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रक्षाबंधन पर रोला छंद | भ्रात की सजी कलाई

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परिचय रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और विश्वास का पावन पर्व है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधकर उसके सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती है। प्रस्तुत ‘भ्रात की सजी कलाई’ रोला छंद में रक्षाबंधन के इसी प्रेमपूर्ण और भावनात्मक स्वरूप को शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है। सावन पावन मास , बहन है पीहर आई । राखी लाई साथ, भ्रात की सजी कलाई ।। टीका करती भाल, मधुर मिष्ठान खिलाती । देकर शुभ आशीष, बहन अतिशय हर्षाती ।। सावन का त्यौहार, बहन राखी ले आयी । अति पावन यह रीत, नेह से खूब निभाई ।। तिलक लगाकर माथ, मधुर मिष्ठान्न खिलाया । दिया प्रेम उपहार , भ्रात का मन हर्षाया ।। राखी का त्योहार, बहन है राह ताकती । थाल सजाकर आज, मुदित मन द्वार झाँकती ।। आया भाई द्वार, बहन अतिशय हर्षायी ।  बाँधी रेशम डोर, भ्रात की सजी कलाई ।। निष्कर्ष रक्षाबंधन केवल कलाई पर बाँधी गई राखी का त्योहार नहीं, बल्कि भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और आत्मीय रिश्ते का उत्सव है। राखी की यह रेशम डोर जीवनभर स्नेह और अपनत्व का संदेश देती रहे—इसी मंगलकामना के साथ मेरी यह रक्षाबंधन पर रोला छंद रचना आपको समर्पित है...

आई है बरसात | वर्षा ऋतु पर रोला छंद)

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परिचय सावन का महीना प्रकृति के सौंदर्य का अनुपम उत्सव लेकर आता है। झमाझम वर्षा, रिमझिम फुहारें, सौंधी मिट्टी की महक, शीतल पुरवाई और मेघों की गर्जना वातावरण को जीवंत बना देती हैं। पेड़-पौधे हरियाली की चादर ओढ़ लेते हैं और नदियाँ-नाले जल से भर उठते हैं। प्रस्तुत रोला छंद में सावन ऋतु की इसी मनमोहक छटा और वर्षा के आनंददायक स्वरूप का सहज एवं भावपूर्ण चित्रण करने का प्रयास किया है। अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित  आया सावन मास,  झमाझम बरखा आई। रिमझिम पड़े फुहार, चली शीतल पुरवाई। भीनी सौंधी गंध, सनी माटी से आती। गिरती तुहिन फुहार, सभी के मन को भाती ।। गरजे नभ में मेघ, चमाचम बिजली चमके । झर- झर झरती बूँद, पात मुक्तामणि दमके । आई है बरसात,  घिरे हैं बादल काले । बरस रहे दिन रात, भरें हैं सब नद नाले ।। रिमझिम पड़े फुहार, हवा चलती मतवाली । खिलने लगते फूल, महकती डाली डाली । आई है बरसात, घुमड़कर बादल आते । गिरि कानन में घूम, घूमकर जल बरसाते ।। बारिश की बौछार , सुहानी सबको लगती । रिमझिम पड़े फुहार, उमस से राहत मिलती । बहती मंद बयार , हुई खुश धरती रानी । सजी धजी है आज, पहनकर चूनर धानी ।। निष्...

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