‘समय साक्षी रहना तुम’ : रेणु बाला के काव्य-संग्रह की पुस्तक समीक्षा
परिचय
‘समय साक्षी रहना तुम’ रेणु बाला जी का काव्य-संग्रह है, जिसमें जीवन, रिश्तों, प्रकृति और प्रेम की अनेक संवेदनाएँ सहज और भावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त हुई हैं। इस पुस्तक में कवयित्री की संवेदनशील दृष्टि के साथ मानवीय मन के विविध भावों की सुंदर झलक मिलती है। प्रस्तुत समीक्षा में इसी भाव-संसार को समझने का एक विनम्र प्रयास है।
'‘समय साक्षी रहना तुम’ : पुस्तक का परिचय
समय साक्षी रहना तुम
विधा – कविता-संग्रह
रचनाकार – रेणु बाला जी
अतल गहराइयों में आत्मा की
जो भरेगा उजास नित-नित,
गुजर जायेंगे दिन-महीने,
ना होगा आँखों से ओझल किंचित।
हो न जाऊँ तनिक मैं विचलित,
प्राणों में धीरज भर देना तुम।
अपने अनंत प्रवाह में बहना तुम,
पर समय साक्षी रहना तुम!!
‘समय साक्षी रहना तुम’ रेणु बाला जी का प्रथम काव्य-संग्रह है, जिसमें उनकी संवेदनशील दृष्टि और जीवन के विविध अनुभवों की अभिव्यक्ति दिखाई देती है। ब्लॉग जगत से साहित्यिक लेखन की ओर बढ़ती उनकी रचनात्मक यात्रा का यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
पुस्तक का आवरण आकर्षक है। प्रथम पृष्ठ पर लेखिका ने इसे अपने बड़ों को समर्पित करते हुए उन्हें अपने जीवन का जीवट और सशक्त स्तंभ बताया है। यह समर्पण उनके पारिवारिक संस्कारों और अपने बड़ों के प्रति सम्मान की भावना को भी दर्शाता है।
तदन्तर विश्वमोहन जी की भूमिका पुस्तक के भाव-पक्ष और रचनात्मक संदर्भ को समझने में सहायक है। साथ ही, अन्य ब्लॉगर साथियों के आत्मीय उद्गार भी पुस्तक से जुड़े पाठकीय संबंध को सामने रखते हैं।
विषय-सूची को चार भागों में विभाजित किया गया है। माँ सरस्वती की वंदना से आरंभ होने वाले इन भागों में रिश्तों के स्नेहिल बंधन, कुदरत के पैगाम, भाव-प्रवाह और समसामयिक विषयों से जुड़ी रचनाएँ शामिल हैं। सहज और सरल भाषा में लिखी गई कुल 65 रचनाएँ इस संग्रह के विविध भाव-पक्षों को सामने रखती हैं।
प्रथम भाग में कवयित्री ने देश की संस्कृति और संस्कारों के अनुरूप माँ सरस्वती के साथ-साथ पूज्य गुरुदेव, अपने गाँव, देश के प्रहरी हिमालय और देश की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीदों का भी वंदन किया है।
इन रचनाओं में अपनी संस्कृति, जन्मभूमि और देश के प्रति सम्मान की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। भारतीय परंपरा में प्रकृति और अपनी माटी के प्रति जुड़ाव को विशेष महत्व दिया गया है। पेड़-पौधों, पर्वतों, नदियों और समस्त चर-अचर सृष्टि में ईश्वर की उपस्थिति देखने की यह दृष्टि हमारी सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
कवयित्री ने अपनी रचनाओं के माध्यम से इसी सांस्कृतिक चेतना और श्रद्धा को सहज शब्दों में अभिव्यक्त किया है।
हमारे ग्रंथों और इतिहास में भी प्रकृति तथा अपनी माटी के प्रति सम्मान की भावना के अनेक उदाहरण मिलते हैं। पेड़-पौधों, पर्वतों, नदियों और समस्त चर-अचर सृष्टि के प्रति आदर हमारी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा रहा है।
फिर बेटी के लिए तो मायके से जुड़ाव की अपनी ही अनुभूति होती है। अपने गाँव की वंदना में कवयित्री केवल गाँव की माटी ही नहीं, बल्कि वहाँ की सुबह-शाम और अपने गाँववासियों की खुशहाली की भी कामना करती हैं। उनकी इन पंक्तियों में मायके और जन्मभूमि के प्रति आत्मीय लगाव सहज रूप से उभरता है—
ना आये बला कोई ना हो कभी बेहाल तू
ले बेटी की दुआ सदा रहे खुशहाल तू
रौशन रहे उजालों से सुबह शामें तेरी
अपनी चौखट पे सजा खुशी की ताल तू
लहराती रहें हरी फसलें तेरी
मुरझाये ना कभी हरियाला सावन तेरा
तुझसे अलग कहाँ कोई परिचय मेरा?
