Sunday, May 21, 2017

नारी ! अब तेरे कर्तव्य और बढ गये.....




बढ रही दरिन्दगी समाज में,
नारी ! तेरे फर्ज और बढ गये .......
माँ है तू सृजन है तेरे हाथ में,
"अब तेरे कर्तव्य औऱ बढ गये".......

संस्कृति, संस्कार  रोप बाग में ,
माली तेरे बाग यूँ उजड गये ........
दया,क्षमा की गन्ध आज है कहाँ ?
फूल में सुगन्ध आज है कहाँ ?
ममत्व,प्रेम है कहाँँ तू दे रही ?
पशु समान पुत्र बन गये .....
नारी ! तू ही पशुता का नाश कर,
समष्ट सृष्टि का नया विकास कर ।
"नारी ! तेरे फर्ज और बढ गये".......
"अब तेरे कर्तव्य और बढ गये" .......

मशीनरी विकास आज हो रहा ,
मनुष्यता का ह्रास आज हो रहा ।
धर्म-कर्म भी नहीं रहे यहाँ ,
अन्धभक्ति ही पनप रही यहाँ ।
वृद्ध आज आश्रमों  में रो रहे ,
घर गिरे मकान आज हो रहे......
सेवा औऱ सम्मान अब रहा कहाँ ?
घमंड और अपमान ही बचा यहाँ ।
संस्कृति विलुप्त आज हो रही ..........
"माँ भारती" भी रुग्ण हो के रो रही ...

"माँ भारती" की है यही पुकार अब ,
"बचा सके तो तू बचा संस्कार अब"।
अनेकता में एकता बनी रहे ..........
बन्धुत्व की अमर कथा बनी रहे ।
अनेक धर्म लक्ष्य सबके एक हों ,
सम्मान की प्राची प्रथा बनी रहे .........
"सत्यता का मार्ग अब दिखा उन्हें",
"शिष्टता , सहिष्णुता सिखा उन्हे" ।
सभ्यता का बीज रोप बाग में ........
उम्मीद सभी नारी से ही कर रहे.......

दरिन्दगी मिटा तू ही समाज से,
नारी ! तेरे फर्ज और बढ रहे ......
माँ  है तू सृजन है तेरे हाथ में,
"अब तेरे कर्तव्य और बढ गये" ........


                  चित्र गूगल से साभार.....







Tuesday, May 16, 2017

"सैनिक---देश के"

कब तक चलता रहेगा बोलो,
लुका-छुपी का खेल ये ?.......
अब ये दुश्मन बन जायेंगे,
या फिर होगा मेल रे ?.........

उसने सैनिक मार गिराये,
तुमने बंकर उडा दिये........
ईंट के बदले पत्थर मारे,
ताकत अपनी दिखा रहे........

संसद की कुर्सी पर बैठे,
नेता रचते शेर रे...........
एक दिन सैनिक बनकर देखो,
कैसे निकले रेड रे.........

शहादत की चाह से सैनिक
कब सरहद पर जाता है ?.......
हर एक पिता कब पुत्र-मरण में,
सीना यहाँ फुलाता है ?........

गर्वित देश और गर्वित अपने भी,
ये हैंं शब्दों के फेर रे...........
कब तक चलता रहेगा बोलो,
लुका-छिपी का खेल ये ?.........

भरी संसद में नेताओं पर ,
जूते फेंके जाते हैं...........
सरहद पर क्यों हाथ बाँधकर,
सैनिक भेजे जाते हैं ?.........

अजब देश के गजब हैं नुस्खे या,
 हैं ये भी राजनीति के खेल रे ?........
कब तक चलता रहेगा बोलो,
लुका-छिपी का खेल ये ?...........

विपक्षी के दो शब्दों से जहाँ,
स्वाभिमान हिल जाते हैं........
नहीं दिखे तब स्वाभिमान जब,
पत्थर सैनिकों पर फैंके जाते हैं......
   
आजाद देश को रखने वाले,
स्वयं गुलामी झेल रहे..........
दाँत भींच ये गाली सहते,
बेचारगी सी झेल रहे............

प्राण हैं इनमें ये नहीं पुतले,
कब समझोगे भेद रे ?.........
कब तक चलता रहेगा बोलो,
लुका-छिपी का खेल रे ?.........

