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तन में मन है या मन में तन ? : एक आत्मचिंतन

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संक्षिप्त परिचय तन में मन है या मन में तन?" यह प्रश्न जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही गहन और रहस्यमय भी है।  मन कभी असीम विस्तार लेकर समस्त संसार में विचरण करने लगता है तो कभी सूक्ष्म होकर तन के भीतर ही कहीं सिमट जाता है। प्रस्तुत चिंतन मन की इसी मायावी प्रकृति, उसके प्रभाव और उसे समझने की मानवीय यात्रा को अभिव्यक्त करता है।                          ये मन भी न पल में इतना वृहद कि समेट लेता है अपने में सारे तन को, और हवा हो जाता है जाने कहाँ-कहाँ ! तन का जीव इसमें समाया उतराता उकताता जैसे हिचकोले सा खाता, भय और विस्मय से भरा, बेबस ! मन उसे लेकर वहाँ घुस जाता है जहाँ सुई भी ना घुस पाये, बेपरवाह सा पसर जाता है। बेचारा तन का जीव सिमटा सा अपने आकार को संकुचित करता, समायोजित करता रहता है बामुश्किल स्वयं को इसी के अनुरूप वहाँ जहाँ ये पसर चुका होता है सबके बीच।  लाख कोशिश करके भी ये समेटा नहीं जाता,  जिद्दी बच्चे सा अड़ जाता है । अनेकानेक सवाल और तर्क करता है समझाने के हर प्रयास पर , और अड़ा ही रहता है तब तक वहीं जब...

और एक साल बीत गया | समय और जीवन पर भावपूर्ण हिंदी कविता

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परिचय समय अपनी गति से निरंतर आगे बढ़ता रहता है और देखते ही देखते एक और साल हमारी जिंदगी से गुजर जाता है। ‘और एक साल बीत गया’ समय, उम्र, जीवन की भागदौड़ और आत्मचिंतन पर आधारित एक भावपूर्ण हिंदी कविता है। यह रचना हमें जीवन की दौड़ में कुछ पल ठहरकर अपने भीतर झाँकने, जो मिला है उसे सहेजने और संतोष के साथ जीवन जीने का संदेश देती है। प्रदत्त पंक्ति ' और एक साल बीत गया' पर मेरा एक प्रयास  और एक साल बीत गया  दिन मास पल छिन  श्वास तनिक रीत गया  हाँ ! और एक साल बीत गया ! ओस की सी बूँद जैसी उम्र भी टपक पड़ी  अंत से अजान ऐसी बेल ज्यों लटक खड़ी  मन प्रसून पर फिर से आस भ्रमर रीझ गया  और एक साल बीत गया ! साल भर चैन नहीं पाने की होड़ लगी  और, और, और अधिक संचय की दौड़ लगी  भान नहीं पोटली से प्राण तनिक छीज गया और एक साल बीत गया ! जो है सहेज उसे चैन की इक श्वास तो ले जीवन उद्देश्य जान सुख की कुछ आस तो ले    मन जो संतुष्ट किया वो ही जग जीत गया  और एक साल बीत गया ! निष्कर्ष हर बीतता हुआ साल हमें यह याद दिलाता है कि जीवन केवल अधिक पाने और जोड़ने...

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