जीवन, दर्शन और प्रकृति की सहज रागिनी — ‘माटी तेरा मोह न छूटा’

              

           

माटी तेरा मोह न छूटा पुस्तक का कवर पृष्ठ

पुस्तक: माटी तेरा मोह न छूटा

कवयित्री: जिज्ञासा सिंह

विधा: गीत-संग्रह


भूमिका एवं आभार

जब कोई प्रिय मित्र अपनी आत्मानुभूति को शब्दों में पिरोकर आपको भेंट करता है, तो वह केवल एक पुस्तक नहीं होती, बल्कि उसके मन के अंतरंग कोनों की एक आत्मीय यात्रा होती है। मेरी स्नेही सखी जिज्ञासा सिंह ने अपना काव्य-संग्रह ‘माटी तेरा मोह न छूटा’ सप्रेम भेंट किया। इस आत्मीय उपहार के लिए मैं उनकी हृदय से आभारी हूँ।

एक सखी के रूप में उनकी इस साहित्यिक उपलब्धि पर मुझे अपार हर्ष और गर्व है, वहीं एक पाठक और काव्य-अनुरागी के रूप में इस संग्रह ने मुझे भीतर तक स्पंदित किया। पुस्तक को पढ़ते हुए मेरे मन में जो भाव और विचार उभरे, उन्हीं को इस समीक्षा के माध्यम से पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास है।


सृजन-प्रक्रिया और भावात्मक पृष्ठभूमि
संग्रह का आरंभ अपनी पूजनीय माँ को समर्पित ‘आत्मकथ्य’ से होता है, जिसके पश्चात ‘सरस्वती-वंदना’ के माध्यम से कवयित्री अपनी काव्य-यात्रा को वाणी और विद्या की अधिष्ठात्री देवी के चरणों में समर्पित करती हैं। कवयित्री स्पष्ट करती हैं कि उनके लिए गीत लेखन कोई योजनाबद्ध प्रक्रिया नहीं, बल्कि अंतर्मन से स्वतः प्रस्फुटित होने वाली अनुभूति है। बचपन में मातृ-वियोग की वेदना ने उनके भीतर जिस संवेदनशीलता को जन्म दिया, वही आगे चलकर उनकी काव्य-चेतना का आधार बनी।

तेरह वर्ष की अल्पायु से प्रवाहित यह काव्य-धारा जीवन के अनेक रंगों को अपने भीतर समेटती चली गई—भक्ति, प्रेम, विरह, प्रकृति, संघर्ष और जीजीविषा। उनके लिए गीत केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन के विविध क्षणों के आत्मीय साथी हैं।

संवेदना और काव्य-वैविध्य

देह-संसार का मोह और अध्यात्म

संग्रह का शीर्षक गीत ‘माटी तेरा मोह न छूटा’ देह की नश्वरता, सांसारिक मोह और मानवीय संबंधों की कसक को अत्यंत मार्मिक ढंग से सामने लाता है। माटी का मानवीकरण करते हुए कवयित्री उसे मानवीय संवेदनाओं से जोड़ देती हैं—

              “इस माटी ने उस माटी को

                 बारंबार पुकारा रह-रह

                तू सनाथ है मैं अनाथ री

               बाँह पकड़ ले मेरी, कर गह”


इन पंक्तियों में मिट्टी के माध्यम से जीवन, देह और संबंधों का मोह जैसे एक साथ मुखर हो उठता है।

वहीं ‘ब्रह्म का संवाद सुंदर’ और ‘आत्म का परिचय’ जैसी रचनाएँ भौतिक जगत से आगे आत्मा और ब्रह्मांडीय चेतना की ओर ले जाती हैं—

व्योम के समवेत स्वर में 
  नाद भीतर नाद बाहर”

यहाँ कवयित्री की दृष्टि बाहरी संसार से भीतर की यात्रा करती दिखाई देती है।

आशावादी दृष्टिकोण और नवसर्जन

‘टहनियाँ फूल से भरने लगी हैं’ निराशा और जड़ता से निकलकर नवजीवन और नवसर्जन की ओर बढ़ने का संदेश देती है—

बंजरों की झाड़ काटी
कंटकों की बाढ़ छाँटी
मृत पड़ी माटी जगाई
मरुधरा विकसित-हरित
खिलने लगी है
<


बंजर भूमि का हरित होना यहाँ केवल प्रकृति का परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन में पुनः जागते विश्वास और संभावनाओं का भी प्रतीक बन जाता है।