बिन अधिकार बिना आजादी,
करें ये कैसे मेल रे ?..........
देश-भक्ति का जज्बा ऐसे,
हो न जाये कहीं फेल रे ?.........

तनिक सैनिकों को भी समझो,
बन्द करो अब खेल ये............
ठोस नतीजे पर तो पहुँचों,
हुंकारे अब ये "शेर" रे...........

हुक्म करो तो "अमन-चैन" को,
वापस भारत लाएं ये..........
"शौर्य" देख आतंकी बंकर-
सहित रसातल जायें रे..........

दे खदेड़ आतंक जहाँ से,
"विश्व-शान्ति" फैलायें ये..........
"भारत माता"के वीर हैं ये,
संसार में माने जायें रे............





चित्र :Shutterstockसे साभार.....

Sunday, May 14, 2017

"माँ"




माँ इतनी आशीष दें !
कर सके कोई अर्पण तुम्हें...
प्रेम से तुमने सींचा हमें
बढ सकें यूँ कि छाँव दें तुम्हें...


माँ के ख्वाबों को आबाद कर
मंजिलों तक पहुँच पायेंं हम
सपने बिखरे न माँ के कोई
काम इतना तो कर जाएंं हम

माँ के आँचल की साया तले
हम बढें तपतपी राह में...
ना डरें मुश्किलों से कभी
ना गलत राह अपनायें हम......

माँ का आशीष हमेशा रहे
प्रभु ! इतना हमें "वर" दे...
माँ से ही तो है संसार ये..
माँ के चरणों में हम बने रहें...






चित्र :-गूगल से...साभार

Wednesday, May 10, 2017

वीरांगना बन जाओ बिटिया....

नाजुकता अब छोडो बिटिया,
वीरांगना बन जाओ ना........
सीखो जूडो और करांटे,
बल अपना फिर बढाओ ना ।

भैया दण्ड-पेल हैं करते,
तुम भी वही अपनाओ ना ।
गुडिया से खेलना छोड़ो
मर्दानी बन जाओ ना........

मात-पिता की चिन्ता हो तुम,
रूप नया अपनाओ ना......
खेलो दंगल बवीता सा तुम,
देश का मान बढाओ ना ।

छोड़ो कोमलता भी अपनी ,
समय को मात दे जाओ ना ।
रणचण्डी,दुर्गा तुम बनकर,
दुष्टों को धूल चटाओ ना........

निर्भया ज्योति थी माँ-पापा की ,
तम उनका भी मिटाओ ना........
ऐसे दरिन्दो का काल बनो तुम ,
इतिहास नया ही रचाओ ना ।

अब कोई भी कली धरा पर ,
ऐसे रौंदी जाये ना ।
बीज पनपने से पहले ये ,
भ्रूण में कुचली जाये ना.........

दहेज के भिखमंगों को भी,
बीच सडक पर लाओ ना........
बहू जलाने वालों के घर-
आँगन आग लगाओ ना ।

बेटी वीरांगना बने जो ,
प्रबल बनेगा देश अपना ।
उत्कृष्ट समाज के नव-निर्माण से,
पूरा होगा हर सपना.....


Monday, May 8, 2017

आस हैं और भी.....राह हैं और भी....


जब कभी अकेली सी लगी जिन्दगी,
 तन्हाई भी आकर जब सताने लगी 
 आस-पास चहुँ ओर नजरें जो गयी,
 एक नयी सोच मन मेरे आने लगी......
*देख ऐसी कला उस कलाकार की,
 भावना गीत बन गुनगनाने लगी ..........


 मंजिल दूर थी रात छायी घनी,
चाँद-तारों से उम्मीद करने लगी
बादलों ने भी तब ही ठिठोली की
चाँद-तारे छुपे आँख-मिचौली की
घुप्प अंधेरे में डर जब सताने लगा
राह सूझी नहीं मन घबराने लगा
टिमटिमाते हुए जुगनू ने कहा .......
आस बाकी अभी टूट जाओ नहीं
मुस्कुरा दो ! जरा रूठ जाओ नहीं
है बची रौशनी होसला तुम रखो !
दिख रही राह मंजिल तक तुम चलो !
आस हैंं और भी राह हैं औऱ भी,
एक नयी सोच तब मन में आने लगी......
*देख ऐसी कला उस कलाकार की,
भावना गीत बन गुनगुनाने लगी..........


