भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक
परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक— व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव, दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर । क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान, राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द रविवार 25 जनवरी , 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आपका मेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु ।
हटाएंसादर आभार ।
सुन्दर गीत
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार एवं धन्यवाद आपका ।
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार एवं धन्यवाद आपका ।
हटाएंऋतुराज वसंत के आगमन पर प्रकृति की पुलकन को मधुर शब्दावली मे पिरो कर बहुत सुन्दर गीत का सृजन किया है सुधा जी ! अति सुन्दर !!
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार मीना जी !
हटाएंशरद की महक को बाखूबी लिखा है शब्दों में ...
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद आपका आ. नासवा जी !
हटाएंऋतुराज वसंत के आगमन के मनमोहक गीत हेतु आपका आभार एवं अभिनंदन सुधा जी। यह आगमन आपके लिए भी उत्तम स्वास्थ्य एवं मन की पुलक लाए, यही शुभेच्छा है।
जवाब देंहटाएंअत्यंत आभार एवं हार्दिक धन्यवाद आपका आ. जितेंद्र जी !
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