प्रकृति, ऋतु-सौंदर्य और जीजीविषा

‘मुदित मन मोहित मेह मल्हार’ और ‘सरस्वती-वंदना’ जैसे गीतों में शब्दों का नाद-सौंदर्य विशेष रूप से आकर्षित करता है। ‘घनन-घनन’, ‘छमक-छमक’ और ‘झूम-झूम’ जैसी ध्वनियाँ वर्षा और प्रकृति के उल्लास को श्रव्य एवं दृश्य दोनों अनुभवों में बदल देती हैं।

‘हवाओं से कहो’ में प्रकाश और अंधकार के माध्यम से आशा की सुंदर व्यंजना मिलती है—

“दूर तक बिखरी सुनहरी चाँदनी
साँझ परछन कर रही है नैन फाड़े…”


इसी भावभूमि को ‘एक दीपक जल रहा है’ में कवयित्री और अधिक सघन करती हैं। आँधियों के बीच जलता दीपक आशा, संघर्ष और जीवन-जिजीविषा का प्रतीक बन जाता है—

“आँधियों की बस्तियों में
एक दीपक जल रहा है
खा रहा झोंके अहर्निश
जूझता पल-पल रहा है”
dir="ltr">
विपरीत परिस्थितियों में भी प्रकाश बनाए रखने का यह संकल्प मनुष्य के धैर्य और जीवन के प्रति उसकी आस्था का सुंदर प्रतीक है।

स्त्री-मन, संघर्ष और स्वतंत्र चेतना

कवयित्री की रचनाओं में स्त्री-मन की आकांक्षाएँ और स्वतंत्र चेतना भी मुखर रूप से दिखाई देती हैं। ‘मेरा विश्व’ में सीमाओं से परे एक मुक्त आकाश की कल्पना है—

“एक मछली बादलों पर तैरती है 
 सरहदों पर पंख अपने फेरती है”


वहीं ‘काटते हैं पंख मेरे’ सामाजिक बंधनों और विसंगतियों के बीच अपने अस्तित्व को बचाए रखने के संघर्ष को स्वर देती है। ‘दृश्य से ज्योतिर्मयी पर्दा उठाओ’ जैसी रचनाओं में सामाजिक रूढ़ियों के प्रति प्रश्नाकुलता और सजग दृष्टि दिखाई देती है।

समय, संघर्ष और सामाजिक सरोकार

‘समय तुम देख लेना’ और ‘वह धरा-सा रंग मेरा’ में समय की गति और संघर्ष से उपजे धैर्य की परिपक्व अभिव्यक्ति मिलती है। दूसरी ओर ‘भीड़ पे एकांत भारी’, ‘एक तृण भी खोखला है’ और ‘राह में अनगिनत राह हैं अचंभित’ जैसे गीत समकालीन सामाजिक यथार्थ और विशेषकर भटकते युवा मन के प्रति कवयित्री की सजगता को सामने लाते हैं।

इस प्रकार संग्रह का संसार केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अपने समय और समाज से भी संवाद करता है।

भाषा-शैली और शिल्प

जिज्ञासा सिंह की भाषा सरल, तत्समयुक्त होते हुए भी प्रवाहमयी, सहज और संगीतात्मक है। गीतों में लयात्मकता के साथ भावों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति दिखाई देती है। अनुप्रास का सहज प्रयोग तथा दीपक, हवा, पंख, मरुधरा और माटी जैसे प्रभावशाली बिंब रचनाओं के भाव-संसार को अधिक सजीव बनाते हैं।

इन गीतों में प्रकाश और अँधेरे, आशा और निराशा तथा संघर्ष और संबल के बीच निरंतर एक जीवंत संवाद चलता दिखाई देता है। 

कहीं-कहीं तत्सम शब्दावली और दार्शनिक गंभीरता इतनी गहरी हो जाती है कि सामान्य पाठक को भाव के अंतिम छोर तक पहुँचने के लिए थोड़ा ठहरना पड़ता है। किंतु यही गहनता संग्रह के काव्यात्मक गाम्भीर्य को भी समृद्ध करती है और पाठक को पुनः पढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

निष्कर्ष एवं शुभकामनाएँ

71 से अधिक रचनाओं में विस्तृत ‘माटी तेरा मोह न छूटा’ केवल कवयित्री के अंतर्मन की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अपने समय, समाज, प्रकृति और जीवन-मूल्यों से संवाद करता हुआ एक संवेदनशील गीत-संग्रह है। इसमें मोह भी है और उससे मुक्त होने की आकांक्षा भी; पीड़ा भी है और उससे उबरने का संकल्प भी; अँधेरा भी है और उसके बीच निरंतर जलता हुआ दीपक भी।

इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके गीत पाठक को किसी दूर या काल्पनिक दुनिया में नहीं ले जाते, बल्कि उसके अपने अनुभवों, स्मृतियों और आसपास के जीवन से जोड़ते हैं। ‘माटी तेरा मोह न छूटा’ इसी अर्थ में संवेदनाओं, चिंतन और जीवनानुभवों का एक सहज एवं सुंदर प्रवाह है।

