रविवार, 21 मई 2023

उठे वे तो जबरन गिराने चले

 

Falling

उठे वे तो जबरन गिराने चले 

कुछ अपने ही रिश्ते मिटाने चले 

अपनों की नजर में गिराकर उन्हें

गैरों में अपना बताने चले ।।


ना राजा ना रानी, अधूरी कहानी

दुखों से वे लाचार थे बेजुबानी

करम के भरम में फँसे ऐसे खुद ही

कल्पित ही किस्से सुनाने चले 

उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।


दर-दर की ठोकर से मजबूत होकर

चले राह अपनी सभी आस खोकर

हर छाँव सर से उनकी गिराकर

राहों में काँटे बिछाने चले

उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।


काँटों में चल के तमस से निकल के

रस्ते बनाये हर विघ्नों से लड़ के

पहचान खुद से नयी जब बनी तो

मिल बाँट खुशियाँ मनाने चले

उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।



13 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 22 मई 2023 को साझा की गयी है
पाँच लिंकों का आनन्द पर
आप भी आइएगा....धन्यवाद!

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत बढ़िया भावाभिव्यक्ति

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आगे बढ़ता देख लोगों को खुशी के बजाय ईर्ष्या होती है , लेकिन जो संघर्ष कर सकता है उसे फर्क नहीं पड़ता ।
यथार्थ को कहती सुंदर रचना ।

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद यशोदा जी मेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु।

Sudha Devrani ने कहा…

जी, हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आपका ।🙏🙏

Sudha Devrani ने कहा…

जी, तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आपका ।🙏🙏

शुभा ने कहा…

वाह!सुधा जी ,खूबसूरत सृजन।

जिज्ञासा सिंह ने कहा…

काँटों में चल के तमस से निकल के
रस्ते बनाये हर विघ्नों से लड़ के
पहचान खुद से नयी जब बनी तो
मिल बाँट खुशियाँ मनाने चले
उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।
.. मन की बात लिख दी सखी।
कुछ लोग हराने के लिए साथ देते हैं और जीतते ही झंडाबरदार बनकर सबसे आगे कूदते है।
यथार्थपरक गीत के लिए बहुत बधाई मित्र।

गोपेश मोहन जैसवाल ने कहा…

सुधाजी, हमारे नेताओं को आपने ख़ूब पहचाना !
मसलना और कुचलना ही उनकी आदत है, नफ़रत और हसद ही उनकी फ़ितरत है.

विश्वमोहन ने कहा…

वाह! बहुत बढ़िया!!

शैलेन्द्र थपलियाल ने कहा…


दर-दर की ठोकर से मजबूत होकर

चले राह अपनी सभी आस खोकर

हर छाँव सर से उनकी गिराकर

राहों में काँटे बिछाने चले

उठे वे तो जबरन गिराने चले ।।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

बेनामी ने कहा…

हौसलों की दृढता जब ऊंचाइयों को उड़ान देती है .. ऊपर देखने वालों की कतार लग जाती है .

Rupa Singh ने कहा…

लगता है मानो, दुनिया का दस्तूर यही होता जा रहा,
दूसरों को गिराकर आगे बढ़ने की।

यथार्थ को बयां करती सुंदर रचना।

लघुकथा - विडम्बना

 "माँ ! क्या आप पापा की ऐसी हरकत के बाद भी उन्हें उतना ही मानती हो " ?   अपने और माँ के शरीर में जगह-जगह चोट के निशान और सूजन दिखा...