शुक्रवार, 8 मई 2020

गीत-- शीतल से चाँद का क्या होना



Different phases of moon

               

इस गरम मिजाजी दुनिया में
शीतल से चाँद का क्या होना
कुछ दिन ही सामना कर पाता
फिर लुप्त कहीं छुप छुप रोना

जस को तस सीख न पाया वो
व्यवहार कटु न सह पाता
क्रोध स्वयं पीकर अपना
निशदिन ऐसे घटता जाता
निर्लिप्त दुखी सा बैठ कहीं
प्रभुत्व स्वयं का फिर खोना
इस गरम मिजाजी दुनिया में
शीतल से चाँद का क्या होना

स्वामित्व दिखाने को जग में
कड़वा बनना ही पड़ता है
सूरज जब ताप उगलता है
जग छाँव में तभी दुबकता है
अति मीठे गुण में गन्ने सा
कोल्हू में निचोड़ा नित जाना
इस गरम मिजाजी दुनिया में
शीतल से चाँद का क्या होना
         
               चित्र साभार गूगल से...

38 टिप्‍पणियां:

Anuradha chauhan ने कहा…

इस गरम मिजाजी दुनिया में
शीतल से चाँद का क्या होना।वाह बेहतरीन नवगीत सखी 👌

मन की वीणा ने कहा…

वाह बहुत सुंदर सुधा जी श्री व्यंजनाएं नये भाव ।
बहुत सुंदर गीत।

Sudha Devrani ने कहा…

आभारी हूँ सखी!सहृदय धन्यवाद आपका सुन्दर उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु..।

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार कुसुम जी!उत्साहवर्धन हेतु।

अनीता सैनी ने कहा…

वाह !लाजवाब सृजन सखी 👌

शैलेन्द्र थपलियाल ने कहा…

बहुत खूब

Ritu asooja rishikesh ने कहा…

इस गरम मिजाजी दुनिया में
शीतल से चांद का क्या होना
सुन्दर प्रस्तुति सुधा जी

Sudha Devrani ने कहा…

आभारी हूँ रितु जी! बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

Sudha Devrani ने कहा…

सस्नेह आभार भाई!

Sudha Devrani ने कहा…

आभारी हूँ अनीता जी बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

Dr. pratibha sowaty ने कहा…

सुंदर रचना है सुधा जी

Sudha Devrani ने कहा…

आभारी हूँ प्रतिभा जी! बहुत बहुत धन्यवाद आपका।
ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

Meena Bhardwaj ने कहा…

अति मीठे गुण में गन्ने सा
कोल्हू में निचोड़ा नित जाना
इस गरम मिजाजी दुनिया में
शीतल से चाँद का क्या होना...
बेहतरीन व लाजवाब नवगीत👌👌👌👌

Jyoti khare ने कहा…

बहुत सुंदर गीत

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक आभार एवं धन्यवाद मीना जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार सर!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अच्छे से बुनी है राचना ... चाँद के एक पहलू और सूरज के चरित्र और भाव को दर्शाती लाजवाब रचना ...
पर चाँद अपना स्वभाव नहीं छोड़ने वाला ... रात भी उसके साथ है तभी तो शीतल है ...

hindiguru ने कहा…

आप की रचना विपरीत गुणों के विरोधभास को बखूबी बयान करती है चांद और सूरज एक शीतल और एक गरम

Sudha Devrani ने कहा…

आभारी हूँ नासवा जी!आपके निरन्तर सहयोग एवं उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु...
हृदयतल से धन्यवाद।

Sudha Devrani ने कहा…

सुन्दर सारगर्भित समीक्षा हेतु हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आपका hindi guru.
ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत सुंदर सृजन, सुधा दी।

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(१६-०५-२०२०) को 'विडंबना' (चर्चा अंक-३७०३) पर भी होगी
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
**
अनीता सैनी

लोकेश नदीश ने कहा…

बहुत उम्दा

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद अनीता जी!मेरी रचना को मंच पर स्थान देने हेतु...
सस्नेह आभार।

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार, लोकेश जी !

Kamini Sinha ने कहा…

इस गरम मिजाजी दुनिया में
शीतल से चाँद का क्या होना

बहुत खूब ,बिलकुल सही कहा आपने ,लाज़बाब सृजन ,सादर नमन सुधा जी

Onkar ने कहा…

बहुत बढ़िया

~Sudha Singh vyaghr~ ने कहा…

स्वामित्व दिखाने को जग में
कड़वा बनना ही पड़ता है
सूरज जब ताप उगलता है
जग छाँव में तभी दुबकता है....यथार्थ....बात बिल्कुल सही है सुधा जी कई बार परिस्थितियों के आगे विवश हो मनुष्य कड़वा बन जाता है।
सुंदर गीत👌👌👌👌

sriram ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद, कामिनी जी!
उत्साह वर्धन हेतु।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक आभार ओंकार जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार सुधा जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद श्रीराम जी!
ब्लॉग पर आपका स्वागत है
सादर आभार।

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

अनूठी कल्पना!

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आदरणीया प्रतिभा जी !

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

बहुत ही अच्छी रचना हुयी सुधा जी

कुछ दिन ही सामना कर पाता
फिर लुप्त कहीं छुप छुप रोना

खासक ये पंक्तियाँ। .तो यह जैसे मेरे लिए लिखी हो। ..कुछ दिन सामना करती हूँ विषैले लोगों का फिर। .छुप क्र बैठ जाती हूँ

जस को तस सीख न पाया वो
व्यवहार कटु न सह पाता
क्रोध स्वयं पीकर अपना
निशदिन ऐसे घटता जाता
निर्लिप्त दुखी सा बैठ कहीं


जो मन से साफ़ और सच्चे होते हैं उनके साथ अक्सर युहीं होता हे ,..

पूरी रचना में खुद को देख पा रही हूँ मैं
बहुत धन्यवाद

Sudha Devrani ने कहा…

जी जोया जी! मन के साफ और सीधे सच्चे लोंगो को यहाँ ऐसी ही मुसीबतों का सामना करना पड़ता है....
रचना का सारांश स्पष्ट करने और सुन्दर सराहनीय प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन करने हेतु बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार आपका।

संजय भास्‍कर ने कहा…

इस गरम मिजाजी दुनिया में
शीतल से चाँद का क्या होना

बहुत खूब ,बिलकुल सही कहा

जिसमें अपना भला है , बस वो होना है

जब से खुद को खुद सा ही स्वीकार किया हाँ औरों से अलग हूँ, खुद से प्यार किया । अपने होने के कारण को जब जाना । तेरी रचनात्मकता को कुछ पहचाना । ...