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मोबाइल फोन: सुविधा या लत? | मोबाइल के फायदे और नुकसान | हिंदी लेख

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 परिचय आधुनिक युग में विज्ञान का एक अद्भुत और महत्त्वपूर्ण उपहार मोबाइल फोन है। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को विश्राम करने तक यह हमारे जीवन का लगभग अभिन्न साथी बन चुका है। जहाँ एक ओर इसने हमारे अनेक कार्यों को सरल बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसका अत्यधिक उपयोग कई नई समस्याओं का कारण भी बन रहा है। प्रस्तुत लेख में मोबाइल फोन की उपयोगिता के साथ-साथ इसकी लत से होने वाले दुष्प्रभावों पर चर्चा की गई है।                                आज मोबाइल फोन ने पूरी दुनिया को मानो हमारी मुट्ठी में समेट दिया है। कुछ दशक पहले जिन कार्यों के लिए घंटों या कई दिनों का समय लगता था, वे आज कुछ ही क्षणों में पूरे हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीकी सुविधा है जिसने मनुष्य के जीवन को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल और सुविधाजनक बना दिया है। किसी से तुरंत संपर्क करना हो, पढ़ाई करनी हो, बैंकिंग का कार्य हो या मनोरंजन—अनेक कार्य अब एक ही मोबाइल फोन से सहजता से पूरे हो जाते हैं। यही कारण है कि आज यह बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर आयु वर...

पौधे---अपनों से

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कुछ पौधे जो मन को थे भाये घर लाकर मैंंने गमले सजाये मन की तन्हाई को दूर कर रहे ये अपनों के जैसे अपने लगे ये । हवा जब चली तो ये सरसराये  मीठी सी सरगम ज्यों गुनगनाये सुवासित सुसज्जित सदन कर रहे ये अपनों के जैसे अपने लगे ये । इक रोज मुझको बहुत क्रोध आया गुस्से में मैंंने इनको बहुत कुछ सुनाया। न रूठे न टूटे मुझपे, स्वस्यचित्त रहे ये अपनों के जैसे अपने लगे ये । खुशी में मेरी ये भी खुशियाँँ मनाते खिला फूल तितली भौंरे सभी को बुलाते उदासीन मन उल्लासित कर रहे ये अपनों के जैसे अपने लगे ये । मुसीबतों में जब मैंने मन उलझाया मेरे गुलाब ने प्यारा पुष्प तब खिलाया आशान्वित मन मेरा कर रहे ये अपनों के जैसे अपने लगे  । धूल भरी आँधी या तूफान आये घर के बड़ों सा पहले ये ही टकरायेंं घर-आँगन सुरक्षित कर रहे ये अपनों के जैसे अपने लगे ये ।                   चित्र साभार गूगल से... पढिए पाम ट्री की उदासी पर मेरी रचना उदास पाम

अब भावों में नहीं बहना है....

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जाने कैसा अभिशाप  है ये मन मेरा समझ नहीं पाता है मेरी झोली में आकर तो सोना भी लोहा बन जाता है जिनको मन से अपना माना उन्हीं ने ऐसे दगा दिया यकींं भी गया अपनेपन से तन्हा सा जीवन बिता दिया एक सियासत देश में चलती एक घरों में चलती है भाषण में दम जिसका होता सरकार उसी की बनती है सच ही कहा है यहाँ किसी ने "जिसकी लाठी उसकी भैंस" बड़बोले ही करते देखे हमने इस दुनिया में ऐश नदी में बहने वाले को साहिल शायद मिल भी जाये भावों में बहने वाले को  अब तक "प्रभु" भी ना बचा पाये गन्ने सा मीठा क्या बनना कोल्हू में निचोड़े जाओगे इस रंग बदलती दुनिया में गिरगिट पहचान न पाओगे दुनियादारी सीखनी होगी गर दुनिया में रहना है 'जैसे को तैसा' सीख सखी! अब भावों में नहीं बहना है                                        चित्र;साभार गूगल से....

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