प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज | बसंत कविता

यह कविता वसंत ऋतु के आगमन और प्रकृति के प्रेममय रूप को दर्शाती है, जहाँ ऋतुराज अपने साथ सुगंध, संगीत और नवजीवन लेकर आते हैं।"


प्रीत की बरखा लिए लो आ गए ऋतुराज

"वसंत ऋतु में खिले फूलों का सुंदर दृश्य – बसंत कविता"

प्रीत की मधुर अनुभूति


बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज,

प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज ।


फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गई,

श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गई ।

भ्रमर - दल देखो हुए हैं, प्रेम के मोहताज,

प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  ।


आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती

ठूँठ से लिपटी लता, हिल-डुल रही पाती

लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज,

प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  ।


सौंधी महक माटी की मन को भा रही है,

अंबर से झरती बूँद  आशा ला रही है ।

 टिप-टिप मधुर संगीत सी, भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़,

प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज ।



✨धन्यवाद🙏

ऐसे ही एक और रचना निम्न लिंक पर

● बसंत की पदचाप


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टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द रविवार 25 जनवरी , 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हार्दिक धन्यवाद आपका मेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु ।
      सादर आभार ।

      हटाएं
  2. ऋतुराज वसंत के आगमन पर प्रकृति की पुलकन को मधुर शब्दावली मे पिरो कर बहुत सुन्दर गीत का सृजन किया है सुधा जी ! अति सुन्दर !!

    जवाब देंहटाएं
  3. शरद की महक को बाखूबी लिखा है शब्दों में ...

    जवाब देंहटाएं
  4. ऋतुराज वसंत के आगमन के मनमोहक गीत हेतु आपका आभार एवं अभिनंदन सुधा जी। यह आगमन आपके लिए भी उत्तम स्वास्थ्य एवं मन की पुलक लाए, यही शुभेच्छा है।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. अत्यंत आभार एवं हार्दिक धन्यवाद आपका आ. जितेंद्र जी !

      हटाएं

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