शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

"पुष्प और भ्रमर"




"पुष्प और भ्रमर" (myth on a flower)

तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा........
प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया
तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ.....
अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया ।

हमेशा रहोगे तुम साथ मेरे...।.
बसंत अब हमेशा खिला ही रहेगा
तुम मुस्कुराये तो मैंं खिलखिलाई......
ये सूरज सदा यूँ चमकता रहेगा ।

न आयेगा पतझड़ न आयेगी आँधी.......
मेरा फूलमन यूँ ही खिलता रहेगा
तुम सुनाते रह़ोगे तराने हमेशा....
और मुझमें मकरन्द बढता रहेगा

तुम्हें और जाने की फुरसत न होगी.....
मेरा प्यार बस यूँ ही फलता रहेगा ।।

           "मगर अफसोस" !!!

तुम तो भ्रमर थे मै इक फूल ठहरी......
वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ?
मैंं पलकें बिछा कर तेरी राह देखूँ.....                      
ये इन्तजार अब यूँ ही चलता रहेगा ।

मौसम में जब भी समाँ लौट आये.....
मेरा दिल हमेशा तडपता रहेगा .........


*कि ये "शुभ मिलन" अब पुनः कब बनेगा*
   
                              चित्र साभार गूगल से                       

  ...सुधा देवरानी*







                                                   

             




22 टिप्‍पणियां:

Anuradha chauhan ने कहा…

बेहद खूबसूरत रचना सखी 👌

Unchaiyaan.blogpost.in ने कहा…

पुष्प और भ्रमर सुन्दर चित्रण

anita _sudhir ने कहा…

गजब चित्रण आ0

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा ने कहा…

आपकी लेखनी को नमन । आज वो गीत भी याद आ गई "भँवरे ने खिलाया फूल, फूल को वे गए राज कुंवर....."
तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा........
प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया
तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ.....
अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया ।
शुभकामनाएँ ....व बधाई

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद सखी उत्साहवर्धन हेतु
सस्नेह आभार...।

Sudha Devrani ने कहा…

सहृदय धन्यवाद रितु जी !
सस्नेह आभार...।

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद अनीता जी !
सादर आभार...।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद, पुरुषोत्तम जी ! उत्साहवर्धन हेतु...
सादर आभार।

विश्वमोहन ने कहा…

बहुत सुंदर रचना।

Sudha Devrani ने कहा…

आभारी हूँ विश्वमोहन जी! बहुत बहुत धन्यवाद आपका...।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत सुंदर रचना, सुधा दी।

Sudha Devrani ने कहा…

सहृदय धन्यवाद ज्योति जी !

Anchal Pandey ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (28-02-2020) को धर्म -मज़हब का मरम (चर्चाअंक -3625 ) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
*****
आँचल पाण्डेय

Sudha Devrani ने कहा…

तहेदिल से धन्यवाद आँचल जी मेरी रचना को मंच पर साझा करने हेतु.....
सस्नेह आभार।

व्याकुल पथिक ने कहा…

विचित्र संसार है, यदि भंवरे पुष्प से हटे नहीं तो ऐसा भी होता है कि सूर्यास्त के समय जब फूलों की पंखुड़ियाँँ आपस में सिकुड़ जाती हैं ,तो बेचारा भंवरा भी उसके अंदर ही प्रातः काल की प्रतीक्षा में दम तोड़ देता है।
सुंदर भावपूर्ण सृजन ,आपको नमन।

Alaknanda Singh ने कहा…

तुम तो भ्रमर थे मैं इक फूल ठहरी......
वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ? ....सद‍ियों से चली आ रही ये एक शाश्वत स्थ‍ित‍ि है, इसपर बहुत ही गज़ब का ल‍िखा है सुधा जी

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद शशि जी !
सादर आभार...।

Sudha Devrani ने कहा…

तहेदिल से धन्यवाद, अलकनंदा जी !
सादर आभार...।

लोकेश नदीश ने कहा…

वाहः
बहुत खूब

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद लोकेश जी !

आलोक सिन्हा ने कहा…

एक बहुत ही सरस रचना |

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद आलोक जी!
ब्लॉग पर आपका स्वागत है।