संदेश

जनवरी, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

चित्र
  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

मिन्नी और नन्हीं तितली

चित्र
                         चित्र : साभार गूगल से कम्प्यूटर गेम नहीं मिलने पर मिन्नी बहुत बहुत रोई... गुस्से से  लाल होकर वह घर से बाहर चली गयी.... घर नहीं आउंगी चाहे जो हो, ऐसा सोच के ऐंठ गयी, पार्क में जाकर कुछ बड़बड़ाकर वहीं बैंच पर बैठ गयी । रंग बिरंगे पंखो वाली इक नन्हींं सी तितली आयी पास के फूलों में वह बैठी, कभी दूर जा मंडरायी... नाजुक रंग बिरंगी पंखों को खोल - बन्द कर इतरायी थोड़ी दूर गई पल में वह अपनी सखियों को लायी.... भाँति-भाँति की सुन्दर तितलियां मिन्नी के मन को भायी । भूली मिन्नी रोना धोना, तितली के संग संग खेली कली फूल तितली से खुश, वह अब कम्प्यूटर गेम भूली मनभाते सुन्दर फूल देख, मिन्नी खुश हो खिलखिलाई तितली सी मंडराई वह खेली, गालों में लाली छायी । साँझ हुई तो सभी तितलियाँ दूर देश को चली गयी..... कल फिर आना,मिलक़र खेलेंगे बोली और ओझल हो गयी । खुशी-खुशी और सही समय पर मिन्नी वापस घर आयी..... तरो-ताजा और भली लगती थी लाड़-प्यार सबका पायी । रात सुहाने सपनों में...

बवाल मच गया

सुन सुन कान पक गये,      उसके तो उम्र भर.... इक लब्ज जो कहा तो बवाल मच गया !!! झुक-झुक के ताकने की कोशिश सभी किये थे, घूरती नजर के बाणों से      तन बिधे थे, ललचायी थी निगाहें  नजरों से चाटते थे...... घूँघट स्वयं उठाया तो बवाल मच गया !!! अपने ही इशारों पे नचाते      रहे सदियों से, कठपुतली सी उसे यूँ ही घुमाते     रहे अंगुलियोंं पे, साधन विलास का उसे     समझा सदा तूने जब पाँव स्वयं थिरके तो बवाल मच गया !!! सदा नाचते -गाते घोड़ी पे चढे़ दूल्हे           अपने ही ब्याह में, इस बार नच ली दुल्हन तो बवाल मच गया !!!        

सर्द मौसम और मैं

चित्र
देखा सिकुड़ते तन को ठिठुरते जीवन को मन में ख्याल आया... थोड़ा ठिठुरने का , थोड़ा सिकुड़ने का, शॉल हटा लिया.... कानो से ठण्डी हवा , सरसराती हुई निकली, ललकारती सी बोली ; इसमें क्या ? सिर्फ शॉल हटाकर, करते मेरा मुकाबला !! लदा है तन बोझ से, मोटे ऊनी कपड़ो के तुम नहीं ठिठुर सकते ! सिकुड़ना नहीं बस में तेरे ! बस फिर क्या.... मन मुकाबले को तैयार उतार फैंके गरम कपड़े उठा लिए हथियार.... कंटीली सी हवा तन-मन बेधती निकली जब आर - पार हाथ दोनों बंधकर सिकुड़े नाक भी हुई तब लाल.... सिकुड़ने लगा तन मन  पल में मानी हार.... लपके कपड़ों पर ज्यों ही सर्द हवा को ठिठोली सूझी तेजी का रूख अपनाया फिर कपड़ो को दूर उड़ाया आव देखा न ताव देखा जब सामने अलाव देखा !!! दौड़े भागे अलाव के आगे काँप रहे थे ,बने अभागे अलाव की गर्माहट से कुछ जान में जान आयी.... पुनः सहज सी लगने लगी सर्द मौसम से अपनी लड़ाई.... मन के भावों को जैसे सर्द प्रकृति ने भांप लिया मुझे हराने, अलाव बुझाने फिर से मन में ठान लिया मारुत में फिर तेजी आयी अलाव की अग्नि भी पछता...

फ़ॉलोअर