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चंदा मामा कभी उतरकर, धरती पर आ जाओ ना !

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चंदा मामा कभी उतरकर  धरती पर आ जाओ ना ! कैसे मामा हो मामा तुम ? नाता कुछ तो निभाओ ना ! मम्मी के भाई हो मामा ! बहन से मिलने आओ ना ! कभी हमें भी साथ ले जा के  तारों से मिलवाओ ना ! अपने होकर दूर क्यों इतने ? अपनेपन से आओ ना ! रसना, माजा, लिम्का, कोला जी भर के पी जाओ ना ! देखो कितने पर्व धरा पर आकर साथ मनाओ ना ! होली पे आकर के मामा ! रंग गुलाल लगाओ ना ! दीवाली पे पूजन करके, खील बताशे खाओ ना ! चरखी और अनार मजे से सबके साथ छुड़़ाओ ना ! करवाचौथ, ईद पे आके दर्शन आप कराओ ना ! खीर, पुए का भोग भी जी भर  बड़े मजे से खाओ ना ! चंद्रलोक के किस्से मामा ! आकर हमें सुनाओ ना । अपने घट, बढ़, छुप जाने के  राज हमें बतलाओ ना । आना-जाना करो ना मामा ! कुछ सम्बन्ध निभाओ ना ! अगुवानी को हम सब तत्पर, मामी भी संग लाओ ना  ! चंदा मामा कभी उतरकर,  धरती पर आ जाओ ना !               चित्र साभार pixabay से पढ़िए चाँद पर आधारित एक और रचना ●  🌜नन्हें चाँद की जिद्द🌛

कहाँ गये तुम सूरज दादा ? | सर्दी पर बाल कविता

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 परिचय सर्दी का मौसम आते ही ठंडी हवाएँ, घना कोहरा और धूप की कमी सभी को महसूस होने लगती है। ऐसे में बच्चों का मन भी सूरज की गर्माहट को याद करता है। प्रस्तुत बाल कविता में बच्चे सूरज दादा से मासूम शिकायत करते हैं कि वे देर से क्यों निकलते हैं और जल्दी क्यों छिप जाते हैं। हास्य, कल्पना और बाल-सुलभ जिज्ञासाओं से भरपूर यह कविता शीत ऋतु का सुंदर चित्र प्रस्तुत करती है। कहाँ गये तुम सूरज दादा ? क्यों ली अबकी छुट्टी ज्यादा ? ठिठुर रहे हैं हम सर्दी से, कितना पहनें और लबादा ? दाँत हमारे किटकिट बजते । रोज नहाने से हम डरते । खेलकूद सब छोड़-छाड़ हम, ओढ़ रजाई ठंड से लड़ते । क्यों देरी से आते हो तुम ? साँझ भी जल्दी जाते क्यों तुम ? अपनी धूप भी आप सेंकते, दिनभर यूँ सुस्ताते क्यों तुम ? धूप भी देखो कैसी पीली । मरियल सी कुछ ढ़ीली-ढ़ीली । उमस कहाँ गुम कर दी तुमने  जलते ज्यों माचिस की तीली । शेर बने फिरते गर्मी में । सिट्टी-पिट्टी गुम सर्दी में । घने कुहासे से डरते क्यों ? आ जाओ ऊनी वर्दी में ! निकल भी जाओ सूरज दादा । जिद्द न करो तुम इतना ज्यादा। साथ तुम्हारे खेलेंगे हम, लो करते हैं तुमसे वादा । कोहरे ...

ज्येष्ठ की तपिश और प्यासी चिड़िया बाल कविता|

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परिचय :- जेठ की तपती दोपहर और सूखते जलस्रोतों के बीच प्यासे पक्षियों की पीड़ा अक्सर अनदेखी रह जाती है। यह कविता उसी संवेदना को शब्द देती है, जहाँ नन्हीं सोनल पक्षियों की मौन पुकार सुनकर उनके लिए पानी और दाना रखने का छोटा लेकिन सुंदर प्रयास करती है। यह रचना केवल एक बाल कविता नहीं, बल्कि प्रकृति, दया और जीवों के प्रति प्रेम का संदेश भी है। अगर हम सभी अपनी छत या आँगन में थोड़ा सा पानी रख दें, तो कई नन्हीं जानों की प्यास बुझ सकती है। गर्मियों में छत पर रखा पानी अनेक पक्षियों की प्यास बुझा सकता है। सुबह की ताजी हवा थी महकी कोयल कुहू - कुहू बोल रही थी । घर के आँगन में छोटी सोनल अलसाई आँखें खोल रही थी । चीं-चीं कर कुछ नन्ही चिड़ियाँ सोनल के पास आई । सूखी चोंच उदास थी आँखें धीरे से वे यह बतलाई -- सुनो सखी ! कुछ मदद करोगी ? छत पर थोड़ा नीर रखोगी ? बढ़ रही अब तपिश धरा पर, सूख गये हैं सब नद-नाले । प्यासे हैं पानी को तरसते, हम अम्बर में उड़ने वाले । तुम पंखे ,कूलर, ए.सी. में रहते, हम सूरज दादा का गुस्सा सहते । झुलस रहे हैं, हमें बचालो ! छत पर थोड़ा पानी तो डालो ! जेठ महीना जब से आया, ...

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