करवटें जब बदलने लगी जिन्दगी
धोखे और नफरत से हुए रूबरू
फिर डरे देख जीवन का ये पहलू
विश्वास भी डगमगाने लगा
शब्द जो कहे अर्थ उल्टे हुये
हर कोशिश नाकामी दिखाने लगी
खामोशी इस कदर फिर से छाने लगी
रुक गये हम जहाँ थे वहीं हारकर
तब जीने की चाहत भी जाने लगी
एक हवा प्रेम की सरसराते हुए........
बिखरी जुल्फों को यूँ सहलाने लगी
*देख ऐसी कला उस कलाकार की,
भावना गीत बन गुनगनाने लगी.........


है राहें औऱ भी नजरे तो उठा !
उम्मीदें बढा फिर चलें तो जरा !
वजह मुस्कुराने की हैं और भी,
जो नहीं उस पर रोना तो छोड़े जरा...
यही सीख जब  अपनाने लगी
एक नयी सोच तब मन में आने लगी
*देख ऐसी कला उस कलाकार की
भावना गीत बन गुनगुनाने लगी.......





Sunday, April 30, 2017

खोये प्यार की यादें......

वो ऐसा था/वो ऐसी थी यही दिल हर पल कहता है,
गुजरती है उमर, यादों में खोया प्यार रहता है.........

भुलाये भूलते कब हैं वो यादें वो मुलाकातें,
भरे परिवार में अक्सर अकेलापन ही खलता है ।

कभी तारों से बातें कर कभी चंदा को देखें वो,
कभी गुमसुम अंधेरे में खुद ही खुद को समेटें वो ।

नया संगी नयी खुशियाँ कहाँ स्वीकार करते हैं,
उन्हीं कमियों में उलझे ये तो बस तकरार करते हैं ।

कहाँ जीते हैं ये दिल से, ये घर नाबाद रहता है,
गुजरती है उमर यादोंं में खोया प्यार रहता है..........

साथी हो सगुण फिर भी इन्हेंं कमियां ही दिखती हैं,
जो पीछे देख चलते हैं, उन्हेंं ठोकर ही मिलती हैं.।

कशमकश में रहे साथी, कमीं क्या रह गयी मुझमें
समर्पित है जिन्हेंं जीवन,वही खुश क्यों नहीं मुझमें ।

करीब आयेंगे ये दिल से, यही इन्तजार रहता है,
गुजरती है उमर यादों में खोया प्यार रहता है.......।

बडे जिनकी वजह से दूर हो जीना इन्हेंं पडता,
नहीं सम्मान और आदर उन्हें इनसे कभी मिलता.।

खुशी इनकी इन्हें देकर बडप्पन खुद निभाते हैं,
वही ताउम्र  छोटों  से  उचित  सम्मान पाते हैं .।

दिल से दिल मिल जाएंं जो वो घर आबाद रहता है,
गुजरती है उम्र खुशियों में, प्यारा सा घर संसार रहता है....

Wednesday, April 12, 2017

हम क्रांति के गीत गाते चलें



राष्ट्र की चेतना को जगाते चलें
हम क्रांति के गीत गाते चलें...

अंधेरे को टिकने न दें हम यहाँ,
नयी रोशनी हम जलाते चलें ।
निराशा न हो अब कहीं देश में,
आशा का सूरज उगाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें...


जागे धरा और गगन भी जगे,
दिशा जाग जाए पवन भी जगे ।
नया तान छेड़े अब पंछी यहाँ,
नव क्रांति के स्वर उठाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें...


अशिक्षित रहे न कोई देश में,
पराश्रित रहे न कोई देश में ।
समृद्धि दिखे अब हर क्षेत्र में,
स्वावलम्बी, सशक्त राष्ट्र बनाते चलें।
हम क्रांति के गीत गाते चलें..........


प्रदूषण हटाएंं पर्यावरण संवारें,
पुनः राष्ट्रभूमि में हरितिमा उगायें ।
सभ्य, सुशिक्षित बने देशवासी,
गरीबी ,उदासी मिटाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें..........


