तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित
अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित तीन कुण्डलिया कुण्डलिया हिन्दी साहित्य का एक लोकप्रिय छंद है जो अपनी लय, भाव और संदेश के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। प्रस्तुत हैं तीन कुण्डलिया— 'भारत महान', 'हार' और 'विचलित'। इन रचनाओं में देशप्रेम, संघर्ष में सकारात्मक सोच तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया गया है। भारत महान सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान । शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान । है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली । सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली । कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे । भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।। हार हार करें स्वीकार जो, होते नहीं निराश । सतत परिश्रम कर सदा,मन में रखते आस ।। मन में रखते आस, नहीं बाधा से डरते । गिरकर उठते रोज, कभी ना मन से थकते ।। कहे सुधा निज बात, है यही जीत का सार । करते रहें प्रयास, सौपान बनेगी हार ।। बिचलित बिचलित गर मन हो रहा, कर लें प्राणायाम । साधें श्वास - प्रश्वास निज, मिले सुखद आराम ।। मिले सुखद आराम, धैर्य मन में है आता । मिटे बिचार विकार, भाव निर्मल हो जाता ।। कहे सुधा सुन मीत,श्वास साधें जो नियमित...

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 22 मई 2023 को साझा की गयी है
जवाब देंहटाएंपाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
अत्यंत आभार एवं धन्यवाद यशोदा जी मेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु।
हटाएंबहुत बढ़िया भावाभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंजी, हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आपका ।🙏🙏
हटाएंआगे बढ़ता देख लोगों को खुशी के बजाय ईर्ष्या होती है , लेकिन जो संघर्ष कर सकता है उसे फर्क नहीं पड़ता ।
जवाब देंहटाएंयथार्थ को कहती सुंदर रचना ।
जी, तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आपका ।🙏🙏
हटाएंवाह!सुधा जी ,खूबसूरत सृजन।
जवाब देंहटाएंकाँटों में चल के तमस से निकल के
जवाब देंहटाएंरस्ते बनाये हर विघ्नों से लड़ के
पहचान खुद से नयी जब बनी तो
मिल बाँट खुशियाँ मनाने चले
उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।
.. मन की बात लिख दी सखी।
कुछ लोग हराने के लिए साथ देते हैं और जीतते ही झंडाबरदार बनकर सबसे आगे कूदते है।
यथार्थपरक गीत के लिए बहुत बधाई मित्र।
सुधाजी, हमारे नेताओं को आपने ख़ूब पहचाना !
जवाब देंहटाएंमसलना और कुचलना ही उनकी आदत है, नफ़रत और हसद ही उनकी फ़ितरत है.
वाह! बहुत बढ़िया!!
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जवाब देंहटाएंदर-दर की ठोकर से मजबूत होकर
चले राह अपनी सभी आस खोकर
हर छाँव सर से उनकी गिराकर
राहों में काँटे बिछाने चले
उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
हौसलों की दृढता जब ऊंचाइयों को उड़ान देती है .. ऊपर देखने वालों की कतार लग जाती है .
हटाएंलगता है मानो, दुनिया का दस्तूर यही होता जा रहा,
जवाब देंहटाएंदूसरों को गिराकर आगे बढ़ने की।
यथार्थ को बयां करती सुंदर रचना।