मंगलवार, 15 नवंबर 2016

प्रकृति की रक्षा ,जीवन की सुरक्षा

      

save earth


उर्वरक धरती कहाँ रही अब
सुन्दर प्रकृति कहाँ रही अब 
कहाँ रहे अब हरे -भरे  वन
ढूँढ रहा है जिन्हें आज मन
                        
  तोड़ा- फोड़ा इसे मनुष्य ने
   स्वार्थ -सिद्ध करने  को  
   विज्ञान का नाम दे दिया 
   परमार्थ सिद्ध करने को 
 
 सन्तुलन बिगड़ रहा है
 अब भी नहीं जो सम्भले
  भूकम्प,बाढ,सुनामी तो
  कहीं तूफान  चले
 
 बर्फ तो पिघली ही
 अब ग्लेशियर भी बह निकले
  तपती धरा की लू से
  अब सब कुछ जले
                     
विकास कहीं विनाश न बन जाये
विद्युत आग की लपटों में न बदल जाए
संभल ले मानव संभाल ले पृथ्वी को
आविष्कार तेरे तिरस्कार न बन जायें

कुछ कर ऐसा कि
सुन्दर प्रकृति शीतल धरती हो
हरे-भरे वन औऱ उपवन हों
कलरव हो पशु -पक्षियों का
वन्य जीवों का संरक्षण हो
                        
प्रकृति की रक्षा ही जीवन की सुरक्षा है
आओ इसे बचाएं जीवन सुखी बनाएं ।
     
         चित्र साभार गूगल से...

15 टिप्‍पणियां:

Pammi singh'tripti' ने कहा…

विचारपूर्ण विषय पर सार्थक अभिव्यक्ति।
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

हमेशा की तरह बहुत सराहनीय सृजन।
सादर

उषा किरण ने कहा…

वाह 👌👌

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार पम्मी जी!

Sudha Devrani ने कहा…

सस्ह आभार एवं धन्यवाद प्रिय अनीता जी!

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद आ. उषा किरण जी!

जिज्ञासा सिंह ने कहा…

प्रकृति का क्षरण देख मन टूट हो जाता है,ये मेरा भी प्रिय विषय है,बहुत शुभकामनाएं सुधा जी।

Sudha Devrani ने कहा…

जी सही कहा आपने जिज्ञासा जी!
हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आपका।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सार्थक संदेश देती सुंदर रचना । पृथ्वी को बचाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ।

Amrita Tanmay ने कहा…

ऐसे असंतुलन के भुक्तभोगी भी हम ही हैं तो सार्थक प्रयास करना ही होगा । प्रभावी सृजन ।

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आ.संगीता जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार अमृता जी!

रेणु ने कहा…

विकास कहीं विनाश न बन जाये
विद्युत आग की लपटों में न बदल जाए
संभल ले मानव संभाल ले पृथ्वी को
आविष्कार तेरे तिरस्कार न बन जायें
बहुत बढ़िया सुधा जी। प्रकृति एक धधकता ज्वालामुखी बन चुकी।इसके बारे में जरूर कुछ करना होगा।

Sudha Devrani ने कहा…

जी, रेणु जी!हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आपका।

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर। इंसान प्रकृति से जीतता जरूर है किंतु प्रकृति अपनी हर पराजय का बदला लेती है।

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