जगे नारियाँ शक्ति का बोध हो,
हो प्रगति, न कोई अवरोध हो ।
अब देश की अस्मिता जाए ,
शक्ति के गुण गुनगनाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें...........


युवा देश के आज संकल्प लें ,
नव निर्माण फिर से सृजन का करें
मानवी वेदना को मिटाते हुए,
धरा स्वर्ग सी अब बनाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें..........

Wednesday, April 5, 2017

शुक्रिया प्रभु का.......






हम चलें एक कदम
फिर कदम दर कदम
यूँ कदम से कदम हम
फिर बढाते चले.......
जिन्दगी राह सी,और
चलना गर मंजिल.....
नयी उम्मीद मन में जगाते रहें.......
खुशियाँ मिले या गम
हम चले,हर कदम
शुकराने तेरे (प्रभु के) मन में गाते रहें......


डर भी है लाजिमी, इन राहों पर,
कहीं खाई है, तो कभी तूफान हैं......
कभी राही मिले जाने-अनजाने से,
कहीं राहें बहुत ही सुनसान हैं........
आशा उम्मीद के संग हो थोड़ा सब्र
साहस देना तो उसकी पहचान है......
मन मेंं हर पल करे जो
शुकराना तेरा(प्रभु का)....
मंजिलें पास लाना तेरा काम है.....
ये दुनिया तेरी, जिन्दगानी तेरी,
बस यूँ जीना सिखाना तेरा काम है.....


कभी चिलमिलाती उमस का कहर,
कभी शीत जीवन सिकुडाती सी है.....
कभी रात काली अमावश बनी,
कभी चाँद पूनम दे जाती जो है....
न हो कोई शिकवा ,न कोई गिला
बस तेरे गुण ही यूँ गुनगुनाते रहें,
जीवन दर्शन जो दिया तूने,
शुकराने तेरे मन में गाते रहें........
नयी उम्मीद मन में जगाते रहें....

Tuesday, March 28, 2017

उफ! "गर्मी आ गयी"

     



बसंत की मेजबानी अभी चल ही रही थी,
तभी दरवाजे पर दस्तक दे गर्मी बोली .....
               "लो मैंं आ गई"

औऱ फिर सब एक साथ बोल उठे....
           उफ !गर्मी आ गई ?

हाँ !  मैं आ गयी......अब क्या हुआ?
सखी सर्दी  जब थी यहाँ आई,
तब भी तुम कहाँ खुश थे ?
रोज स्मरण कर मुझे
कोसे थे सर्दी को तुम........
ताने -बाने सर्दी सुनकर
चुप लौटी बेचारी बनकर।
उसे मिटाने और निबटाने,
क्या-क्या नहीं करे थे तुम........
पेड़ भी सारे काट गिराये,
बस तब तुमको धूप ही भाये ?
छाँव कहीं पर रह ना जाए,
राहों के भी वृक्ष कटाये.......
जगह-जगह अलाव जलाकर,
फिर सर्दी को तुम निबटाये.......
गयी बेचारी अपमानित सी होकर,
बसंत आ गया फिर मुँह धोकर
दो दिन की मेहमानवाजी
फिर तुम सबको भा गयी
पर अब  लो "मैं आ गयी"......
करो जतन मुझसे निबटो तुम,
मैं हर घर -आँगन में छा गयी....
      "लो मैं आ गयी"
-सुधा देवरानी






Tuesday, March 21, 2017

जब से मिले हो तुम


जीवन  बदला ,दुनिया बदली,
मन को अनोखा,ज्ञान मिला।
मिलकर तुमसे मुझको मुझमें
 एक नया इंसान मिला।

रोके भी नहीं रुकती थी जो,
आज चलाए चलती हूँ।
जो तुम चाहते वही हूँ करती
जैसे कोई कठपुतली हूँ

माथे की तुम्हारी एक शिकन,
मन ऐसा झकझोरे क्यों...
होंठों की तुम्हारी एक हँसी
मानूँ जीवन की बडी खुशी

गलती भी तुम्हारी सिर्फ़ शरारत,
दुख अपना गर तुम्हें मुसीबत ।
दुनिया अपनी उजड सी जाती,
आँखों में दिखे गर थोड़ी नफरत ।

बेवशी सी कैसी छायी मुझमें
क्यों हर सुख-दुख देखूँ तुममें.....