तेरे संस्कारों में पगा तन-मन मेरा!!!
रिश्तों की संवेदना और आत्मीयता
सभी पूजनीयों के वंदन के बाद दूसरे भाग में जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से—हमारे रिश्तों—से जुड़ी रचनाएँ हैं। इनमें माँ-बेटी, परिवार और अन्य आत्मीय संबंधों की भावनाओं को सहज शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है।
माँ बनकर ही मैंने
तेरी ममता को पहचाना है
माँ-बेटी का दर्द का रिश्ता
क्या होता ये जाना है
इन रचनाओं में माँ-बेटी, पिता, भाई, संतान, बुजुर्ग और दांपत्य जैसे विभिन्न रिश्तों की भावनाएँ दिखाई देती हैं। ‘स्मृति शेष पिताजी’, ‘बिटिया’, ‘ये तेरी मुस्कान लाडली’, ‘धीरे-धीरे पग धरो सजनिया’, ‘नवजात शिशु के लिए’, ‘ओ नन्हें शिशु’, ‘नन्हे बालक’, ‘जिस पहर से’, ‘बूढ़े बाबा’, ‘भाई! तुम हो अनमोल’ और ‘घर से भागी बेटी के नाम’ जैसी रचनाएँ रिश्तों के अलग-अलग भाव-पक्षों को सामने लाती हैं। इनमें स्नेह, अपनापन, ममता और चिंता के भाव सहज रूप से उभरते हैं, जिससे पाठक अपने अनुभवों से भी इन भावनाओं को जोड़ सकता है।
कुदरत के पैगाम : प्रकृति और जीवन
तीसरे भाग ‘कुदरत के पैगाम’ में प्रकृति से जुड़ी रचनाएँ शामिल हैं। प्रकृति की सुंदरता, उसके विविध रूप और उससे जुड़े मानवीय अनुभवों को कवयित्री ने अपनी रचनाओं में स्थान दिया है। प्रकृति को देखने की उनकी दृष्टि केवल उसके बाहरी सौंदर्य तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसके माध्यम से जीवन के विभिन्न भावों को भी अभिव्यक्ति मिलती है।
‘बादल आवारा हैं पर उपकारी हैं’—इस कविता में बादलों के आवारापन के साथ उनकी उपयोगिता को भी रेखांकित किया गया है। धरती के सृजन और सौंदर्य में वर्षा की भूमिका को कवयित्री ने सहज भाव से प्रस्तुत किया है।
इसके अलावा ‘ओ, री तितली!’, ‘सुनो गिलहरी!’, ‘पेड़ ने पूछा चिड़िया से’, ‘आई आँगन के पेड़ पे चिड़िया’, ‘चलो नहाएँ बारिश में’, ‘ओ शरद पूर्णिमा के शशि नवल!’, ‘चाँद फागुन का’, ‘मरुधरा पर’ और ‘गाय बिन बछड़ा’ जैसी रचनाओं के माध्यम से प्रकृति के अलग-अलग रूप सामने आते हैं। इन रचनाओं में प्रकृति के प्रति आकर्षण के साथ उसके विभिन्न रूपों और गतिविधियों का सहज चित्रण दिखाई देता है।
प्रेम और भावनाओं की रचनाएँ
अब चौथे एवं अंतिम भाग में प्रेम और उससे जुड़ी भावनाओं को अभिव्यक्ति मिली है। इस भाग की रचनाओं में प्रेम, मिलन, विरह और मन के संवाद जैसे भाव दिखाई देते हैं।
सब कुछ था पास मेरे
फिर भी कुछ ख्वाब अधूरे थे
तुम संग जो बाँटे,
मन के संवाद अधूरे थे
जीवन से ओझल साथी
ये उमंगों के सिलसिले थे
जब हम तुमसे ना मिले थे।।
