रविवार, 24 मार्च 2019

पौधे---अपनों से


Plants


कुछ पौधे जो मन को थे भाये
घर लाकर मैंंने गमले सजाये
मन की तन्हाई को दूर कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.......

हवा जब चली तो ये सरसराये 
मीठी सी सरगम ज्यों गुनगनाये
सुवासित सुसज्जित सदन कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.......

इक रोज मुझको बहुत क्रोध आया
गुस्से में मैंंने इनको बहुत कुछ सुनाया।
न रूठे न टूटे मुझपे, स्वस्यचित्त रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये........

खुशी में मेरी ये भी खुशियाँँ मनाते
खिला फूल तितली भौंरे सभी को बुलाते
उदासीन मन उल्लासित कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.......

मुसीबतों में जब मैंने मन उलझाया
मेरे गुलाब ने प्यारा पुष्प तब खिलाया
आशान्वित मन मेरा कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये........

धूल भरी आँधी या तूफान आये
घर के बड़ों सा पहले ये ही टकरायेंं
घर-आँगन सुरक्षित कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.....

                  चित्र साभार गूगल से...











शनिवार, 2 मार्च 2019

अब भावों में नहीं बहना है....


leaf flowing with air indicating emotions


जाने कैसा अभिशाप है ये
मन मेरा समझ नहीं पाता है
मेरी झोली में आकर तो
सोना भी लोहा बन जाता है

जिनको मन से अपना माना
उन्हीं ने ऐसे दगा दिया
यकींं भी गया अपनेपन से
तन्हा सा जीवन बिता दिया

एक सियासत देश में चलती
एक घरों में चलती है
भाषण में दम जिसका होता
सरकार उसी की बनती है

सच ही कहा है यहाँ किसी ने
"जिसकी लाठी उसकी भैंस"
बड़बोले ही करते देखे
हमने इस दुनिया में ऐश

नदी में बहने वाले को
साहिल शायद मिल भी जाये
भावों में बहने वाले को
 अब तक "प्रभु" भी ना बचा पाये

गन्ने सा मीठा क्या बनना
कोल्हू में निचोड़े जाओगे
इस रंग बदलती दुनिया में
गिरगिट पहचान न पाओगे

दुनियादारी सीखनी होगी
गर दुनिया में रहना है
"जैसे को तैसा" सीख सखी !
अब भावों में नहीं बहना है
                   
                   चित्र;साभार गूगल से....