कब चाहा ऐसे बन जाऊँँ,
जजबाती फिर कहलाऊँ।
प्रेम-दीवानी सी बनकर......
फिर विरह-व्यथा में पछताऊँ ।

Wednesday, March 8, 2017

दो दिन की हमदर्दी में, जीवन किसका निभ पाया....


जाने इनके जीवन में ,
ये कैसा मोड आया,
खुशियाँँ कोसों दूर गयी
दुख का सागर गहराया...
कैसे खुद को संभालेंगे
मेरा मन सोचे घबराया.....

आयी है बसंत मौसम में,
हरियाली है हर मन में,
पतझड़ है तो बस इनके,
इस सूने से जीवन में.......
इस सूने जीवन में तो क्या,
खुशियाँ आना मुमकिन है ?
आँसू अविरल बहते इनके ,
मन मेरा ऐसे घबराया......

छिन गया बचपन बच्चों का,
उठ गया सर से जब साया,
हो गये अनाथ जो इक पल में
नहीं रहा पिता का इन्हे सहारा.....
मुश्किल जीवन बीहड राहें,
उस पर मासूम अकेले से,
कैसे आगे बढ पायेंगे,
मेरा मन सोचे घबराया.....

बूढे माँ-बाप आँखें फैलाकर,
जिसकी राह निहारा करते थे।
उसे "शहीद "कह विदा कर रहे,
स्वयं विदा जिससे लेने वाले थे...
इन बूढी आँखों के बहते जो,
आँसू कौन पोंछने आयेगा.......
"गर्व करे शहीदों पर"पूरा देश।
घरवालों को कौन संभालेगा.....
दो दिन की हमदर्दी में,
जीवन किसका निभ पाया....
कैसे खुद को संभालेंगे
मेरा मन सोचे घबराया...

जाने इनके जीवन में,
एक ऐसा ही मोड़ आया
खुशियाँ कोसों दूर गयी...
दुख का सागर गहराया ।।

Saturday, February 25, 2017

"पुष्प और भ्रमर"





तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा........
प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया
तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ.....
अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया ।

हमेशा रहोगे तुम साथ मेरे...।.
बसंत अब हमेशा खिला ही रहेगा
तुम मुस्कुराये तो मैंं खिलखिलाई......
ये सूरज सदा यूँ चमकता रहेगा ।

न आयेगा पतझड़ न आयेगी आँधी.......
मेरा फूलमन यूँ ही खिलता रहेगा
तुम सुनाते रह़ोगे तराने हमेशा....
और मुझमें मकरन्द बढता रहेगा

तुम्हें और जाने की फुरसत न होगी.....
मेरा प्यार बस यूँ ही फलता रहेगा ।।

           "मगर अफसोस" !!!

तुम तो भ्रमर थे मै इक फूल ठहरी......
वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ?
मैंं पलकें बिछा कर तेरी राह देखूँ.....                      
ये इन्तजार अब यूँ ही चलता रहेगा ।

मौसम में जब भी समाँ लौट आये.....
मेरा दिल हमेशा तडपता रहेगा .........


*कि ये "शुभ मिलन" अब पुनः कब बनेगा*
   

                                                      ...सुधा देवरानी*







                                                   

             




Sunday, February 12, 2017

हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है ;



जंग लगे/दीमक खाये खोखले से थे वे,
कलई / पालिस कर चमका दिये गये
नये /मजबूत से दिखने लगे एकदम...
ऐसे सामानों को बाजारों में बिकते देखा है।
खोखले थे सो टूटना ही था,
दोष लाने वालों पर मढ दिये गये...
शुभ और अशुभ भी हो गयी घडियाँ....
मनहूसियत को बहुओं के सर मढते देखा है।
हाँ !मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है।

झगड़ते थे बचपन मे भी,
खिलौने भी छीन लेते थे एक-दूसरे के....
क्योंकि खिलौने लेने तो पास आयेगा दूसरा,
हाँ! "पास आयेगा" ये भाव था प्यार/अपनेपन का....
उन्ही प्यार के भावों में नफरत को भरते देखा है।
हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है।

