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मोबाइल फोन: सुविधा या लत? | मोबाइल के फायदे और नुकसान | हिंदी लेख

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 परिचय आधुनिक युग में विज्ञान का एक अद्भुत और महत्त्वपूर्ण उपहार मोबाइल फोन है। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को विश्राम करने तक यह हमारे जीवन का लगभग अभिन्न साथी बन चुका है। जहाँ एक ओर इसने हमारे अनेक कार्यों को सरल बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसका अत्यधिक उपयोग कई नई समस्याओं का कारण भी बन रहा है। प्रस्तुत लेख में मोबाइल फोन की उपयोगिता के साथ-साथ इसकी लत से होने वाले दुष्प्रभावों पर चर्चा की गई है।                                आज मोबाइल फोन ने पूरी दुनिया को मानो हमारी मुट्ठी में समेट दिया है। कुछ दशक पहले जिन कार्यों के लिए घंटों या कई दिनों का समय लगता था, वे आज कुछ ही क्षणों में पूरे हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीकी सुविधा है जिसने मनुष्य के जीवन को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल और सुविधाजनक बना दिया है। किसी से तुरंत संपर्क करना हो, पढ़ाई करनी हो, बैंकिंग का कार्य हो या मनोरंजन—अनेक कार्य अब एक ही मोबाइल फोन से सहजता से पूरे हो जाते हैं। यही कारण है कि आज यह बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर आयु वर...

हम फल नहीं खायेंगे

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आज बाबा जब अपने लाये थोड़े से फलों को बार - बार देखकर बड़े जतन से टोकरी में रख रहे थे तब रीना ने अपने छोटे भाई रवि को बुलाकर धीमी आवाज में समझाया कि बाबा जब माँ को फल काटकर देंगे और माँ हमेशा की तरह हमें  खिलायेगी तो हम फल नहीं खायेंगे ! सुनकर रवि बोला, "क्यों नहीं खायेंगे ? दीदी ! ऐसे तो माँ परेशान हो जायेगी न ! अगर परेशान होकर और बीमार हो गयी तो ? नहीं मुझे माँ को परेशान नहीं करना ! मैं तो चुपचाप खा लूँगा " । कहकर वो जाने लगा तो रीना ने उसकी कमीज पकड़कर उसे पास खींचा और फिर वैसी ही दबी आवाज में बोली, "अरे बुद्धू ! देखा नहीं , फल कित्ते कम हैं ! माँ बीमार है न, खाना भी नहीं खाती है, तो थोड़े फल ही खा लेगी न । समझा" !  तो वह मासूमियत से बोला, "क्या समझा ? इत्ते सारे तो हैं न  !  हम सब मिलकर खा लेंगे । फिर बाबा और ले आयेंगे " । श्श्श...धीरे बोल ! सुन ! आज मैंने माँ - बाबा की बातें सुनी । वे दोनों पैसों की चिंता कर रहे थे । माँ की बीमारी को ठीक करने के लिए अभी बहुत सारे पैसे खर्च करने पड़ेंगे । तो बाबा अब ज्यादा फल नहीं ला पायेंगे ना ! इसीलिए हम फल नहीं खायेंगे ...

उठे वे तो जबरन गिराने चले

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  उठे वे तो जबरन गिराने चले  कुछ अपने ही रिश्ते मिटाने चले  अपनों की नजर में गिराकर उन्हें गैरों में अपना बताने चले ।। ना राजा ना रानी, अधूरी कहानी दुखों से वे लाचार थे बेजुबानी करम के भरम में फँसे ऐसे खुद ही कल्पित ही किस्से सुनाने चले  उठे वे तो जबरन गिराने चले ।। दर-दर की ठोकर से मजबूत होकर चले राह अपनी सभी आस खोकर हर छाँव सर से उनकी गिराकर राहों में काँटे बिछाने चले उठे वे तो जबरन गिराने चले ।। काँटों में चल के तमस से निकल के रस्ते बनाये हर विघ्नों से लड़ के पहचान खुद से नयी जब बनी तो मिल बाँट खुशियाँ मनाने चले उठे वे तो जबरन गिराने चले ।। पढ़िए इन्हीं भावों पर आधारित एक और सृजन " दुखती रगों को दबाते बहुत हैं "

ये माँ भी न !...

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 ट्रेन में बैठते ही प्रदीप ने अपनी बंद मुट्ठी खोलकर देखी तो आँखों में नमी और होठों में मुस्कुराहट खिल उठी ।  साथ बैठे दोस्त राजीव ने उसे देखा तो आश्चर्यचकित होकर पूछा, "क्या हुआ ? तू हँस रहा है या रो रहा है " ?  अपनी बंद मुट्ठी को धीरे से खोलकर दो सौ का नोट दिखाते हुए प्रदीप बोला , "ये माँ भी न ! जानती है कि पिचहत्तर हजार तनख्वाह है मेरी । फिर भी ये देख ! ये दो सौ रुपये का नोट मेरी मुट्ठी में बंद करते हुए बोली , रास्ते में कुछ खा लेना" ।  कहते हुए उसका गला भर आया । 

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