इसके आगे ‘चाँदनगर-सा गाँव तुम्हारा’ जैसी रचना प्रिय से जुड़े एक कल्पनालोक को सामने लाती है। वहीं ‘मिलन की रात’ में चाँद को साक्षी बनाकर प्रेम के मिलन का भाव उभरता है। मिलन के बाद आने वाला बिछोह भी इन रचनाओं का महत्वपूर्ण पक्ष है। ‘तुम्हारे दूर जाने पर’ में दूरी की अनुभूति, ‘राह तुम्हारी तकते-तकते’ में प्रतीक्षा और ‘मन पाखी की उड़ान’ में प्रिय के इंतजार से उपजी मनःस्थिति को अभिव्यक्ति मिली है।
इसी क्रम में ‘निःशब्द हो सहेज लेना’ में प्रेम के साथ स्मृति, अपनापन और साथ बने रहने की इच्छा दिखाई देती है—
निःशब्द हो सहेज लेना
अक्षय स्नेहकोश मेरा
याद रखना ये स्नेहिल पल
भुला देना हर दोष मेरा,
दूर आँखों से हो जाओ
ये सजा कभी मत देना तुम
मेरे साथ यूँ ही रहना तुम
कभी अलविदा ना कहना तुम!!
इन पंक्तियों में प्रिय के साथ बिताए पलों को सहेजकर रखने और दूरी के बावजूद संबंध की आत्मीयता बनाए रखने की भावना व्यक्त हुई है। संग्रह की प्रेमपरक रचनाएँ इसी तरह प्रेम के विभिन्न मनोभावों को अपने-अपने ढंग से सामने लाती हैं।
समग्र रूप से देखें तो ‘समय साक्षी रहना तुम’ में रिश्तों, प्रकृति, संस्कारों, देश-समाज और प्रेम जैसे विविध विषयों से जुड़ी रचनाएँ शामिल हैं। सहज भाषा में लिखी गई इन कविताओं में कवयित्री के अनुभवों और भावनात्मक संवेदनाओं की झलक मिलती है। पाठक इन रचनाओं में अपने अनुभवों और संवेदनाओं से जुड़े कुछ भावों को भी पहचान सकता है।
अंत में पुस्तक की ये पंक्तियाँ प्रेम और आत्मीय जुड़ाव की उस भावना को समेटती हैं, जिसमें दूरी के बाद भी संबंध के बने रहने की कामना है—
रहेगी ये खुमारी
मिटेगी हर दुश्वारी
भले ना जुड़ सके हम
जुड़ेंगी रूहें हमारी
और फिर मिलेंगे
जीवन के पार
रेणु बाला जी को इस काव्य-संग्रह के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। कामना है कि उनकी लेखनी इसी तरह जीवन, रिश्तों और प्रकृति से जुड़े भावों को शब्द देती रहे और उनकी रचनात्मक यात्रा निरंतर आगे बढ़ती रहे।
— समीक्षक
सुधा देवरानी
पुस्तक प्राप्ति हेतु:
कृपया निम्न लिंक पर संपर्क करें—
http://samaysakshibook.ultrafunnels.in/
बेहतरीन,विस्तृत एवं सटीक समीक्षा लिखी है आपने प्रिय सुधा जी।
जवाब देंहटाएंरेणु दी की पुस्तक के हर भाग को कितनी सूक्ष्मता से आपने उकेरा है सजीव हो उठे सारे पृष्ठ।
निश्चित ही रेणु दी का प्रथम काव्य संग्रह बेशकीमती है।
यूँ तो संग्रह की सारी रचनाएँ बहुत अच्छी लगी पर
मुझे बाल कविताओं और प्रेम की भावपूर्ण रचनाओं वाला भाग विशेष रूप से पसंद आया।
आपकी समीक्षा रूचिकर लगी बहुत सारी बधाई स्वीकार करें मेरी।
सस्नेह।
अत्यंत आभार एवं धन्यवाद प्रिय श्वेता जी!सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन हेतु ।आपको समीक्षा रूचिकर लगी तो श्रम साध्य हुआ।
