शनिवार, 27 जनवरी 2018

मिन्नी और नन्ही तितली



                                   चित्र : साभार गूगल से

कम्प्यूटर गेम नहीं मिलने पर
मिन्नी बहुत बहुत रोई...
गुस्से से  लाल होकर वह
घर से बाहर चली गयी....
घर नहीं आउंगी चाहे जो हो,
ऐसा सोच के ऐंठ गयी,
पार्क में जाकर कुछ बड़बड़ाकर
वहीं बैंच पर बैठ गयी ।

रंग बिरंगे पंखो वाली
इक नन्हींं सी तितली आयी
पास के फूलों में वह बैठी,
कभी दूर जा मंडरायी...
नाजुक रंग बिरंगी पंखों को
खोल - बन्द कर इतरायी
थोड़ी दूर गई पल में वह
अपनी सखियों को लायी....
भाँति-भाँति की सुन्दर तितलियां
मिन्नी के मन को भायी ।

भूली मिन्नी रोना धोना,
तितली के संग संग खेली
कली फूल तितली से खुश,
वह अब कम्प्यूटर गेम भूली
मनभाते सुन्दर फूल देख,
मिन्नी खुश हो खिलखिलाई
तितली सी मंडराई वह खेली,
गालों में लाली छायी ।

साँझ हुई तो सभी तितलियाँ
दूर देश को चली गयी.....
कल फिर आना,मिलक़र खेलेंगे
बोली और ओझल हो गयी ।
खुशी-खुशी और सही समय पर
मिन्नी वापस घर आयी.....
तरो-ताजा और भली लगती थी
लाड़-प्यार सबका पायी ।

रात सुहाने सपनों में बीती
परी लोक की परियों संग...
तितलियों के संग उड़ी वह
रंगीले थे उसके भी पंख ।
भोर हुई तो जल्दी जगकर,
सभी काम वह निबटायी....
गयी विद्यालय सखियों को भी
कल की बातें बतलायी ।

घर आकर झट कुछ खा-पीकर
फट गृहकार्य वह निबटाई  ...
बाकी सखियाँ भी सही समय पर
मिन्नी के घर पर आई....
पार्क गये सब खुशी -खुशी
तितलियों के संग-संग दौड़े.....
खुली हवा में खेले - कूदे,
कम्प्यूटर गेम सबने छोड़े ।
प्रकृति का सानिध्य मिला
स्वस्थता तन मन में आयी....
नेत्रज्योति भी हुई सुरक्षित
विलक्षण बुद्धि सब ने पायी ।।





शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

बवाल मच गया

सुन सुन कान पक गये,
     उसके तो उम्र भर....
इक लब्ज जो कहा तो बवाल मच गया !!!


झुक-झुक के ताकने की
कोशिश सभी किये थे,
घूरती नजरों के बाणों से
     तन बिधे थे,
ललचायी थी निगाहें
 नजरों से चाटते थे......
घूँघट स्वयं उठाया तो बवाल मच गया !!!


अपने ही इशारों पे नचाते
     रहे सदियों से,
कठपुतली सी उसे यूँ ही घुमाते
    रहे अंगुलियोंं पे,
साधन विलास का उसे
    समझा सदा तूने....
जब पाँव स्वयं थिरके तो बवाल मच गया !!!


सदा नाचते -गाते घोड़ी पे चढे़ दूल्हे
          अपने ही ब्याह में,
इस बार नच ली दुल्हन तो बवाल मच गया !!!

       







रविवार, 14 जनवरी 2018

सर्द मौसम और मैं





देखा सिकुड़ते तन को
ठिठुरते जीवन को
मन में ख्याल आया...
थोड़ा ठिठुरने का ,
थोड़ा सिकुड़ने का,
शॉल हटा लिया....
कानो से ठण्डी हवा ,
सरसराती हुई निकली,
ललकारती सी बोली ;
इसमें क्या ?
सिर्फ शॉल हटाकर,
करते मेरा मुकाबला !!
लदा है तन बोझ से,
मोटे ऊनी कपड़ो के
तुम नहीं ठिठुर सकते !
सिकुड़ना नहीं बस में तेरे !
बस फिर क्या....
मन मुकाबले को तैयार
उतार फैंके गरम कपड़े
उठा लिए हथियार....
कंटीली सी हवा तन-मन
बेधती निकली जब आर - पार
हाथ दोनों बंधकर सिकुड़े
नाक भी हुई तब लाल....
सिकुड़ने लगा तन मन 
पल में मानी हार....
लपके कपड़ों पर ज्यों ही
सर्द हवा को ठिठोली सूझी
तेजी का रूख अपनाया
फिर कपड़ो को दूर उड़ाया
आव देखा न ताव देखा
जब सामने अलाव देखा !!!
दौड़े भागे अलाव के आगे
काँप रहे थे ,बने अभागे
अलाव की गर्माहट से कुछ
जान में जान आयी....
पुनः सहज सी लगने लगी
सर्द मौसम से अपनी लड़ाई....
मन के भावों को जैसे
सर्द प्रकृति ने भांप लिया
मुझे हराने, अलाव बुझाने
फिर से मन में ठान लिया
मारुत में फिर तेजी आयी
अलाव की अग्नि भी पछतायी
अब तो धुंआ धूं - धूं करके
आँखों में घुसता जाता था
और अलाव भी गर्माहट नहीं
सिर्फ आँसू दिये जाता था......
ओह !  हार स्वीकार मुझे
क्षमा करो इस बार मुझे....
सर्द हवाओं अब थम जाओ
थोड़ी सी गर्माहट लाओ
मैं अबोध थी जो भिड़ बैठी
शक्ति हीन मैं फिर क्यों ऐंठी ???
रवि कुछ दया तुम ही कर दो
अपनी किरणों से गर्माहट भर दो !!!
हाड़ कंपाती इस ठण्डी से
कोई आकर मुझे बचाओ !!!
मन्द हवा हौले से आकर
फिर से मेरा अलाव जलाओ......

                           चित्र : साभार गूगल से....