प्रिय सखी जिज्ञासा सिंह की इस काव्य-कृति की साहित्यिक यात्रा निरंतर आगे बढ़े और उनकी लेखनी इसी तरह जीवन, प्रकृति और मनुष्य की संवेदनाओं को स्वर देती रहे—इसी हार्दिक कामना के साथ उन्हें इस सुंदर कृति के लिए बहुत-बहुत बधाई और अनंत शुभकामनाएँ।



यदि आपको हिंदी साहित्य और पुस्तक-समीक्षाएँ पढ़ना पसंद है, तो मेरी अन्य पुस्तक समीक्षाएँ भी अवश्य पढ़ें।

● पुस्तक समीक्षा :- तब गुलमोहर खिलता है -

● पुस्तक समीक्षा - 'कासे कहूँ'

● पुस्तक समीक्षा - 'समय साक्षी रहना तुम'


टिप्पणियाँ

फ़ॉलोअर

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दर्द होंठों में दबाकर....

ब्लॉग से मुलाकात..बहुत दिनों बाद

नयी सोच

लेबल

कविता -हास्यव्यंग1 कहानी19 कह़ानी1 कहानीकविता1 कांवड़1 काव्य रचना1 कुण्डलिया छंद5 कुण्डलिया छन्द3 गजल10 गढ़वाली कविता एवं उसका हिन्दी रूपांतरण1 गढ़वाली गीत1 गर्मी पर कविता1 गर्मी पर बाल कविता1 गीत17 गीतात्मक कविता1 गुरु महिमा कविता2 गुरु महिमा पर दोहा मुक्तक1 घरेलू हिंसा1 चिड़िया1 चौपाई | पावस पर कविता | बरसात पर कविता | सावन | शिव भक्ति1 छंद कविता1 जल संरक्षण पर कविता1 जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग1 जीवन दर्शन1 दोहा मुक्तक3 दोहा-मुक्तक1 दोहे7 नवगीत15 नारी सम्मान1 नारी सशक्तिकरण1 पकौड़े1 परिवार1 पाँच लिंकों का आनंद स्थापना दिवस1 पारिवारिक कहानी2 पारिवारिक रिश्ते1 पावस पर कविता1 पुस्तक समीक्षा1 प्रकृति3 प्रकृति कविता3 प्रार्थना4 प्रेणादायक आलेख1 प्रेम कविता1 प्रेरक लघुकथा1 प्रेरणादायक कहानी1 प्रेरणादायक हिंदी कविता1 बरसात पर कविता2 बारिश पर गीत1 बाल कविता3 बुज़ुर्ग1 भक्ति कविता2 भगवान शिव2 भावनात्मक1 भावनात्मक रचना1 मन1 मनहरण घनाक्षरी2 मनहरण घनाक्षरी छंद5 महादेव1 महिला सशक्तिकरण1 महिला सशक्तिकरण पर प्रेरणादायक कहानी।1 माँ का त्याग1 माँ की ममता1 माता पिता1 माता-पिता1 मुक्तक3 मुहावरे पर आधारित लघुकथा1 मोबाइल की लत तकनीक डिजिटल जीवन1 रक्षाबंधन1 राम भक्ति1 रिश्ते2 रोला छंद2 लघु कथा2 लघु कहानी6 लघुकथा19 लेख3 वर्षा ऋतु2 वसंत पर कविता1 व्यंग कविता1 व्यंग लेख1 शरद ऋतु2 शराब की लत1 शिक्षक दिवस1 शिक्षा -परीक्षा1 शिक्षा-परीक्षा1 शिव भक्ति2 शिव महिमा1 शुभकामना कविता1 संघर्ष1 संवेदनाएँ1 संस्मरण2 संस्मरणात्मक लेख1 सकारात्मक सोच1 सच्ची घटना1 सद्गुरु1 समय1 समीक्षा2 सामाजिक कहानी1 सामाजिक लेख1 सावन1 साहित्य1 हाइबन1 हायकु3 हास्यव्यंग कविता1 हास्यव्यंग लघुकथाएं1 हिंदी कविता4 हिंदी कहानी1 हिंदी भावनात्मक कहानी1 हिंदी लघुकथा प्रेरक लघुकथा रिश्ते मनमुटाव संवाद जीवन दर्शन1 हिंदी लघुकथा माँ का त्याग प्रेरक लघुकथा प्रेरणादायक कहानी1 हिंदी लेख1 हिंदी साहित्य1 हिन्दी कविता1
ज़्यादा दिखाएं