हटाएंरेणु जी की पुस्तक की प्रतीक्षा तो दीर्घकाल से थी। अब पूर्ण हुई है। इसे शीघ्रातिशीघ्र पढ़ना है। आपकी समीक्षा न केवल पुस्तक का एक विहंगम दृश्य प्रस्तुत करती है वरन ऐसी जिज्ञासा जगाती है इसके प्रति कि इसका पाठक इस काव्य-पुस्तक का पारायण किए बिना रह ही न सके।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत सुन्दर सरस समीक्षा
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आ.आलोक जी!
हटाएंहार्दिक धन्यवाद आ.जितेन्द्र जी! प्रोत्साहन हेतु...समीक्षा की तरफ अपना ये प्रथम प्रयास है आप जैसे प्रबुद्ध समीक्षक की सराहना और समर्थन पाकर तसल्ली मिल रही है...
जवाब देंहटाएंसादर आभार।
पुस्तक की विस्तृत व्याख्या । आपके लिखे पुस्तक परिचय ने पाठक को पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित कर दिया है । रेणु की प्रथम काव्य पुस्तक के लिए उसको ढेर सारी बधाई ।
जवाब देंहटाएंआपके द्वारा दिये सुंदर परिचय के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ ।
तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आ.संगीता जी! अभिभूत हूँ आपकी सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया पाकर।बहुत बहुत शुक्रिया।
हटाएंप्रिय सुधाजी साधुवाद सहित हृदय से बधाई , रेणु बहन की पुस्तक की आपने जिस ढंग से समीक्षा की है वो सचमुच प्रसंशा के योग्य है,ऐसा लगता है किसी पुस्तक के प्राण तत्वों पर किसी कुशल शिल्पकार ने सुनहरी नक्काशी कर के बहुमूल्य रत्नों से सजाया हो।
जवाब देंहटाएंपुनः बधाई आपकी अप्रतिम समीक्षा के लिए।
प्रिय रेणु बहन के लेखन की मैं सदा से प्रसंशक रही हूँ उनकी लेखनी में निर्मल सरिता का प्रवाह हैं, संगीत है खनक है ।
रेणु बहन आपका संग्रह "समय साक्षी रहना तुम" साहित्य जगत में धूम मचा दे यही कामना है और
समय साक्षी रहेगा इसका।
रेणु बहन आपको आपके पहले संग्रह की सफलता के लिए अनंत बधाई,हार्दिक शुभकामनाएं ।
सस्नेह।
तहेदिल से धन्यवाद आ.कुसुम जी ! आपकी प्रशंसा पाकर अभिभूत हूँपहली बार लिखी मेरी इस समीक्षा में मुझे संशय था कि इस अमूल्य निधि के मूल्यांकन को मेरी लेखनी कोई कसर न कर दे...।आप जैसे महानुभवियों के उत्साहवर्धन से प्रोत्साहित हूँ । दिल से आभार आपका।🙏🙏🙏🙏
हटाएंप्रिय सुधा जी, मेरी पुस्तक की भावपूर्ण समीक्षा कर आपने जो पुस्तक की व्याख्या कर रचनाओं के मर्म को पहचाना है , उसके लिए आपका आभार प्रकट करूँ तो इस निश्छल स्नेह की गरिमा खंडित हो जायेगी | हालांकि, हर रचनाकार को अपनी हर रचना शिशुवत होती है और सबके लिए प्रेम होता है पर फिर ही कुछ रचनाएं बहुत ख़ास होती हैं | आपने अपनी अद्भुत मेधा-शक्ति से सदैव ही मेरी रचनाओं का मर्म पहचाना है आज पैंसठ रचनाओं में से