प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज
बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज
प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज
फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी
श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी
भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज
प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज ।
आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती
ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती
लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज
प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज ।
सौंधी महक माटी की मन को भा रही है
अंबर से झरती बूँद आशा ला रही है
टिपटिप मधुर संगीत सी भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़
प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज ।
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आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द रविवार 25 जनवरी , 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आपका मेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु ।
हटाएंसादर आभार ।
सुन्दर गीत
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार एवं धन्यवाद आपका ।
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार एवं धन्यवाद आपका ।
हटाएंऋतुराज वसंत के आगमन पर प्रकृति की पुलकन को मधुर शब्दावली मे पिरो कर बहुत सुन्दर गीत का सृजन किया है सुधा जी ! अति सुन्दर !!
जवाब देंहटाएंशरद की महक को बाखूबी लिखा है शब्दों में ...
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