"पुष्प और भ्रमर"




"पुष्प और भ्रमर" (myth on a flower)

तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा
प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया
तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ
अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया ।

हमेशा रहोगे तुम साथ मेरे,
बसंत अब हमेशा खिला ही रहेगा
तुम मुस्कुराये तो मैंं खिलखिलाई
ये सूरज सदा यूँ चमकता रहेगा ।

न आयेगा पतझड़ न आयेगी आँधी,
मेरा फूलमन यूँ ही खिलता रहेगा।
तुम सुनाते रह़ोगे तराने हमेशा
और मुझमें मकरन्द बढता रहेगा।

तुम्हें और जाने की फुरसत न होगी
मेरा प्यार बस यूँ ही फलता रहेगा ।।

           "मगर अफसोस" !!!

तुम तो भ्रमर थे मै इक फूल ठहरी
वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ?
मैंं पलकें बिछा कर तेरी राह देखूँ                   
ये इन्तजार अब यूँ ही चलता रहेगा ।

मौसम में जब भी समाँ लौट आये
मेरा दिल हमेशा तडपता रहेगा

कि ये "शुभ मिलन" अब पुनः कब बनेगा
 
                                                 

   सुधा देवरानी*







टिप्पणियाँ

  1. उत्तर
    1. हृदयतल से धन्यवाद सखी उत्साहवर्धन हेतु
      सस्नेह आभार...।

      हटाएं
  2. पुष्प और भ्रमर सुन्दर चित्रण

    जवाब देंहटाएं
  3. उत्तर
    1. हृदयतल से धन्यवाद अनीता जी !
      सादर आभार...।

      हटाएं
  4. आपकी लेखनी को नमन । आज वो गीत भी याद आ गई "भँवरे ने खिलाया फूल, फूल को वे गए राज कुंवर....."
    तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा........
    प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया
    तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ.....
    अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया ।
    शुभकामनाएँ ....व बधाई

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हार्दिक धन्यवाद, पुरुषोत्तम जी ! उत्साहवर्धन हेतु...
      सादर आभार।

      हटाएं
  5. उत्तर
    1. आभारी हूँ विश्वमोहन जी! बहुत बहुत धन्यवाद आपका...।

      हटाएं
  6. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (28-02-2020) को धर्म -मज़हब का मरम (चर्चाअंक -3625 ) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    आँचल पाण्डेय

    जवाब देंहटाएं
  7. तहेदिल से धन्यवाद आँचल जी मेरी रचना को मंच पर साझा करने हेतु.....
    सस्नेह आभार।

    जवाब देंहटाएं
  8. विचित्र संसार है, यदि भंवरे पुष्प से हटे नहीं तो ऐसा भी होता है कि सूर्यास्त के समय जब फूलों की पंखुड़ियाँँ आपस में सिकुड़ जाती हैं ,तो बेचारा भंवरा भी उसके अंदर ही प्रातः काल की प्रतीक्षा में दम तोड़ देता है।
    सुंदर भावपूर्ण सृजन ,आपको नमन।

    जवाब देंहटाएं
  9. तुम तो भ्रमर थे मैं इक फूल ठहरी......
    वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ? ....सद‍ियों से चली आ रही ये एक शाश्वत स्थ‍ित‍ि है, इसपर बहुत ही गज़ब का ल‍िखा है सुधा जी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. तहेदिल से धन्यवाद, अलकनंदा जी !
      सादर आभार...।

      हटाएं
  10. उत्तर
    1. हार्दिक धन्यवाद आलोक जी!
      ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

      हटाएं
  11. बहुत खूबसूरत रचना ।
    बेफाओं से क्यों कर कोई उम्मीद करे ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आ.संगीता जी!

      हटाएं
  12. खूबसूरत ,अभिनव सृजन ,मोहक शब्द सौष्ठव ने मोह लिया हालांकि विरह के दुखद पल है, फिर भी सृजन इतना मनोहारी है कि प्रशंसा को शब्द नही सुधा जी मैं पूरी तरह से मुग्ध हूँ।
    अप्रतिम।

    जवाब देंहटाएं

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