आपने वही रचनाएं छाँटी हैं, जो हर लगभग हर पाठक की पसंद रही |सच कहूँ, तो ये रचनाएँ आभासी जगत के प्रांगण में जन्मी और पनपी,सो ये एक कालखंड विशेष की साक्षी हैं |मेरे पास ना छन्द थे ना अलंकार और ना रसाभिव्यक्ति की योग्यता | या फिर कविता की कोई विशेष दक्षता | फिर भी मेरे लेखन को मान देकर मेरे सुधि और उदारमना स्नेही पाठकों ने असाधारण बना दिया जिसके लिए उनकी ऋणी रहूंगी | पुस्तक से जुड़े आपके निष्कलुष भाव अनायास मन और आँखें दोनों नम कर गये | मेरा हार्दिक स्नेह और शुभकामनाएं आपके लिए |
जवाब देंहटाएंहृदयतल से अभिनंदन आपका प्रिय रेणु जी! आपकी सभी रचनाएं सराहनीय हैं
हटाएंआपको समीक्षा अच्छी लगी मेरा श्रम साध्य हुआ। आपके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूँ
बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।
प्रिय श्वेता , प्रिय कुसुम बहन ,आदरणीय आलोक जी , प्रिय संगीता दीदी , आदरणीय जितेद्र जी, पग-पग पर आप लोगों के स्नेह और नैतिक सहयोग ने मेरा मनोबल बढ़ाया है और लेखनी को अपार शक्ति दी है | आज आभार शब्दों में नहीं समाता | सभी का सस्नेह अभिनन्दन और अभिवादन |
जवाब देंहटाएंआपकी इस विलक्षण समीक्षा पर मेरे मन के अनुराग को 'मन की वीणा' ने पहले ही झंकृत कर दिया है। अद्भुत विवेचना। सादर नमन।
जवाब देंहटाएंआपके प्रोत्साहन की इस अद्भुत कला को नमन।अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ.विश्वमोहन जी!
हटाएंबढ़िया समीक्षा
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.मुकेश जी !
हटाएंकुसुम जी की बातों से मैं भी पुरी तरह सहमत हूं सुधा जी, आपकी लेखनी से प्रिय रेणु की कविताओं में चार चांद लग गए। प्रिय रेणु की पुस्तक समीक्षा लिखने की मेरी भी दिली ख्वाहिश थी पर इन दिनों कुछ परिस्थितियों में बुरी तरह उलझी हूं।सो लिख नहीं पाईं और मेरी ये ख्वाहिश अधुरी ही रह गई।
जवाब देंहटाएंआप दोनों को मेरा ढ़ेर सारा स्नेह और शुभकामनाएं 🙏
तहेदिल से धन्यवाद कामिनी जी!आपकी सराहना पाकर प्रोत्साहित हूँ।भगवान से प्रार्थना करूंगी कि वे आपकी उलझने शीघ्र सुलझाएं आगे परिस्थितियाँ आपके अनुकूल हो...
हटाएंसस्नेह आभार।
वाह ! सुधाजी आपकी कहानी, कविता तो पढ़ती थी, परंतु आज रेणु जी की पुस्तक की सुंदर,सरस और सारगर्भित समीक्षा पढ़ने का अवसर मिला,बहुत सुंदर अहसास होता है, जब आप और रेणु जी जैसी विदुषी अपनी बहनों का साथ हो, मैं भी रेणु जी की इस काव्ययात्रा की साक्षी हूं और उनके लिए निरंतर असीम शुभकामनाएं प्रेषित करती हूं 💐💐🙏🙏
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद जिज्ञासा जी! निरन्तर सहयोग हेतु दिल से आभार।
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