशान होकर और बीमार हो गयी तो ? नहीं मुझे माँ को परेशान नहीं करना ! मैं तो चुपचाप खा लूँगा " । कहकर वो जाने लगा तो रीना ने उसकी कमीज पकड़कर उसे पास खींचा और फिर वैसी ही दबी आवाज में बोली, ...