आओ बच्चों ! अबकी बारी होली अलग मनाते हैं

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  आओ बच्चों ! अबकी बारी  होली अलग मनाते हैं  जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । ऊँच नीच का भेद भुला हम टोली संग उन्हें भी लें मित्र बनाकर उनसे खेलें रंग गुलाल उन्हें भी दें  छुप-छुप कातर झाँक रहे जो साथ उन्हें भी मिलाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । पिचकारी की बौछारों संग सब ओर उमंगें छायी हैं खुशियों के रंगों से रंगी यें प्रेम तरंगे भायी हैं। ढ़ोल मंजीरे की तानों संग  सबको साथ नचाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । आज रंगों में रंगकर बच्चों हो जायें सब एक समान भेदभाव को सहज मिटाता रंगो का यह मंगलगान मन की कड़वाहट को भूलें मिलकर खुशी मनाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । गुझिया मठरी चिप्स पकौड़े पीयें साथ मे ठंडाई होली पर्व सिखाता हमको सदा जीतती अच्छाई राग-द्वेष, मद-मत्सर छोड़े नेकी अब अपनाते हैं  जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । पढ़िए  एक और रचना इसी ब्लॉग पर ●  बच्चों के मन से

मुझे बड़ा नहीं होना



A child and his grandfather
चित्र साभार shutterstock  से...


"दादू ! अब से न मैं आपको प्रणाम नहीं करूंगा"।हाथ से हाथ बाँधते हुए दादू के बराबर बैठकर मुँह बनाते हुए विक्की बोला।

"अच्छा जी ! तो हाय हैलो करोगे या गुड मॉर्निंग, गुड नाइट वगैरह वगैरह ? सब चलेगा छोटे साहब! आखिर हम मॉडर्न विक्की के सुपर मॉडर्न दादू जो हैं । और हम तुम्हें हर हाल में वही आशीर्वाद देंगे जो हमेशा देते हैं....खुश रहो और जल्दी से बड़े हो जाओ" !

"ओह्ह! शिट् ! दादू! फिर से ? (चिढ़कर अपने नन्हें हाथों से सोफे पर मुक्का मारते हुए) प्लीज दादू चेंज कीजिए न अपना आशीर्वाद! स्पैशिली सैकिंड वाला "!

"क्या ?  सैकिंड वाला आशीर्वाद !  चेंज करूँ ?  क्यों? बड़ा नहीं होना क्या" ? दादू ठठाकर हँस दिये।

"नो दादू ! सच्ची में बड़ा नहीं होना । आप इसकी जगह कोई और आशीर्वाद दीजिए न , कोई भी" । 

विक्की की बात सुनकर दादू ने आश्चर्यचकित होकर पूछा।

"पर क्यों ? कारण बतायेंगे हमारे छोटे साहब" ?

"दादू! मैं बड़ा हुआ तो मम्मी-पापा बूढ़े जायेंगे न,  आपकी तरह। सोचके डर लगता है मुझे ! इसीलिए दादू!  मुझे बड़ा होने का आशीर्वाद मत दीजिए प्लीज़! नहीं होना मुझे बड़ा"। 

दादा जी के सामने खड़े होकर आँखों में आँखें डाल समझाते हुए विक्की ने बड़ी गम्भीरता से कहा तो दादा जी भी निःशब्द हो गये ।



टिप्पणियाँ

  1. वाह ..... बच्चे भी न जाने क्या क्या सोच सकते हैं। मन को छू गयी ये लघुकथा ।

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    1. तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आ.संगीता जी! आपकी सराहनीय प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ।

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  2. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार पम्मी जी! मेरी रचना पाँच लिंको का आनंद मंच पर चयन करने हेतु।

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  3. बदलते समाज और बदलती सोच को दर्शाती लघुकथा । बच्चे बहुत स्मार्ट हो गए हैं । उनकी सकारात्मक सोच समाज में,परिवार में एक स्वस्थ वातावरण का विकास करती है ।
    सुंदर प्रेरक लघुकथा ।

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    1. हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार जिज्ञासा जी!

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  4. ऐसी संवेदनशील बातें निर्दोष बालक ही सोच सकते हैं क्योंकि वे मन के सच्चे होते हैं। राजेश रेड्डी साहब की एक ग़ज़ल का एक शेर है:

    मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम-सा बच्चा
    बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है

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    1. अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ.जितेन्द्र जी! अनमोल सराहनीय प्रतिक्रिया हेतु।आ.रेड्डी साहब की खूबसूरत गजल साझा कर आपने मेरे सृजन को सार्थक कर दिया....दिल से शुक्रिया।

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  5. बच्चों में निश्छल प्रेम होता है ...
    भावुक करते भाव ... सोचने की बात ...

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  6. विक्की की बातों से मैं भी सहमत हूं, मुझे भी बहुत डर लगता है बुढ़ापे से, बच्चे कहते हैं कि- हमें आप सभी के उम्र तक नहीं पहुंचना, बहुत ही सुन्दर लघुकथा सुधा जी, 🙏

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    1. सही कहा कामिनी जी!तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार।

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  7. सचमुच निःशब्द कर दिया बच्चे की बात ने ! याद आ गया कि अपने दादाजी की मृत्यु देखने के बाद मेरा बेटा बचपन में कई बार मुझसे लिपटकर कहता था, "मम्मी, आप कभी मरना मत !"

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    1. जी, मीना जी बच्चे डर जाते हैं ऐसी घटनाओं से...
      तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आपका।

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  8. अपनों से दूर होना या निःशक्त होना बच्चों को बहुत सालता है ।बहुत सुन्दर और हृदयस्पर्शी लघुकथा ।

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