वो बचपन था अब बडे हुए,
तब प्यार था अब नफरत है.....
छीनने के लिए खिलौने थे,
औऱ अब पैतृक सम्पत्ति.....
तब सुलह कराने के लिए माँ-बाप थे,
अब वकील औऱ न्यायाधीश....
भरी सभा में सच को मजबूरन गूँगा होते देखा है ;
या यूँ कह दें-"झूठ के आगे सच को झुकते देखा है"।
हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।

हो गयी जीत मिल गये हिस्से,
खत्म हुए अब कोर्ट के किस्से...
जश्न मनाते सारे चमचे,
नाचते-गाते नये-नये रिश्ते...
अंधियारे -सूने कोने में छुप उसको सुबकते देखा है ;
या यूँ कह दे-"प्रेम के आगे दंभ को झुकते देखा है",
हाँ!मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।

पर क्या फायदा ? पहल करेगा कौन,
जब बडा बडा ही बनकर बैठा,
छोटा भी छुटपन में ऐंठा.....
पडौसी रिश्ते तमाशबीन हुए,
माँ-बाप परलोक जो गये.......
कौन सुलह करवाए इनकी,
झूठी शान खोखला अभिमान...
अक्ल पर भी तो जाने कब से बडा सा पत्थर फेरा है ;
ऐसे में भी कभी किसी ने रिश्तों को निभते देखा है ?
हाँ !मैने ऐसे ही रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।
                                                         
                                           ....सुधा देवरानी

Wednesday, January 25, 2017

बेरोजगारी : "एक अभिशाप"


   नवयुवा अपने देश के,
    पढे-लिखे ,डिग्रीधारी
    सक्षम,समृद्ध, सुशिक्षित
     झेल रहे बेरोजगारी।
                               कर्ज ले,प्राप्त की उच्च शिक्षा,
                                अब सेठजी के ताने सुनते।
                               परेशान ये मानसिक तनाव से,
                                आत्महत्या के रास्ते ढूँढते।
      माँ,बहनों के दु:ख जो सह न सके,
      वे अभागे गरीबी मिटाने के वास्ते,
      परचून की दुकान पर मिर्ची तोल रहे।
      तो कुछ सैल्समैन बन गली-गली डोल  रहे।
                                        कुछ प्रशिक्षित नव-युवा,
                                        आन्दोलन कर रहे धरने पर बैठे,
                                        नारेबाजी के तुक्के भिडाते,
                                          मंत्री जी की राह देखते,
                                           नौकरी की गुहार लगाते।
      तो कुछ विदेशी कम्पनियों की सदस्यता
       में धन-जन जुटाने के जुगाड़ लगाते
          "हमारे सुशिक्षित नवयुवक,"
         " निठल्ले ,निकम्मे कहलाते"।
 बेरोजगारी इनके लिये अभिशाप नहीं तो और क्या है।
    अपने देश का ये दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है !!!
                                                           (सुधा देवरानी)
                                   

Monday, January 9, 2017

नारी-"अबला नहीं"



आभूषण रूपी बेडियाँ पहनकर...
अपमान, प्रताड़ना का दण्ड,
सहना नियति मान लिया...
अबला बनकर निर्भर रहकर,
जीना है यह जान लिया....
सदियों से हो रहा ये शोषण,
अब विनाश तक पहुँच गया ।
"नर-पिशाच" का फैला तोरण,
पूरे समाज तक पहुँच गया ।।


अब वक्त आ गया वर्चस्व करने का......
अन्धविश्वाश ,रूढिवादिता ,कुप्रथाओं,
से हो रहे विनाश को हरने का...
हाँ ! वक्त आ गया अब पुन: 
शक्ति रूप धारण करने का......


त्याग दो ये "बेडियाँ" तुम,
"लौहतन" अपना बना दो !
थरथराये अब ये दानव...
शक्तियां अपनी जगा दो !!!
लो हिसाब हर शोषण का...
उखाड़ फेंको अब ये तोरण !
याद आ जाए सभी को..
रानी लक्ष्मीबाई का युद्ध-भीषण ।


उठो नारी ! "आत्मजाग्रति" लाकर,
"आत्मशक्तियाँ" तुम बढाओ !
"आत्मरक्षक" स्वयं बनकर ....
"निर्भय" निज जीवन बनाओ !!
शक्ति अपनी तुम जगाओ !!!
         .                   - सुधा देवरानी