शुक्रवार, 30 जून 2017

अहंकार



मानसूनी मौसम में बारिश के चलते,
सूखी सी नदी में उफान आ गया ......
देख पानी से भरा विस्तृत रूप अपना,
इतराने लगी नदी, अहंकार छा गया.....
बहाती अपने संग कंकड़-पत्थर,
फैलती काट साहिल को अपने......

हुई गर्व से उन्मत इतनी,
पास बने कुएं से उलझी.......
बोली कुआं ! देखो तो मुझको,
देखो ! मेरी गहराई चौड़ाई ,
तुम तो ठहरे सिर्फ कूप ही ,
मैं नदी कितनी भर आयी !....

शक्ति मुझमें इतनी कि सबको बहा दूँ ,
चाहूँ  गर  तो  तुमको भी खुद में समा दूँ....
मैं उफनती नदी हूँ. ! देखो जरा मुझको,
देखो !बढ रही कैसे मेरी गहराई चौड़ाई...

मेरा नीर हिल्लौरें भरता,
मंजिल तक जायेंगे हम तो....
कूप तू सदा यहीं तक सीमित,
सागर हो आयेंगे हम तो......

कुआं मौन सुन रहा,नदी को ,
नहीं प्रतिकार किया तब उसने.....
जैसे  दादुर  की टर्र - टर्र से ,
कोयल मौन हुई तब खुद में......

चंद समय में मौसम बदला ,
बरसाती जल अब नहीं बरसा....
नदी बेचारी फिर से सूखी
पुनः पतली धारा में बदली......

कुआं नदी को सम्बोधित करके,
फिर बोला  मर्यादित  बनके.......
सुनो नदी !कुछ अनुभव मेरे,
विस्तार ही सब कुछ नहीं बहुतेरे.....

गुणवत्ता बिन व्यर्थ है जीवन ,
बिन उद्देश्य दिग्भ्रमित सा मन....
लक्ष्यविहीन व्यर्थ है विस्तार,
विनाशकारी  है अहंकार.......

क्षमा प्रार्थी संकुचित हो नदी बोली,
गलत किया जब "स्व" को भूली......








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