जीवन, दर्शन और प्रकृति की सहज रागिनी — ‘माटी तेरा मोह न छूटा’
पुस्तक: माटी तेरा मोह न छूटा कवयित्री: जिज्ञासा सिंह विधा: गीत-संग्रह भूमिका एवं आभार जब कोई प्रिय मित्र अपनी आत्मानुभूति को शब्दों में पिरोकर आपको भेंट करता है, तो वह केवल एक पुस्तक नहीं होती, बल्कि उसके मन के अंतरंग कोनों की एक आत्मीय यात्रा होती है। मेरी स्नेही सखी जिज्ञासा सिंह ने अपना काव्य-संग्रह ‘माटी तेरा मोह न छूटा’ सप्रेम भेंट किया। इस आत्मीय उपहार के लिए मैं उनकी हृदय से आभारी हूँ। एक सखी के रूप में उनकी इस साहित्यिक उपलब्धि पर मुझे अपार हर्ष और गर्व है, वहीं एक पाठक और काव्य-अनुरागी के रूप में इस संग्रह ने मुझे भीतर तक स्पंदित किया। पुस्तक को पढ़ते हुए मेरे मन में जो भाव और विचार उभरे, उन्हीं को इस समीक्षा के माध्यम से पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास है। सृजन-प्रक्रिया और भावात्मक पृष्ठभूमि संग्रह का आरंभ अपनी पूजनीय माँ को समर्पित ‘आत्मकथ्य’ से होता है, जिसके पश्चात ‘सरस्वती-वंदना’ के माध्यम से कवयित्री अपनी काव्य-यात्रा को वाणी और विद्या की अधिष्ठात्री देवी के चरणों...