प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज | बसंत कविता
यह कविता वसंत ऋतु के आगमन और प्रकृति के प्रेममय रूप को दर्शाती है, जहाँ ऋतुराज अपने साथ सुगंध, संगीत और नवजीवन लेकर आते हैं।" प्रीत की बरखा लिए लो आ गए ऋतुराज प्रीत की मधुर अनुभूति बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज, प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गई, श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गई । भ्रमर - दल देखो हुए हैं, प्रेम के मोहताज, प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिल-डुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज, प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है, अंबर से झरती बूँद आशा ला रही है । टिप-टिप मधुर संगीत सी, भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़, प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । ✨धन्यवाद🙏 ऐसे ही एक और रचना निम्न लिंक पर ● बसंत की पदचाप #वसंत_ऋतु #हिंदी_कविता #प्रेम_कविता #NaturePoetry #SpringSeason #HindiPoetry