आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया | भावपूर्ण हिंदी कविता
परिचय (Introduction)
कभी-कभी हम अपनों की खुशियों के लिए इतना कुछ सहते रहते हैं कि स्वयं को भूल जाते हैं। समय बीतने के बाद जब सचाई का एहसास होता है, तब पछतावे के अलावा बहुत कुछ हाथ नहीं आता। प्रस्तुत कविता "आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया" जीवन, रिश्तों, त्याग और आत्मबोध की ऐसी ही मार्मिक अनुभूति को शब्द देती है ।
"रिश्तों में त्याग, आत्मबोध और जीवन के बदलते मौसमों पर आधारित हिंदी कविता"
की जो नादानियाँ तब
खुद पे अब तरस आया
आज मौसम का रुख,
जब उसे समझ आया
तप्त तो था मौसम
वो कड़वी दवा पीती रही
वजह बेवजह ही
खुद को सजा देती रही
सजा-ए-दर्द सहे मन
भी बहुत पछताया
आज मौसम का रुख
जब उसे समझ आया
हाँ ! मौसम की ये फितरत
ना समझ पाती थी
उसकी खुशियों के खातिर
कुछ भी कर जाती थी
उसकी गर्मी और सर्दी में
खुद को उलझाया
आज मौसम का रुख
जब उसे समझ आया
दी सजाएं जो रोग बनके
तन में पलती रही
नैन बरसात से बरसे
ये उम्र ढ़लती रही
कुछ सुहाना हुआ मौसम
पर न अब रास आया
आज मौसम का रुख
जब उसे समझ आया।
सुख में दुःख में जो न सम्भले
वो दिन रीत गये
सर्दी गर्मी और बरसात के
दिन बीत गये
ढ़ल गयी साँझ, देखो अब
रात का तमस छाया
की जो नादानियाँ तब
खुद पे अब तरस आया।
आज मौसम का रुख
जब उसे समझ आया
निष्कर्ष (Conclusion)
जीवन के बदलते मौसम हमें बहुत कुछ सिखाते हैं। दूसरों के लिए जीना सुंदर है, लेकिन स्वयं को खो देना नहीं। यह कविता हमें याद दिलाती है कि समय रहते अपने मन, अपने स्वास्थ्य और अपनी खुशियों का भी ध्यान रखना आवश्यक है, क्योंकि बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता।
✨धन्यवाद🙏
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जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना शुक्रवार २४ जुलाई २०२० के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।
हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी! पांच लिंको के आनंद मंच पर मेरी रचना साझा करने हेतु।
हटाएंकई बार बहुत देर हो जाती है जब तक इंसान समझ पाता है ...
जवाब देंहटाएंशायद इसलिए ही कहते हैं कुछ समय ख़ुद के लिए भी बचाना चाहिए ...
बहुत गहरी सोच से जन्मी रचना .।.
जी नासवा जी, हार्दिक धन्यवाद आपका
हटाएंउत्साहवर्धन हेतु...
सादर आभार।
कई बार इंसान को जब अपनी गलतियां समझ मे आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। भयत सुंदर अभिव्यक्ति सुधा दी।
जवाब देंहटाएंजी, ज्योति जी! हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आपका।
हटाएंदी सजाएं जो रोग बनकर तन में पलती रही
जवाब देंहटाएंनैन बरसात से बरसी उम्र ढलती रही
खुद पर तरस आया जब मौसम का रुख समझ आया
सुन्दर भाव सृजन
बहुत बहुत धन्यवाद रितु जी!उत्साहवर्धन हेतु.....
हटाएंसस्नेह आभार।
वाह
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद एवं आभार जोशी जी !
हटाएंबहुत सुंदर रचना, गहरी सोच को सामने लाती पंक्तियां
जवाब देंहटाएंसादर
हृदयतल से धन्यवाद अपर्णा जी!बहुत दिनों बाद आपको यहाँ देख अत्यंत खुशी हुई....सस्नेह आभार।
हटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार (२५-०७-२०२०) को 'सारे प्रश्न छलमय' (चर्चा अंक-३७७३) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
--
अनीता सैनी
हार्दिक धन्यवाद अनीता जी सहयोग हेतु
हटाएंसस्नेह आभार।
बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद एवं आभार ओंकार जी!
हटाएंवाह बेहतरीन रचना सखी
जवाब देंहटाएंअत्यंत आभार एवं धन्यवाद सखी!
हटाएंखूबसूरत सृजन |
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद एवं आभार आदरणीय
हटाएंब्लॉग पर आपका स्वागत है।