उठे वे तो जबरन गिराने — संघर्ष और आत्मविश्वास की कविता
परिचय
कभी-कभी जीवन में सबसे अधिक पीड़ा तब होती है, जब मुश्किल समय में सहारा देने की उम्मीद अपनों से हो और वही लोग रास्ते में बाधाएँ खड़ी करने लगें। उनकी कोशिशें हमें गिराने की हों, फिर भी हम उन परिस्थितियों से निकलकर अपने दमखम और हौसले के साथ मंजिल तक पहुँच जाएँ। विडंबना तब सामने आती है, जब सफलता मिलने पर वही लोग मिल-बाँटकर खुशी मनाने की बात करने लगते हैं। “उठे वे तो जबरन गिराने चले” कविता रिश्तों के इसी बदलते व्यवहार और मनुष्य की दृढ़ता को अभिव्यक्त करती है। यह कविता उस आत्मविश्वास की बात करती है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी टूटता नहीं और अंततः अपने लिए राह बना लेता है।
उठे वे तो जबरन गिराने चले
कुछ अपने ही रिश्ते मिटाने चले
अपनों की नजर में गिराकर उन्हें
गैरों में अपना बताने चले ।।
ना राजा ना रानी, अधूरी कहानी
दुखों से वे लाचार थे बेजुबानी
करम के भरम में फँसे ऐसे खुद ही
कल्पित ही किस्से सुनाने चले
उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।
दर-दर की ठोकर से मजबूत होकर
चले राह अपनी सभी आस खोकर
हर छाँव सर से उनकी गिराकर
राहों में काँटे बिछाने चले
उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।
काँटों में चल के तमस से निकल के
रस्ते बनाये हर विघ्नों से लड़ के
पहचान खुद से नयी जब बनी तो
मिल बाँट खुशियाँ मनाने चले
उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।
✨धन्यवाद🙏
रिश्तों के बदलते व्यवहार और मन की पीड़ा पर मेरी एक और रचना पढ़ें—
"दुखती रगों को दबाते बहुत हैं"

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 22 मई 2023 को साझा की गयी है
जवाब देंहटाएंपाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
अत्यंत आभार एवं धन्यवाद यशोदा जी मेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु।
हटाएंबहुत बढ़िया भावाभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंजी, हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आपका ।🙏🙏
हटाएंआगे बढ़ता देख लोगों को खुशी के बजाय ईर्ष्या होती है , लेकिन जो संघर्ष कर सकता है उसे फर्क नहीं पड़ता ।
जवाब देंहटाएंयथार्थ को कहती सुंदर रचना ।
जी, तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आपका ।🙏🙏
हटाएंवाह!सुधा जी ,खूबसूरत सृजन।
जवाब देंहटाएंकाँटों में चल के तमस से निकल के
जवाब देंहटाएंरस्ते बनाये हर विघ्नों से लड़ के
पहचान खुद से नयी जब बनी तो
मिल बाँट खुशियाँ मनाने चले
उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।
.. मन की बात लिख दी सखी।
कुछ लोग हराने के लिए साथ देते हैं और जीतते ही झंडाबरदार बनकर सबसे आगे कूदते है।
यथार्थपरक गीत के लिए बहुत बधाई मित्र।
सुधाजी, हमारे नेताओं को आपने ख़ूब पहचाना !
जवाब देंहटाएंमसलना और कुचलना ही उनकी आदत है, नफ़रत और हसद ही उनकी फ़ितरत है.
वाह! बहुत बढ़िया!!
जवाब देंहटाएं
जवाब देंहटाएंदर-दर की ठोकर से मजबूत होकर
चले राह अपनी सभी आस खोकर
हर छाँव सर से उनकी गिराकर
राहों में काँटे बिछाने चले
उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
हौसलों की दृढता जब ऊंचाइयों को उड़ान देती है .. ऊपर देखने वालों की कतार लग जाती है .
हटाएंलगता है मानो, दुनिया का दस्तूर यही होता जा रहा,
जवाब देंहटाएंदूसरों को गिराकर आगे बढ़ने की।
यथार्थ को बयां करती सुंदर रचना।